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बिस्रामपुर का सन्त

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208 pages, Paperback

First published January 1, 1998

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About the author

श्रीलाल शुक्ल (31 दिसम्बर 1925 - 28 अक्टूबर 2011) हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार थे। वह समकालीन कथा-साहित्य में उद्देश्यपूर्ण व्यंग्य लेखन के लिये विख्यात थे।

उन्होंने 1947 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक परीक्षा पास की। 1949 में राज्य सिविल सेवासे नौकरी शुरू की। 1983 में भारतीय प्रशासनिक सेवा से निवृत्त हुए। उनका विधिवत लेखन 1954 से शुरू होता है और इसी के साथ हिंदी गद्य का एक गौरवशाली अध्याय आकार लेने लगता है। उनका पहला प्रकाशित उपन्यास 'सूनी घाटी का सूरज' (1957) तथा पहला प्रकाशित व्यंग 'अंगद का पाँव' (1958) है। स्वतंत्रता के बाद के भारत के ग्रामीण जीवन की मूल्यहीनता को परत दर परत उघाड़ने वाले उपन्यास 'राग दरबारी' (1968) के लिये उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके इस उपन्यास पर एक दूरदर्शन-धारावाहिक का निर्माण भी हुआ। श्री शुक्ल को भारत सरकार ने 2008 में पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया है।

व्यक्तित्व
श्रीलाल शुक्ल का व्यक्तित्व अपनी मिसाल आप था। सहज लेकिन सतर्क, विनोदी लेकिन विद्वान, अनुशासनप्रिय लेकिन अराजक। श्रीलाल शुक्ल अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत और हिन्दी भाषा के विद्वान थे। श्रीलाल शुक्ल संगीत के शास्त्रीय और सुगम दोनों पक्षों के रसिक-मर्मज्ञ थे। 'कथाक्रम' समारोह समिति के वह अध्यक्ष रहे। श्रीलाल शुक्ल जी ने गरीबी झेली, संघर्ष किया, मगर उसके विलाप से लेखन को नहीं भरा। उन्हें नई पीढ़ी भी सबसे ज़्यादा पढ़ती है। वे नई पीढ़ी को सबसे अधिक समझने और पढ़ने वाले वरिष्ठ रचनाकारों में से एक रहे। न पढ़ने और लिखने के लिए लोग सैद्धांतिकी बनाते हैं। श्रीलाल जी का लिखना और पढ़ना रुका तो स्वास्थ्य के गंभीर कारणों के चलते। श्रीलाल शुक्ल का व्यक्तित्व बड़ा सहज था। वह हमेशा मुस्कुराकर सबका स्वागत करते थे। लेकिन अपनी बात बिना लाग-लपेट कहते थे। व्यक्तित्व की इसी ख़ूबी के चलते उन्होंने सरकारी सेवा में रहते हुए भी व्यवस्था पर करारी चोट करने वाली राग दरबारी जैसी रचना हिंदी साहित्य को दी।

रचनाएँ
• 10 उपन्यास, 4 कहानी संग्रह, 9 व्यंग्य संग्रह, 2 विनिबंध, 1 आलोचना पुस्तक आदि उनकी कीर्ति को बनाये रखेंगे। उनका पहला उपन्यास सूनी घाटी का सूरज 1957 में प्रकाशित हुआ। उनका सबसे लोकप्रिय उपन्यास राग दरबारी 1968 में छपा। राग दरबारी का पन्द्रह भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी में भी अनुवाद प्रकाशित हुआ। राग विराग श्रीलाल शुक्ल का आखिरी उपन्यास था। उन्होंने हिंदी साहित्य को कुल मिलाकर 25 रचनाएं दीं। इनमें मकान, पहला पड़ाव, अज्ञातवास और विश्रामपुर का संत प्रमुख हैं।
उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं -
1. सूनी घाट का सूरज (1957)
2. अज्ञातवास (1962)
3. ‘राग दरबारी (1968)
4. आदमी का ज़हर (1972)
5. सीमाएँ टूटती हैं (1973)
6. ‘मकान (1976)
7. ‘पहला पड़ाव’(1987)
8. ‘विश्रामपुर का संत (1998)
9. बब्बरसिंह और उसके साथी (1999)
10. राग विराग (2001)
11. ‘यह घर मेरी नहीं (1979)
12. सुरक्षा और अन्य कहानियाँ (1991)
13. इस उम्र में (2003)
14. दस प्रतिनिधि कहानियाँ (2003)
• उनकी प्रसिद्ध व्यंग्य रचनाएँ हैं-
1. अंगद का पाँव (1958)
2. यहाँ से वहाँ (1970)
3. मेरी श्रेष्‍ठ व्यंग्य रचनाएँ (1979)
4. उमरावनगर में कुछ दिन (1986)
5. कुछ ज़मीन में कुछ हवा में (1990)
6. आओ बैठ लें कुछ देरे (1995)
7. अगली शताब्दी का शहर (1996)
8. जहालत के पचास साल (2003)
9. खबरों की जुगाली (2005)
आलोचना
1. अज्ञेय:कुछ रंग और कुछ राग (1999)
विनिबंध
1. भगवतीचरण वर्मा (1989)
2. अमृतलाल नागर (1994)
उपन्यास:
सूनी घाटी का सूरज (1957)· अज्ञातवास · रागदरबारी · आदमी का ज़हर · सीमाएँ टूटती हैं
मकान · पहला पड़ाव · विश्रामपुर का सन्त · अंगद का पाँव · यहाँ से वहाँ · उमरावनगर में कुछ दिन
कहानी संग्रह:
यह घर मेरा नहीं है · सुरक्षा तथा अन्य कहानियां · इस उम्र में
व्यंग्य संग्रह:
अंगद का पांव · यहां से वहां · मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनायें · उमरावनगर में कुछ दिन · कुछ जमीन पर कुछ हवा में · आओ बैठ लें कुछ देर
आलोचना:
अज्ञेय: कुछ राग और कुछ रंग
विनिबन्ध:
भगवती चरण वर्मा · अमृतलाल नागर
बाल साहित्य:
बढबर सिंह और उसके साथी

निधन
ज्ञानपीठ पुरस्कार और पद्म भूषण से सम्मानित तथा 'राग दरबारी' जैसा कालजयी व्यंग्य उपन्यास लिखने वाले मशहूर व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल को 16 अक्टूबर को पार्किंसन बीमारी के कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 28 अक्टूबर 2011 को शुक्रवार सुबह 11.30 बजे सहारा अस्पताल में श्रीलाल शुक्ल का निधन हो गया।

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Displaying 1 - 5 of 5 reviews
Profile Image for Ayush Kumar.
34 reviews1 follower
March 28, 2020
इस क़िताब की पृष्ठभूमि आज़ादी के बाद चले भूदान आंदोलन पर है और उसके इर्द गिर्द एक सामंत का जीवन चित्र है। कहानी एक महिला से भी जुड़ी हुई है जो की सर्वोदय आंदोलन में जीवनदायनी के रूप में काम करते हुए उस सामंत और उसके बेटे दोनों के लिए महत्व पूर्ण हो जाती है। इन सब के बीच में मार्क्सवाद, गाँधीवाद और आजादी के बाद के भारत में सत्तारूढ़ पार्टी पर चलने वाली बहसें और उसका चित्रण हैं। इन सब के साथ साथ श्रीलाल शुक्ल जी का सुप्रसिद्ध व्यंग, कटाक्ष और राजनीतिक अर्थवयवस्था समझाने का अपना तरीका तो है ही और वव्यक्तित्व के अंतर्द्वंदों से जूझते मनुष्य को दिखाने का प्रयास भी है।
2 reviews
March 30, 2013
I find this book of Shrilal Shukla another classical gem. In the backdrop of the Bhoodan andolan this book take you on a journey from The Governor house to village level. Telling the real shortcomings of the Bhoodan andolan and the real challenges to make these kind of movement successful.
Profile Image for Divya Pal.
601 reviews3 followers
May 17, 2024
यह कथा स्वतंत्रता के पूर्व व तुरंत पश्चात का समय हमारे देश की दशा का एक अति उत्तम उदहारण है। यहां विशेष नागरिकों द्वारा गवर्नर पद, विदेश में राजदूत की नियुक्ति, किसी राष्ट्रीय संस्था के अध्यक्ष पद (gubernatorial position) की लालसा के लिए किये गए सभी निंदनीय साजिशों व षडयंत्रों और अन्य विशिष्ट लोगों से पैरवी (lobbying) करने का विस्तृत वर्णन है।
इसके अतिरिक्त आचार्य विनोभा भावे द्वारा स्थापित भूदान व् ग्रामदान आन्दोलनों का गहराई से विश्लेषण भी है - दोनों सफलताएं एवं त्रुटियां।
description
श्रीलाल शुक्ल की अपनी निराली शैली में देशवासियों में प्रचलित ढोंग-ढपोसले का मार्मिक चित्रण
अपने देशवासियों का स्वभाव है कि आदर्श की पुरानी गाथाएँ सुनते सुनते वे प्रतीक तो तथ्य मानने लगते हैं और आदर्श आचरण के प्रतीकात्मक कर्मकांड से वास्तविक ऐतिहासिक परिणामों की उम्मीद करने लगते हैं …।
जैसे, अवांछित जनसंख्या का समाधान महात्मा गाँधी अखंड ब्रह्मचर्य में खोजने लगे थे। सारा विचार खुले तौर पर इतना हवाई है। लगता है, आप पूरे समाज की सामान्य समझ का अपमान कर रहे हैं।
कुछ वैसा ही हाल अपने भूदान यज्ञ का है। खुली हवा और पानी की तरह साड़ी भूमि गोपाल की है! माना इससे कोई झगड़ा नहीं ! पर आदिम युग से आज तक भूमि की व्यवस्था को लेकर जो कुछ उल्टा-पुल्टा, सही-गलत किया गया है और आज भी कानूनी ताकत के सहारे जमीन के स्वामित्व की जो हैसियत है, उसे क्या एक आदर्श वाक्य के उच्चारण भर से आप ख़त्म कर देंगे?
हमारी सांस्कृतिक विविधता और विरासत को उपेक्षित करने और हमारी बौद्धिक क्षमताओं को नगण्य मानने का पाखंड, पश्चिमी संस्कृति का अनुकरण करने का दयनीय व्यवहार
बी. ए. की डिग्री के लिए कुंवर जयंतीप्रसादसिंह ने देश के एक ऐसे विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया था जिसे भारत का ऑक्सफ़ोर्ड कहा जाता था। (तब हमने प्रशंसा के ऐसे ही मापदंड बना रखे थे: उपन्यासकार वृंदावनलाल वर्मा को आलोचकगण हिंदी का सर वॉटर स्कॉट कहते थे, महाकवि कालिदास को भारत का शेक्सपियर, यहां तक कि ठा. गुरुभक्तसिंह 'भक्त' कैसे नवोदित कवि को हिंदी का वर्ड्सवर्थ!)

आँखों में वाशिंगटन का सपना न होता तब भी वे इस भीड़ को देख नहीं सकते थे। हर जटिल मानवीय त्रासदी को सुलभ मुहावरों और सैद्धांतिक शब्दजाल में डुबो देने की जो सहज क्षमता हमारे सत्तारूढ़ राजनीतिज्ञों में आ जाती है, वह उनमें बहुत पीला आ चुकी थी। वह यही क्षमता है जिसके सहारे हम आदिवासियों को सिर्फ लोककला के साथ, खेतिहर मजदूरों को प्रजातंत्र के सजक प्रहरी के रूप में या शोषित महिला वर्ग को भविष्य की क्रान्तिदर्शी चेतना बना कर रख देते हैं और उनकी समस्याओं से निगाह फेर लेते हैं। सत्तारूढ़ों के इस अंधेपन को हासिल करने के लिए अब उन्हें खुली आँखों में कोई दिलफरेब सपना पाले की ज़रूरत न रही थी।
धार्मिक तर्कों का दुरुपयोग और धर्म की निष्फलता
स्पष्ट था कि निर्मल भाई की प्रवृत्ति उन समन्वयवादी धर्मोपदेशकों की थी जो विभिन्न धर्मों की अलग-अलग आस्था-सम्बन्धी स्थापनाओं, पौराणिक मान्यताओं, कर्मकांडों और दैनंदिन व्यवहार की असमानताओं को नज़रअंदाज़ कर देते हैं और सिर्फ नैतिक मूल्यों की समानता का हवाला देकर घोषणा करते हैं कि सारे धर्म एक हैं। वे भूल जाते हैं कि अपने समग्र रूप में सारे धर्म आज मानव समाज में पारस्परिक घृणा, हिंसा और असहिष्णुता की पौधशाला बने हुए हैं ।
और अंत में, व्यक्तिगत स्तर पर यह एकतरफ़ा प्रेम (unrequited love) की कहानी भी है।
अत्यंत पठनीय।
Profile Image for Madhav.
118 reviews7 followers
February 22, 2025
बहुत दिनों बाद एक अच्छा हिंदी उपन्यास पढ़ा।
यह इतना अच्छा लगा कि सोचता हूं राग दरबारी दुबारा पढ़ूं। शायद पहले से भी ज्यादा अच्छा लगे।
आदमी का जहर मेरे पढ़ें हुए में श्रीलाल शुक्ल का तीसरा उपन्यास है। इनके अलावा बहुत सारे फुटकर व्यंग्य भी पढ़ा है।
हिंदी के बड़े साहित्यकारों की परम्परा के विपरीत, पठनीयता के मामले में श्रीलाल शुक्ल प्रेमचंदोत्तर साहित्यकारों में अद्वितीय हैं।
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