अफ़सोस है मैं इस किताब को देर से पढ़ा, साहित्य अकैडमी पुरस्कार (2023) प्राप्त यह किताब अंधविश्वास और लोक कथाओं पर गहरा चोट करती है सती प्रथा के आस पास बुनी गई और लिखी गई यह किताब झकझोर देती है। “मुझे पहचानों” किताब का नाम भी इतना रिलवेंट है कि अंत में किताब ख़त्म होने तक आप सोचते रहते है।
अंत में कई उदाहरण के प्रयोग से चाहे गाँधी हो या महाभारत सभी से लेखक ने बेहतर ढंग से समझाया है कि ज़िंदगी में मानव होना कितना ज़रूरी है। कुछ उपमा बेहतरीन लगेंगे आपको चाहे वो अजगर का ही क्यूँ ना हो।
धार्मिक अमानवीय मान्यताओं और पाखंडों को जिस तरह से किताब खंडित खंडित करती है वो बेहतरीन शब्द कमाल के है भाषा बेहतरीन है ।