प्रस्तुत पुस्तक के विषय में विशेष कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी उन इने-गिने चिंतकों में से हैं, जिनकी मूल निष्ठा भारत की पुरानी संस्कृति में है, लेकिन साथ ही नूतनता का आश्चर्यजनक सामंजस्य भी उनमें पाया जाता है। भारतीय संस्कृति, इतिहास, साहित्य, ज्योतिष भी उनमें पाया जाता है। भारतीय संस्कृति, इतिहास, साहित्य, ज्योतिष और विभिन्न धर्मो का उन्होंने गहराई के साथ अध्ययन किया है। उनकी विद्वत्ता की झलक इस पुस्तक के निबंधों में स्पष्ट दिखाई देती है। लेखक की एक झलक की एक और विशेषता है। वह यह कि छोटी-से-छोटी चीज में भी वह सूक्ष्म दृष्टि से देखते हैं। वसंत आता है, हमारे आस-पास की वनस्पति रंग-बिरंगे पुष्पों से आच्छादित हो उठती है, लेकिन उसमें से कितने हैं, जो उसके आकर्षक रूप को देख और पसंद कर पाते हैं ? अपनी जन्मभूमि का इतिहास हममें से कितने जानते हैं ? पर द्विवेदीजी की पैनी आँखें उन छोटी, पर महत्त्वपूर्ण चीजों को बिना देखे नहीं रह सकीं।
शिक्षा और साहित्य के बारे में द्विवेदी जी का दृष्टिकोण बहुत ही स्वस्थ है। पाठक देखेंगे कि तद्विषयक निबन्धों में साहित्य एवं शिक्षा को जनहित की उन्होंने एक नवीन दिशा सुझाई है। यदि उसका अनुसरण किया जा सकें तो राष्ट्र-उत्थान के लिए बड़ा काम हो सकता है।
पुस्तक की भाषा और शैली के बारे में तो कहना ही क्या ? भाषा चुस्त और शैली प्रवाहयुक्त है। कहीं-कहीं पर कठिन शब्द के साथ कुछ ऐसा वातावरण रहता है कि कभी-कभी कठिन शब्दों के प्रयोग से बचा नहीं जा सकता।
आधुनिक युग के मौलिक निबंधकार और उत्कृष्ट समालोचक आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म १९ अगस्त १९०७ को बलिया जिले के छपरा नामक ग्राम में हुआ था। उनका परिवार ज्योतिष विद्या के लिए प्रसिद्ध था। उनके पिता पं. अनमोल द्विवेदी संस्कृत के प्रकांड पंडित थे।
द्विवेदी जी की प्रारंभिक शिक्षा गाँव के स्कूल में ही हुई और वहीं से उन्होंने मिडिल की परीक्षा पास की। इसके पश्चात उन्होंने इंटर की परीक्षा और ज्योतिष विषय लेकर आचार्य की परीक्षा उत्तीर्ण की।
शिक्षा प्राप्ति के पश्चात द्विवेदी जी शांति निकेतन चले गए और कई वर्षों तक वहाँ हिंदी विभाग में कार्य करते रहे। शांति–निकेतन में रवींद्रनाथ ठाकुर तथा आचार्य क्षिति मोहन सेन के प्रभाव से साहित्य का गहन अध्ययन और उसकी रचना प्रारंभ की।
द्विवेदी जी का व्यक्तित्व बड़ा प्रभावशाली है। उनका स्वभाव बड़ा सरल और उदार है। वे हिंदी अंग्रेज़ी, संस्कृत और बंगला भाषाओं के विद्वान हैं। भक्तिकालीन साहित्य का उन्हें अच्छा ज्ञान है। लखनऊ विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट. की उपाधि देकर उनका विशेष सम्मान किया है।
रचनाएँ – द्विवेदी जी की रचनाएँ दो प्रकार की हैं, मौलिक और अनूदित। उनकी मौलिक रचनाऔं में सूर साहित्य हिंदी साहित्य की भूमिका, कबीर, विचार और वितर्क अशोक के फूल, वाण भट्ट की आत्म–कथा आदि मुख्य हैं। प्रबंध चिंतामणी, पुरातन प्रबंध–संग्रह, विश्व परिचय, लाल कनेर आदि द्विवेदी जी की अनूदित रचनाएँ हैं।
इनके अतिरिक्त द्विवेदी जी ने अनेक स्वतंत्र निबंधों की रचना की है जो विभिन्न पत्र–पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं।
वर्ण्य विषय – द्विवेदी जी के निबंधों के विषय भारतीय संस्कृति, इतिहास, ज्योतिष, साहित्य विविध धर्मों और संप्रदायों का विवेचन आदि है। वर्गीकरण की दृष्टि से द्विवेदी जी के निबंध दो भागों में विभाजित किए जा सकते हैं — विचारात्मक और आलोचनात्मक।
विचारात्मक निबंधों की दो श्रेणियाँ हैं। प्रथम श्रेणी के निबंधों में दार्शनिक तत्वों की प्रधानता रहती है। द्वितीय श्रेणी के निबंध सामाजिक जीवन संबंधी होते हैं।
आलोचनात्मक निबंध भी दो श्रेणियों में बाँटें जा सकते हैं। प्रथम श्रेणी में ऐसे निबंध हैं जिनमें साहित्य के विभिन्न अंगों का शास्त्रीय दृष्टि से विवेचन किया गया है और द्वितीय श्रेणी में वे निबंध आते हैं जिनमें साहित्यकारों की कृतियों पर आलोचनात्मक दृष्टि से विचार हुआ है। द्विवेदी जी के इन निबंधों में विचारों की गहनता, निरीक्षण की नवीनता और विश्लेषण की सूक्ष्मता रहती है।
भाषा – द्विवेदी जी की भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली है। उन्होंने भाव और विषय के अनुसार ही भाषा का प्रयोग किया है। उनकी भाषा के दो रूप दिखलाई पड़ते हैं – १. सरल साहित्यिक भाषा, २. संस्कृत गर्भित क्लिष्ट भाषा। प्रथम रूप द्विवेदी जी के सामान्य निबंधों में मिलता है। इस प्रकार की भाषा में उर्दू और अंग्रेज़ी के शब्दों का भी समावेश हुआ है। सर्वत्र ही स्वाभाविक और प्रवाहमयता मिलती है।
द्विवेदी जी की भाषा का दूसरा रूप उनकी आलोचनात्मक रचनाओं में मिलता है। इनमें संस्कृत के तत्सम शब्दों की प्रधानता है। यह भाषा अधिक संयत और प्रांजल है। इस भाषा में भी कहीं कृत्रिमता या चमत्कार प्रदर्शन नहीं है और वह स्वाभाविक और प्रवाहपूर्ण है।
शैली – द्विवेदी जी की रचनाओं में उनकी शैली के निम्नलिखित रूप मिलते हैं — १. गवेषणात्मक शैली – द्विवेदी जी के विचारात्मक तथा आलोचनात्मक निबंध इस शैली में लिखे गए हैं। यह शैली द्विवेदी जी की प्रतिनिधि शैली है। इस शैली की भाषा संस्कृत प्रधान और अधिक प्रांजल है। वाक्य कुछ बड़े–बड़े हैं। इस शैली का एक उदाहरण देखिए— 'लोक और शास्त्र का समन्वय, ग्राहस्थ और वैराग्य का समन्वय, भक्ति और ज्ञान का समन्वय, भाषा और संस्कृति का समन्वय, निर्गुण और सगुण का समन्वय, कथा और तत्व ज्ञान का समन्वय, ब्राह्मण और चांडाल का समन्वय, पांडित्य और अपांडित्य का समन्वय, राम चरित मानस शुरू से आखिर तक समन्वय का काव्य है।'
२. वर्णनात्मक शैली – द्विवेदी जी की वर्णनात्मक शैली अत्यंत स्वाभाविक एवं रोचक है। इस शैली में हिंदी के शब्दों की प्रधानता है, साथ ही संस्कृत के तत्सम और उर्दू के प्रचलित शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। वाक्य अपेक्षाकृत बड़े हैं।
३. व्यंग्यात्मक शैली – द्विवेदी जी के निबंधों में व्यंग्यात्मक शैली का बहुत ही सफल और सुंदर प्रयोग हुआ है। इस शैली में भाषा चलती हुई तथा उर्दू, फारसी आदि के शब्दों का प्रयोग मिलता है।
४. व्यास शैली – द्विवेदी जी ने जहाँ अपने विषय को विस्तारपूर्वक समझाया है, वहाँ उन्होंने व्यास शैली को अपनाया है। इस शैली के अंतर्गत वे विषय का प्रतिपादन व्याख्यात्मक ढंग से करते हैं और अंत में उसका सार दे देते हैं।
A truly secular work, free from prejudice, this book offers a collection of beautifully crafted essays on Indian culture, history, and society. It is a delightful blend of humor, historical depth, and an interdisciplinary approach—a perfect book in its own right. You can find it on Internet Archive.
'अशोक के फूल' हजारीप्रसाद द्विवेदी का लिखा हुआ एक निबंध संग्रह है। हिंदी साहित्य जगत में हजारीप्रसाद द्विवेदी का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। वह हिंदी साहित्य के उन गिने चुने चिंतकों की परंपरा के थे जिन्हें आचार्य कहकर सम्मान दिया गया था। द्विवेदी जी की रचनाओं में अथाह ज्ञान और उसके पीछे की गयी कड़ी परिश्रम साफ़ झलकती है। कुछ विषयवस्तुएँ ऐसी होती हैं जिन्हें हिंदी के साहित्यकार अन्य विषयविदों के लिए छोड़ दिया करते थे, मसलन इतिहास, शिक्षाशास्त्र इत्यादि। द्विवेदी जी ने इन विषयों को भी अपनी लेखनी का विषय बनाया। उसके तीन परिणाम हुए। एक तो सामान्य पाठक तक भारतीय इतिहास को पहुँचाना सुगम हो गया क्योंकि कितने ही पाठक इतिहास विशेष की पुस्तकें पढ़ते होंगे। दूसरा, हिंदी के साहित्यकारों में अपने इतिहास और अपनी संस्कृति के प्रति जागरूकता बढ़ी और साहित्य में निज विषयों का प्रयोग करने की परम्परा का सूत्रपात हुआ। राहुल सांकृत्यायन की रचनाओं में भी इस इतिहास की झलक देखी जा सकती है, हालाँकि उस पर कुछ आलोचकों ने विवाद उत्पन्न करने की कोशिश भी की। तीसरा, ऐतिहासिक खोजों को एक बड़े समूह द्वारा समालोचित किया जाने लगा जिससे उसकी गुणवत्ता में सुधार की आशा की जा सकती थी। ऐसा नहीं था कि उसकी गुणवत्ता ख़राब थी किन्तु किसी सिद्धांत की जितनी ज्यादा समीक्षा होगा वह उसके लिए उतना ही अच्छा होगा।
'अशोक का फूल' निबंध संग्रह में द्विवेदी जी ने विविध प्रकार के विषयों को छुआ है। उन्होंने प्रकृति के लिए 'अशोक के फूल', 'वसंत आ गया है' और 'एक कुत्ता और एक मैना' जैसे निबंध लिखे हैं - लेकिन इन निबन्धों में भी बात सिर्फ साहित्य तक सीमित नहीं रही है - तो साहित्यिक समीक्षा के लिए 'आलोचना का स्वतंत्र मान' और 'साहित्यकारों का दायित्व' जैसे निबन्धों में उन्होंने समकालीन हिंदी साहित्य का अनुभव निचोड़कर रख दिया है। इतिहास को आधार में रखकर लिखे गए 'भारतीय संस्कृति की देन', 'संस्कृत का साहित्य' और 'भारतीय फलित ज्योतिष' निबन्धों में द्विवेदी जी ने इतिहास के सूक्ष्म अध्ययन का परिचय देते हुए कई घटनाओं को, जो प्रथम दृष्टतया बहुत अलग जान पड़ती हैं, एक साझा पृष्ठभूमि प्रदान की है। भारत के युग प्रवतकों जैसे कबीर और रवींद्रनाथ टैगोर को जगह जगह पर उद्धृत किया गया है, बल्कि टैगोर पर पूरा एक निबंध लिखा है। इसके पीछे लेखक का शांतिनिकेतन में पाठन करना एक कारण हो सकता है।
इस पुस्तक के प्रकाशन के समय देश बदलाव के दौर से गुजर रहा था। हिंदी साहित्य में नव चेतना का जागरण हो रहा था। देश स्वाधीन हो गया था। इस समय के साहित्यकारों के दायित्व पर द्विवेदी जी ने विशेष बल दिया है। द्विवेदी जी का कहना है कि साहित्य को हमेशा किसी बड़े उद्द्येश्य की पूर्ति के लिए कार्य करना चाहिए और उन्होंने मानव की सेवा को ही वह लक्ष्य माना है। एक निबंध में द्विवेदी जी ने कहा भी है कि मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है और साहित्य साध्य नहीं है बल्कि साधन है और उसको उसी रूप में प्रयोग करना चाहिए। साहित्य का उद्द्येश्य विलास का न होकर चरित्र-विकास का होना चाहए। इसीलिए उन्होंने बाल साहित्य के विकास पर जोर दिया है। साथ ही साथ उन्होंने प्राचीन भारतीय साहित्य को भारतीयों द्वारा पढ़े जाने और उनके अर्थ निकालने पर जोर दिया है। पश्चिम के कई विद्वानों ने इस क्षेत्र में कार्य किया है और यह सराहनीय है लेकिन उनके लिए प्राचीन भारतीय साहित्य संग्रहालय में रखने की वस्तु है जिसकी सुंदरता की सिर्फ तारीफ की जा सकती है जबकि हम भारतीयों के लिए यह अपनाने की चीज है।
इस पुस्तक के निबन्धों से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि द्विवेदी जी स्वयं अनेक रूढ़ियों में विश्वास नहीं करते थे लेकिन फिर भी उन्होंने उन रूढ़ियों और परम्पराओं के पीछे के कारणों की पड़ताल की है। उदाहरण के लिए फलित ज्योतिष को लिया जा सकता है। निबंध के पन्नों में कभी यह नहीं लगा कि द्विवेदी जी की आस्था उनमें है लेकिन फिर भी उन्होंने उसके इतिहास का बारीकी से अध्ययन किया और कौन सी परम्परा किस क्षेत्र से आयी, कैसे आयी और क्यों अपनायी गई, यह उन्होंने बताया है। द्विवेदी जी के इस कार्य से कहा जा सकता है वह पुरातनपंथी नहीं थे लेकिन पुराने साहित्य को सिर्फ पुराना कहकर त्याग देना कहीं से भी श्रेयस्कर नहीं है और शायद एक सच्चे साहित्य मनीषी की यही पहचान है।