झूठा सच - " वतन से देश के भविष्य तक"
झूठा सच - १९४३ से १९४७ तक के सयुंक्त पंजाब व विभाजन के पश्चात के खंडित पंजाब का सचित्र, मार्मिक व संवेदनाओं से परिपूर्ण दस्तावेज; जहाँ न लाहौर की गवालमंडी व शहलामी दरवाजा छूटा न ही पंजाब का लुधियाना या जालंधर। विभाजन की त्रासदी झेल रहे सर्वसाधारण का दर्द दारुण रूप से चीख चीख कर उपन्यास के प्रत्येक पन्नों पर उतरा है। पश्चिमी पंजाब से आने वाली हिन्दुओं के लाश से भरी रेलगाड़ियां, स्त्रियों के निर्वस्त्र शरीर का सड़कों पर खुलेआम प्रदर्शन, बच्चों की बेबस चीखें , शरणार्थियों का असहाय निर्जर शरीर, लाशों से भरी पूरी सड़क का दमघोंटू वातावरण, दुर्गन्ध से दहलता समस्त पंजाब, कैंपों में भेड़ - बकरियों से कई गुना बुरी अवस्था में " मनुष्य" आदि अनेक दृश्य पाठक के नेत्रों के समक्ष किसी चलचित्र की भांति चलते रहते हैं,ऐसे दारुण दृश्य जिन्हें ना तो देखते ही बनता है,ना ही आँख मूँदते; ऐसी त्रासदी के दर्द को महसूस ना करना हमारे द्वारा उन पर किया गया एक अत्याचार ही होगा। आजाद भारत की खुशी ऐसे दर्दनाक व दारुण चित्रण को देख ह्रदय के भीतर कहीं बड़े से पत्थर के नीचे दब जाती है।
" सभ्य समाज के अनुसार स्त्री की सबसे बड़ी आबरू उसकी देह है",जो तत्कालीन समय में उसी समाज की आंँखों में आगे सरेआम; खुले बाजार में बेची जा रही थी और "समाज" आंँखों को खोला हुआ अंधा बना घूम रहा था। धरती का बँटवारा हुआ, लोग "देश से वतन" और " वतन से देश" गए लेकिन अभागिन स्त्रियों के हिस्से ना देश आया ना वतन, उनके हिस्से आई मात्र " चरित्रहीनता"। वे अपने परिवारों से दुत्कारी गईं,अपने मासूम बच्चों से अलग कर दी गई;( बच्चे केवल पिता के हो गए थे,), बहुत सी लडकियांँ सामने खड़ी होती हुईं भी परिवार वालों के लिए मर गईं, क्योंकि "उन्होंने रात ना जाने कहांँ गुजारी थी।"" देश का विभाजन एक बार हुआ लेकिन लडकियांँ अनेक बार अनेक तरीके से विभाजित हुईं।"
जनसामान्य ( विशेषत: मध्यमवर्ग) वर्तमान समय की भांँति तत्कालीन समय में भी दो चक्की के मध्य पिस रहा था। आजाद के आंदोलन के समय वह जेल में रहा और विभाजन के पश्चात बेरोजगार घूमता सड़कों पर। नेता,राजनेता, अफसर , बाबू सब खद्दर पहने तब से आज तक भाषण दे रहे। " गाँधी अपने जीवनकाल में गरीबों व असहाय लोगों के थे, मृत्योपरांत नेता व अमीरों के हो गए।"
बापू के आदर्श व सिद्धान्त "गांधी टोपी" व खद्दर के कुर्ते - पायजामे तक रह गए। जनसामान्य के बापू राजघाट तक सीमित हो गए।
" चाचा जी" के पास राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय समस्याएं थीं इसलिए वे भाषण में ( चाहे वह १९४७ का हो या १९५७ का) साधारण जनता से हर बार कहते -" आप लोग छोटे - छोटे व्यक्तिगत मामलों से ऊपर उठ कर देखना नहीं चाहते। " " हमारे सामने बड़े बड़े मामले है"। अर्थात् देश की जनता की समस्याएं छोटी हैं,उनका मामला छोटा है, "देश के लोग ही छोटे हैं।"
हुआ इतना कि देश अंग्रेज अधिकारियों से देश के अधिकारियों के हाथ में आ गया। " कुर्सी पर अधिकारी ही थे",जो भूलवश अपने आपको " जनसेवक" कह बैठते थे।
ये " जनसेवक बैठेकर पंचवर्षीय योजनाएं बनाते, प्रस्ताव पारित करते और राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय मसलों पर ध्यान देते।" अधिकारी ऊपर बैठे और ऊपर उठते जा रहे थे,जनता नीचे बैठी और नीचे जाती जा रही थी।।"
- तुलसी गर्ग