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भूख और अन्य कहानियाँ : गाँव की कहानियाँ
इस संग्रह की कहानियों में गाँवों में बढ़ रहे सांप्रदायिक वैमनस्य को चिह्नित किया गया है और इसके लिए राजनीति को दोषी ठहराया गया है--
जनमत, मार्च 2003
युवा कथाकार सुभाय चंद्र कुशवाहा कहानी कला के सभी रूप-प्रकारों को अपदस्थ करके कहानी में सरलता के नैरेटिव को फिर से बहाल करते हैं।
भूमंडलीकरण ने समस्याओं के वास्तविक रूपों को तिरोहित कर दिया है। पुरानी सामाजिक दशाओं को वहीं का वहीं छोड़कर यह समाज नई दशाएँ निर्मित करने लगा है। कुशवाहा, इस छूट गए या छोड़ दिए गए प्रश्नों के कथाकार हैं।
इंडिया टुडे, 24 नवंबर 2003
इस संग्रह की कहानियों में गाँव-शहर में बसे व्यक्ति की मधुर स्मृति के रूप में नहीं आता। यहाँ हम उस यथार्थ को पाते हैं, जो भूमंडलीय स्तर पर चल रही आर्थिक प्रक्रियाओं के चलते हमारे गाँवो&#
जनमत, मार्च 2003
युवा कथाकार सुभाय चंद्र कुशवाहा कहानी कला के सभी रूप-प्रकारों को अपदस्थ करके कहानी में सरलता के नैरेटिव को फिर से बहाल करते हैं।
भूमंडलीकरण ने समस्याओं के वास्तविक रूपों को तिरोहित कर दिया है। पुरानी सामाजिक दशाओं को वहीं का वहीं छोड़कर यह समाज नई दशाएँ निर्मित करने लगा है। कुशवाहा, इस छूट गए या छोड़ दिए गए प्रश्नों के कथाकार हैं।
इंडिया टुडे, 24 नवंबर 2003
इस संग्रह की कहानियों में गाँव-शहर में बसे व्यक्ति की मधुर स्मृति के रूप में नहीं आता। यहाँ हम उस यथार्थ को पाते हैं, जो भूमंडलीय स्तर पर चल रही आर्थिक प्रक्रियाओं के चलते हमारे गाँवो&#
142 pages, Kindle Edition
Published December 17, 2022
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