कहानी के अंश मैं अभी बहू के पैरों को देख रही थी, तभी डोरबेल की आवाज सुनाई पड़ी, डोरबेल की आवाज सुनकर मैं असमंजस में पड़ गई कि इस वक्त कौन होगा, इतनी रात के समय आखिर कौन दरवाजे पर खड़ा है, मैंने घड़ी की तरफ देखा तो रात के 11 बज रहे थे, पहले मैंने सोचा कि बहू को उठाती हूँ, वह अगर दरवाजा खोलने का आदेश देगी तभी दरवाज़ा खोलूंगी, लेकिन बहुत सो रही थी और उसके दोनों खूबसूरत पैर इस वक्त आराम कर रहे थें, मैं एक दासी होकर कैसे अपनी बहू को उठा सकती थी, इसलिए खुद कमरे से बाहर निकली, बरामदे में पहुंची और पर्दा हटाकर देखी तो सामने कोई और नहीं बल्कि मेरी बहू की मम्मी सरोज जी खड़ी थी।सरोज जी को देखकर मुझे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ, इतनी रात को यहां क्या कर रही हैं, कल मैं अपनी बहू के साथ सरोज जी के घर जाने वाली थी, ल&#