वैसे तो मैं अपनी बात बंद खिड़कियाँ चंद अल्फाज़ की 51 कविताओं के माध्यम से कह रही हूं, लेकिन मुझे लगता है कि मेरी अपनी बात का यह अंत नहीं है जब तक अपनी बात के शब्द मन में घूमते रहते हैं फिर वे एक पंक्ति में आकर मेरे सामने खड़े हो जाते हैं दूसरे शब्दों को आवाज देते हैं और देखते देखते ही किसी गीत या कविता का रूप ले लेते हैं दो-चार दिन के मंथन के बाद यह कविता रजिस्टर के पन्ने पर अपना अधिकार जमा लेती और तब जाकर मुझे कुछ राहत मिलती.अपनी यह बात समाप्त होगी तो कैसे- कभी (धुप तो कभी छांव सी है जिंदगी / कभी खुशी तो कभी गम की परछाई सी है जिंदगी) हम सभी समाज के अंग है और जो कुछ भी समाज में घटता है उससे हम अछूते नहीं रह सकते आज का आदमी लगता है संवेदनहीनता की पर पीड़ा से दूर होता जा रहा है किसी के दुख से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं,और किसी भी हादसे से विचलित नहीं होता. लगातार उसके भीतर कुछ मर रहा है,ऐसे में मेरे भीतर का कवि चुपचाप नहीं बैठ पाता और अपनी बात कहने में लग जाता है वह बात निरंतर कविता कहानी लेख के माध्यम से बहती रहती है और आज फिर से अपनी उस बात का एक अंश बंद खिड़कियां चंद अल्फाज का हिस्सा बन रहा है
बंद खिड़कियां चंद अल्फाज़ एक कविता संग्रह है जिसमें हमें हमारी आम जिदंगी से जुड़े काफी पहलुओं को एक कविता के प्रारूप में देखने को मिलता हैं। इस किताब में आपको ५० कविताएं मिलेंगी जो की विभिन्न मुद्दों को छूती है। इसमें से कुछ कविताएं आपको हसाएगी तो कुछ सोचने पे मजबूर भी करेगी । यह किताब कविताओ के माध्यम से उन सभी भावनाओ का संग्रह है जिन्हें एक सामान्य मनुष्य अपने निजी एवं सामाजिक जीवन में अनुभव करता है। इस पुस्तक ने हर उस विचार एवं अवस्था को दर्शाने का प्रयास किया है जिसे एक मनुष्य अपने जीवन में बोझ समझकर लिए घूमता है। जीवन के काफी रंगो को एक साथ देखने के लिए और यदि आप भी कविताएं पढ़ना एवम लिखना पसंद करते है तो इस किताब को जरूर पढ़े ।