कहानियों की किताब में शायद ही ऐसा होता है कि सभी कहानियां एक से एक हों। इस किताब में 14 कहानियां हैं और कोई भी कहानी निराश नहीं करती है। ये सभी कहानियां लेखक ने सिंदूरी नदी के किनारे बसे अपने गांव मदनपुर के लोगों और खुद पर लिखी हैं। कहानियां ऐसी हैं कि गांव में बसा कोई भी व्यक्ति रिलेट कर जाता है।
“कल्लो तुम बिक गईं ” में लेखक ने बताया कि कैसे गांवों में पालतू पशु और कृषक की भावनाएं एक - दूसरे से जुड़ जाती हैं। पहले के समय में गाय के गोबर से कच्चा घर लीपा जाता था, उसके गोबर से कंडे बनाए जाते थे, उसका गोबर खेत में खाद के रूप में काम आता था, उसके बछड़े बड़े होकर बैल बन जाते और खेत की जुताई के काम आते और गाय का दूध घर के काम आता , जिससे घी, छाछ, दही बनता। आज के समय में गाय का पहले जैसा महत्व नहीं रहा है। कच्चे घर की जगह पक्के घर बन गए हैं, कंडे की जगह एलपीजी सिलेंडर ने ले ली है, जैविक खाद की जगह रसायनिक खाद आ गए हैं, बैलों की जगह ट्रैक्टर ने ले ली है। गाय का काम आज के समय में सिर्फ दूध देना रह गया है। महत्व घटने के कारण किसानों से गाय की दूरी बढती जा रही है।
“रामदई हमने टीवी नही देखी” में ऐसे दलित लड़के की मनोव्यथा कही गई है जिसने कभी टीवी नही देखा। टीवी पर आने वाली फिल्मों के बारे में अपने दोस्तों से सिर्फ सुना भर है। सुन - सुनकर ही उसे फिल्मों की कहानी याद हो जाती है लेकिन मन में अफसोस रहता है कि उसने कभी टीवी नही देखा। वजह? वजह, यही कि दलित होने के कारण उसे कोई घर में नही घुसने देता है।
“धन्ना तो बा की राधा संगे गोल हो गयो” में एक चोर दूर के एक गांव के मंदिर से राधा की मूर्ति चोरी करके लाता है और अपने गांव में एक पेड़ के नीचे दबा देता है और अपनी पत्नी के माध्यम से पूरे गांव में यह प्रचार करा देता है कि कई दिनों से राधा उसके सपनों में आ रही हैं और बोल रही हैं कि जमीन से निकालकर मेरा उद्धार करो। गांव वाले उस जगह जाकर खुदाई करते हैं तो वहां राधा की मूर्ति पाकर एक चोर को सिद्ध बाबा घोषित कर देते हैं। बाबा बनने की चाह रखने वाले लोग यह तरीका अपना सकते हैं।
“खूंटा की लुगाई भी बह गई” में ऐसी स्त्री की व्यथा का चित्रण किया गया है जिसका पति नदी में बह गया है और वह उसी के शोक में पागल हो जाती है और आखिर में खुद भी उसी नदी में छलांग लगा देती है।
लड़कों के बारे में कहा जाता है कि अगर एक लड़की उनकी ओर बस एक निगाह भर देख भी ले तो वे उससे शादी तक की बात सोच लेते हैं। “वे दो पत्थर” में लड़कों की इसी मनोदशा का वर्णन है।