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Nadi Sinduri
'नदी सिंदूरी'
शिरीष खरे की 'नदी सिंदूरी' आत्मीय संस्मरणों का इन्द्रधनुषी वितान खड़ा करती है, जिनमें पात्रों और उनके परिवेश का जीवंत चित्रण हमारे पुतलियों के परदे पर चलचित्र-सा गतिमान हो उठता है। नर्मदा की सहायक नदी सिंदूरी के किनारे का गाँव मदनपुर के पात्रों की मानवीयता और विद्रूपता, जड़ता और गतिशीलता रचनाकार के सहज-स्वभाविक कहन के साथ स्वतः कथाओं में ढलती चली गई है। यहाँ अवधेश और भूरा की अपूर्व प्रेमकथा है तो दलित युवक बसंत की बहादुरी की कहानी भी। आदर्शवादी ओपी यादव मास्साब का स्वाभिमान, बलबीर गोंड की आँखों में बस ड्राईवर बनने का संघर्ष भी। बांसुरी वादक कैलाश पाली, नाई राजू सेन, फोटोग्राफर केशव जोगी, बाढ़ में बहने वाला खूंटा और विरह में पागल उसकी पत्नी आदि-आदि अपने सुख-दुःख, सपने-यथार्थ, लालसा-कामना के विविध रंगों से इन संस्मरणों को बहुरंगी-अतरंगी बना रहे हैं। लेखनी के कैनवास में धन्ना चोर से लेकर कल्लो गाय तक सब समा गए हैं।''
-रणेन्द्र, सुप्रसिद्ध लेखक
''युवा लेखक शिरीष खरे का लेखन वैचारिक और साहित्यिक कसौटियों पर खरा उतरता है।''
-काशीनाथ सिंह, सुप्रसिद्ध लेखक
''पश्चिम की शार्ट-स्टोरीज शैली वाली किताबों से हटकर लिखी गई एक भिन्न तरह की किताब है। स्मृतियों के सहारे कथा बनाना आसान होता है, लेकिन यह किताब अलग विधा में लिखी गई है। जो घटनाएँ चरित्रों की तरह दिखाई देने लगे तब रचना साधारण नहीं रह जाती है। 'नदी सिंदूरी' एक ऐसी ही रचना है। इसमें नर्मदा की उपनदी सिंदूरी के किनारे मदनपुर गाँव के पात्रों की लंबी सूची दी गई है। ये पात्र ऐसे वक्त की नुमाइन्दगी करते हैं जो वक्त हमारे हाथ से निकल गया है।''
-प्रो. अभय कुार दुबे, सुप्रसिद्ध समाज-वैज्ञानिक
शिरीष खरे की 'नदी सिंदूरी' आत्मीय संस्मरणों का इन्द्रधनुषी वितान खड़ा करती है, जिनमें पात्रों और उनके परिवेश का जीवंत चित्रण हमारे पुतलियों के परदे पर चलचित्र-सा गतिमान हो उठता है। नर्मदा की सहायक नदी सिंदूरी के किनारे का गाँव मदनपुर के पात्रों की मानवीयता और विद्रूपता, जड़ता और गतिशीलता रचनाकार के सहज-स्वभाविक कहन के साथ स्वतः कथाओं में ढलती चली गई है। यहाँ अवधेश और भूरा की अपूर्व प्रेमकथा है तो दलित युवक बसंत की बहादुरी की कहानी भी। आदर्शवादी ओपी यादव मास्साब का स्वाभिमान, बलबीर गोंड की आँखों में बस ड्राईवर बनने का संघर्ष भी। बांसुरी वादक कैलाश पाली, नाई राजू सेन, फोटोग्राफर केशव जोगी, बाढ़ में बहने वाला खूंटा और विरह में पागल उसकी पत्नी आदि-आदि अपने सुख-दुःख, सपने-यथार्थ, लालसा-कामना के विविध रंगों से इन संस्मरणों को बहुरंगी-अतरंगी बना रहे हैं। लेखनी के कैनवास में धन्ना चोर से लेकर कल्लो गाय तक सब समा गए हैं।''
-रणेन्द्र, सुप्रसिद्ध लेखक
''युवा लेखक शिरीष खरे का लेखन वैचारिक और साहित्यिक कसौटियों पर खरा उतरता है।''
-काशीनाथ सिंह, सुप्रसिद्ध लेखक
''पश्चिम की शार्ट-स्टोरीज शैली वाली किताबों से हटकर लिखी गई एक भिन्न तरह की किताब है। स्मृतियों के सहारे कथा बनाना आसान होता है, लेकिन यह किताब अलग विधा में लिखी गई है। जो घटनाएँ चरित्रों की तरह दिखाई देने लगे तब रचना साधारण नहीं रह जाती है। 'नदी सिंदूरी' एक ऐसी ही रचना है। इसमें नर्मदा की उपनदी सिंदूरी के किनारे मदनपुर गाँव के पात्रों की लंबी सूची दी गई है। ये पात्र ऐसे वक्त की नुमाइन्दगी करते हैं जो वक्त हमारे हाथ से निकल गया है।''
-प्रो. अभय कुार दुबे, सुप्रसिद्ध समाज-वैज्ञानिक
160 pages, Paperback
First published March 7, 2023
About the author
Shirish Khare
3 books24 followers'Shirish Khare is a journalist and author. His book Ek Desh Barah Duniya is a collection of reportage on rural life and social realities from different parts of India. Nadi Sinduri focuses on the life, memories, culture, and social relationships surrounding his native village, Madanpur, and the Sinduri River. He has received several awards for journalism, including an award from the Press Council of India.
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Community Reviews
Displaying 1 - 2 of 2 reviews
March 25, 2023
ये तो तय है कुछ लेखक आपको अपने शब्दों से बीते हुए समय तक ले जाते है उसी में है शिरीष खरे सर, इनकी इससे पहले आयी किताब “एक देश बारह दुनिया” भी कमाल थी जिसे बहुत पढ़ा गया और बहुत सराहा भी गया। “नदी सिंदूरी” भी एक ऐसी किताब है जो आपको अपने बहाव में ख़ूबसूरती से ले जाती है। मज़े की बात है अगर आप किसी भी क़स्बे या गाँव में कुछ समय भी बिताय है तो यह किताब अपने सभी कैरेक्टर के ज़रिए आपको वापस अपनी स्मृति में ले जाती है। वैसे ही इस किताब में एक जगह लाला रामस्वरूप रामनारायण पंचांग का भी ज़िक्र है अगर आप मध्यप्रदेश, छत्तिशगढ़ या आस पास के किसी भी गाँव से है तो इस पंचांग के महत्व के बारे में आप एक बार ज़रूर सोचते है।
नदी सिंदूरी के आस पास सारी कहानियाँ आपको महसूस तो कराती है समाज के अलग अलग रंग जिनकी हर एक कैरेक्टर के साथ आपको लगेगा कि आपका रिश्ता पुराना है। हर चैप्टर के १-२ पैरा के बाद लगेगा आप दूर से कहीं किताब के अंदर हो रही घटनाओं को देख रहे है जो आपको होल्ड करती है अपने तरीक़े से।
इस किताब के कुछ कैरेक्टर ने अच्छा प्रभाव डाला मुझ पर जैसे सत्य पंडित जी,यादव जी या फिर बसंत। समाज की कई परतें आपको पढ़ने को मिलेंगी।
घूम लीजिए एक चक्कर नदी सिंदूरी के आस पास
शुक्रिया Shirish Khare सर इस किताब के लिए 📖📖🫡💐
नदी सिंदूरी के आस पास सारी कहानियाँ आपको महसूस तो कराती है समाज के अलग अलग रंग जिनकी हर एक कैरेक्टर के साथ आपको लगेगा कि आपका रिश्ता पुराना है। हर चैप्टर के १-२ पैरा के बाद लगेगा आप दूर से कहीं किताब के अंदर हो रही घटनाओं को देख रहे है जो आपको होल्ड करती है अपने तरीक़े से।
इस किताब के कुछ कैरेक्टर ने अच्छा प्रभाव डाला मुझ पर जैसे सत्य पंडित जी,यादव जी या फिर बसंत। समाज की कई परतें आपको पढ़ने को मिलेंगी।
घूम लीजिए एक चक्कर नदी सिंदूरी के आस पास
शुक्रिया Shirish Khare सर इस किताब के लिए 📖📖🫡💐
December 1, 2023
कहानियों की किताब में शायद ही ऐसा होता है कि सभी कहानियां एक से एक हों। इस किताब में 14 कहानियां हैं और कोई भी कहानी निराश नहीं करती है। ये सभी कहानियां लेखक ने सिंदूरी नदी के किनारे बसे अपने गांव मदनपुर के लोगों और खुद पर लिखी हैं। कहानियां ऐसी हैं कि गांव में बसा कोई भी व्यक्ति रिलेट कर जाता है।
“कल्लो तुम बिक गईं ” में लेखक ने बताया कि कैसे गांवों में पालतू पशु और कृषक की भावनाएं एक - दूसरे से जुड़ जाती हैं। पहले के समय में गाय के गोबर से कच्चा घर लीपा जाता था, उसके गोबर से कंडे बनाए जाते थे, उसका गोबर खेत में खाद के रूप में काम आता था, उसके बछड़े बड़े होकर बैल बन जाते और खेत की जुताई के काम आते और गाय का दूध घर के काम आता , जिससे घी, छाछ, दही बनता। आज के समय में गाय का पहले जैसा महत्व नहीं रहा है। कच्चे घर की जगह पक्के घर बन गए हैं, कंडे की जगह एलपीजी सिलेंडर ने ले ली है, जैविक खाद की जगह रसायनिक खाद आ गए हैं, बैलों की जगह ट्रैक्टर ने ले ली है। गाय का काम आज के समय में सिर्फ दूध देना रह गया है। महत्व घटने के कारण किसानों से गाय की दूरी बढती जा रही है।
“रामदई हमने टीवी नही देखी” में ऐसे दलित लड़के की मनोव्यथा कही गई है जिसने कभी टीवी नही देखा। टीवी पर आने वाली फिल्मों के बारे में अपने दोस्तों से सिर्फ सुना भर है। सुन - सुनकर ही उसे फिल्मों की कहानी याद हो जाती है लेकिन मन में अफसोस रहता है कि उसने कभी टीवी नही देखा। वजह? वजह, यही कि दलित होने के कारण उसे कोई घर में नही घुसने देता है।
“धन्ना तो बा की राधा संगे गोल हो गयो” में एक चोर दूर के एक गांव के मंदिर से राधा की मूर्ति चोरी करके लाता है और अपने गांव में एक पेड़ के नीचे दबा देता है और अपनी पत्नी के माध्यम से पूरे गांव में यह प्रचार करा देता है कि कई दिनों से राधा उसके सपनों में आ रही हैं और बोल रही हैं कि जमीन से निकालकर मेरा उद्धार करो। गांव वाले उस जगह जाकर खुदाई करते हैं तो वहां राधा की मूर्ति पाकर एक चोर को सिद्ध बाबा घोषित कर देते हैं। बाबा बनने की चाह रखने वाले लोग यह तरीका अपना सकते हैं।
“खूंटा की लुगाई भी बह गई” में ऐसी स्त्री की व्यथा का चित्रण किया गया है जिसका पति नदी में बह गया है और वह उसी के शोक में पागल हो जाती है और आखिर में खुद भी उसी नदी में छलांग लगा देती है।
लड़कों के बारे में कहा जाता है कि अगर एक लड़की उनकी ओर बस एक निगाह भर देख भी ले तो वे उससे शादी तक की बात सोच लेते हैं। “वे दो पत्थर” में लड़कों की इसी मनोदशा का वर्णन है।
“कल्लो तुम बिक गईं ” में लेखक ने बताया कि कैसे गांवों में पालतू पशु और कृषक की भावनाएं एक - दूसरे से जुड़ जाती हैं। पहले के समय में गाय के गोबर से कच्चा घर लीपा जाता था, उसके गोबर से कंडे बनाए जाते थे, उसका गोबर खेत में खाद के रूप में काम आता था, उसके बछड़े बड़े होकर बैल बन जाते और खेत की जुताई के काम आते और गाय का दूध घर के काम आता , जिससे घी, छाछ, दही बनता। आज के समय में गाय का पहले जैसा महत्व नहीं रहा है। कच्चे घर की जगह पक्के घर बन गए हैं, कंडे की जगह एलपीजी सिलेंडर ने ले ली है, जैविक खाद की जगह रसायनिक खाद आ गए हैं, बैलों की जगह ट्रैक्टर ने ले ली है। गाय का काम आज के समय में सिर्फ दूध देना रह गया है। महत्व घटने के कारण किसानों से गाय की दूरी बढती जा रही है।
“रामदई हमने टीवी नही देखी” में ऐसे दलित लड़के की मनोव्यथा कही गई है जिसने कभी टीवी नही देखा। टीवी पर आने वाली फिल्मों के बारे में अपने दोस्तों से सिर्फ सुना भर है। सुन - सुनकर ही उसे फिल्मों की कहानी याद हो जाती है लेकिन मन में अफसोस रहता है कि उसने कभी टीवी नही देखा। वजह? वजह, यही कि दलित होने के कारण उसे कोई घर में नही घुसने देता है।
“धन्ना तो बा की राधा संगे गोल हो गयो” में एक चोर दूर के एक गांव के मंदिर से राधा की मूर्ति चोरी करके लाता है और अपने गांव में एक पेड़ के नीचे दबा देता है और अपनी पत्नी के माध्यम से पूरे गांव में यह प्रचार करा देता है कि कई दिनों से राधा उसके सपनों में आ रही हैं और बोल रही हैं कि जमीन से निकालकर मेरा उद्धार करो। गांव वाले उस जगह जाकर खुदाई करते हैं तो वहां राधा की मूर्ति पाकर एक चोर को सिद्ध बाबा घोषित कर देते हैं। बाबा बनने की चाह रखने वाले लोग यह तरीका अपना सकते हैं।
“खूंटा की लुगाई भी बह गई” में ऐसी स्त्री की व्यथा का चित्रण किया गया है जिसका पति नदी में बह गया है और वह उसी के शोक में पागल हो जाती है और आखिर में खुद भी उसी नदी में छलांग लगा देती है।
लड़कों के बारे में कहा जाता है कि अगर एक लड़की उनकी ओर बस एक निगाह भर देख भी ले तो वे उससे शादी तक की बात सोच लेते हैं। “वे दो पत्थर” में लड़कों की इसी मनोदशा का वर्णन है।
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