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Keedajadi/कीड़ाजड़ी
उत्तराखंड की पिंडर घाटी में लोग मस्तमौला हैं, अभाव में भी ख़ुश और जीवन के प्रति एक तटस्थ भाव लिए हुए। इस यात्रा वृतांत में महानगरों से अलग-अलग पेशों और रुचियों के लोग एक एनजीओ के प्रोजेक्ट पर सुदूरवर्ती गांवों में पढ़ाने के लिए जाते हैं। वे वहाँ घूमते-टहलते हैं, ट्रैकिंग करते हैं और अपने अनुभव साझा करते हैं। वे उस आदिम सी दिखने वाली घाटी को भौंचक्की निगाहों से देखते हैं। पिंडर घाटी कैसी है इसकी एक झलक इससे मिलती है कि वहाँ ब्राह्मण नहीं हैं, नाई नहीं है और लुहार भी नहीं है। लोगबाग पुराने ज़माने के हिसाब से एक दूसरे का बाल काट देते हैं और पूजा-पाठ के लिए तीन-चार महीनों में कोई ब्राह्मण गढ़वाल से आता है। लेकिन घाटी में एक ऐसी चीज़ मिलती है जिसकी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में करोड़ों रुपये क&
145 pages, Kindle Edition
Published December 20, 2022
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Displaying 1 - 5 of 5 reviews
October 3, 2023
सीमांत हिमालयी गांव का जीवन — कीड़ाजड़ी (अनिल यादव)
आख़िर किसकी इच्छा नहीं होती हिमालय के ऊबड़ खाबड़ रस्तों से गुजरने की, नदियों के उद्गम के निकटतम पहुंचकर नदी के पानी को छूने की, बर्फ़ की मोटी परत पर फिसलने की, बुग्यालों में भटकने की। ये दृश्य वाकई बहुत रूमानी हैं और मैदान में दैनिकी से उकताए आदमी के लिए एक पलायन का रास्ता भी। पहाड़ में एक से एक मनोरम दृश्य हैं। लेकिन पहाड़ सिर्फ़ दृश्य भर तो हैं नहीं। इन दृश्यों में जाने कितने गांव हैं। इन गांवों में रहने वाले लोग हैं।
पिंडर घाटी के ऐसे ही गांव में अनिल जी बच्चों को पढ़ाने पहुंचे और उन्होंने हिंदी के पाठकों को कीड़ाजड़ी से परिचित कराया। अधिकतर लोग निश्चय ही अब तक कीड़ाजड़ी से परिचित हो गए होंगे क्योंकि इंडिया टुडे ग्रुप के साहित्यजीवी इस किताब को कामवर्धक जड़ी केंद्रित बताकर पर्याप्त प्रचार कर चुके हैं।
लेकिन किताब का स्वाद कुछ और ही है। यह किताब जीवन के बारे में है, जैसा कि मृदुला जी ने लिखा है। प्रकृति से संबंध विच्छेद कर चुकी शहरी सभ्यता के पास वह जीवन नहीं है जो अभी भी इन दूर दराज के इलाकों में बचा है। हम वह जीवन वहां कुछ दिन जाके भी नहीं पा सकते। हम सिर्फ़ उस जीवन को दूर से देख सकते हैं, उसके सुख दुःख में कुछ समय के लिए शामिल हो सकते हैं। लेकिन उस जीवन को रोमांटिसाइज भी नहीं कर सकते। वह एक कठिन जीवन है। दुर्दम्य जीवन है।
पहाड़ी किरदारों की अपनी एक धमक होती है। तभी तो किताब की पहली ही पंक्ति यह है – ‘कोई पूछे, पिंडर घाटी कैसी जगह है! मैं कहूंगा, जोती जैसी है।’ और जोती कैसी है? अपनी शर्तों पर जीने वाली, जिसके खेल में शामिल होने के लिए उसके जैसा होना होता है।
यह यात्रा वृत्तांत अपनी कहन में बहुत जगह उपन्यास जैसा हो जाता है और जब हम यह भूल जाते हैं कि यह कोई उपन्यास नहीं, यात्रा वृत्तांत है और कहानी और पात्रों के विकास की इच्छा करने लगते हैं, ठीक उसी समय कथ्य अपने यथार्थ की ओर मुड़ जाता है। कहीं ऊबड़ खाबड़, कहीं मुलायम, कहीं खुरदुरा, कहीं सपाट पहाड़ की तरह हम इस वृत्तांत से गुजरते हैं। कहन में जो भी पात्र मिलते हैं, वे याद रह जाने वाले हैं। चाहे वह जोती हो, बाबा रामदेव हो, रशियन स्मगलर हों, चामू हो, खिलाफ़ सिंह हो, रूप सिंह हो या अन्य। हर किरदार गांव की सामाजिकी और त्रासदी अपने में लिए हुए किताब के पन्नों पर जीवंत होता है और कहीं मनोरंजन करते हुए तो कहीं आंखें नम करते हुए गुजरता जाता है।
साहित्य को भी मैं मुझे सिमुलेशन मानता हूं। यही वजह है कि कभी तुंगनाथ के बर्फीले पुल से गुजरते हुए मैंने ख़ुद को काफ्का के उपन्यास के भीतर पाया था। बर्फीली रातें ‘दी कासल’ की हड़हड़ाती रातों की याद दिलाती थीं और बर्फ में पैर घिसटकर चलते हुए मैंने ख़ुद को जोसेफ के की हालत में पाया। लेकिन इसमें यथार्थ तो यह था कि इतनी ठंड में कपड़ों की तीन परतों के साथ दो रजाई के भीतर छिप जाने के बाद उससे बाहर निकलने की कोई इच्छा नहीं थी और बाकी सारा कारोबार कल्पना के सहारे चल रहा था। ठीक उसी तरह दिसंबर की दिल्ली की ठंड में एक बार फिर पहाड़ पर भटकने की अधूरी तमन्ना को कीड़ाजड़ी के जरिए जिया गया। सच कहूं तो मेरी रुचि लैंडस्केप और लोगों के जीवन में ही थी। अनिल जी भाषा बहुत सधी है और जगह जगह पर उनके भीतर का कवि पिंडर की घाटी की सैर करते हुए हमें अपने साथ काव्यात्मक यात्रा पर ले जाता है।
हालांकि, यह एक यात्रा वृत्तांत है लेकिन शिल्प कई जगह पर उपन्यासनुमा हो जाने की वजह से कुछ पात्रों और घटनाओं के बारे में और जानने की इच्छा अधूरी रह गई। किताब में कई जगह प्रिंट की गलतियां हैं। पिंडर घाटी के जनजीवन को और गहराई से देखने समझने की इच्छा भी जगी। ख़ैर, एक ही किताब से सब कुछ हासिल कर लेने का पाठकीय लालच भी कोई बहुत अच्छी चीज तो है नहीं। कुल मिलाकर एक आनंददायक किताब पढ़वाने के लिए अनिल जी का शुक्रिया।
आख़िर किसकी इच्छा नहीं होती हिमालय के ऊबड़ खाबड़ रस्तों से गुजरने की, नदियों के उद्गम के निकटतम पहुंचकर नदी के पानी को छूने की, बर्फ़ की मोटी परत पर फिसलने की, बुग्यालों में भटकने की। ये दृश्य वाकई बहुत रूमानी हैं और मैदान में दैनिकी से उकताए आदमी के लिए एक पलायन का रास्ता भी। पहाड़ में एक से एक मनोरम दृश्य हैं। लेकिन पहाड़ सिर्फ़ दृश्य भर तो हैं नहीं। इन दृश्यों में जाने कितने गांव हैं। इन गांवों में रहने वाले लोग हैं।
पिंडर घाटी के ऐसे ही गांव में अनिल जी बच्चों को पढ़ाने पहुंचे और उन्होंने हिंदी के पाठकों को कीड़ाजड़ी से परिचित कराया। अधिकतर लोग निश्चय ही अब तक कीड़ाजड़ी से परिचित हो गए होंगे क्योंकि इंडिया टुडे ग्रुप के साहित्यजीवी इस किताब को कामवर्धक जड़ी केंद्रित बताकर पर्याप्त प्रचार कर चुके हैं।
लेकिन किताब का स्वाद कुछ और ही है। यह किताब जीवन के बारे में है, जैसा कि मृदुला जी ने लिखा है। प्रकृति से संबंध विच्छेद कर चुकी शहरी सभ्यता के पास वह जीवन नहीं है जो अभी भी इन दूर दराज के इलाकों में बचा है। हम वह जीवन वहां कुछ दिन जाके भी नहीं पा सकते। हम सिर्फ़ उस जीवन को दूर से देख सकते हैं, उसके सुख दुःख में कुछ समय के लिए शामिल हो सकते हैं। लेकिन उस जीवन को रोमांटिसाइज भी नहीं कर सकते। वह एक कठिन जीवन है। दुर्दम्य जीवन है।
पहाड़ी किरदारों की अपनी एक धमक होती है। तभी तो किताब की पहली ही पंक्ति यह है – ‘कोई पूछे, पिंडर घाटी कैसी जगह है! मैं कहूंगा, जोती जैसी है।’ और जोती कैसी है? अपनी शर्तों पर जीने वाली, जिसके खेल में शामिल होने के लिए उसके जैसा होना होता है।
यह यात्रा वृत्तांत अपनी कहन में बहुत जगह उपन्यास जैसा हो जाता है और जब हम यह भूल जाते हैं कि यह कोई उपन्यास नहीं, यात्रा वृत्तांत है और कहानी और पात्रों के विकास की इच्छा करने लगते हैं, ठीक उसी समय कथ्य अपने यथार्थ की ओर मुड़ जाता है। कहीं ऊबड़ खाबड़, कहीं मुलायम, कहीं खुरदुरा, कहीं सपाट पहाड़ की तरह हम इस वृत्तांत से गुजरते हैं। कहन में जो भी पात्र मिलते हैं, वे याद रह जाने वाले हैं। चाहे वह जोती हो, बाबा रामदेव हो, रशियन स्मगलर हों, चामू हो, खिलाफ़ सिंह हो, रूप सिंह हो या अन्य। हर किरदार गांव की सामाजिकी और त्रासदी अपने में लिए हुए किताब के पन्नों पर जीवंत होता है और कहीं मनोरंजन करते हुए तो कहीं आंखें नम करते हुए गुजरता जाता है।
साहित्य को भी मैं मुझे सिमुलेशन मानता हूं। यही वजह है कि कभी तुंगनाथ के बर्फीले पुल से गुजरते हुए मैंने ख़ुद को काफ्का के उपन्यास के भीतर पाया था। बर्फीली रातें ‘दी कासल’ की हड़हड़ाती रातों की याद दिलाती थीं और बर्फ में पैर घिसटकर चलते हुए मैंने ख़ुद को जोसेफ के की हालत में पाया। लेकिन इसमें यथार्थ तो यह था कि इतनी ठंड में कपड़ों की तीन परतों के साथ दो रजाई के भीतर छिप जाने के बाद उससे बाहर निकलने की कोई इच्छा नहीं थी और बाकी सारा कारोबार कल्पना के सहारे चल रहा था। ठीक उसी तरह दिसंबर की दिल्ली की ठंड में एक बार फिर पहाड़ पर भटकने की अधूरी तमन्ना को कीड़ाजड़ी के जरिए जिया गया। सच कहूं तो मेरी रुचि लैंडस्केप और लोगों के जीवन में ही थी। अनिल जी भाषा बहुत सधी है और जगह जगह पर उनके भीतर का कवि पिंडर की घाटी की सैर करते हुए हमें अपने साथ काव्यात्मक यात्रा पर ले जाता है।
हालांकि, यह एक यात्रा वृत्तांत है लेकिन शिल्प कई जगह पर उपन्यासनुमा हो जाने की वजह से कुछ पात्रों और घटनाओं के बारे में और जानने की इच्छा अधूरी रह गई। किताब में कई जगह प्रिंट की गलतियां हैं। पिंडर घाटी के जनजीवन को और गहराई से देखने समझने की इच्छा भी जगी। ख़ैर, एक ही किताब से सब कुछ हासिल कर लेने का पाठकीय लालच भी कोई बहुत अच्छी चीज तो है नहीं। कुल मिलाकर एक आनंददायक किताब पढ़वाने के लिए अनिल जी का शुक्रिया।
June 22, 2023
दुर्लभ पहाड़ों के सरल लोगों और एक दुर्लभ कीड़े की अद्भुत कहानी।
August 27, 2024
Nice description of mountain life.
December 14, 2023
पिंडर घाटी में बिताये समय को अनिल यादव ने इस यात्रा व्रितांत के रूप में प्रस्तुत किया है। दुर्गम रास्तों से हो कर ऐसे पहाडी गांवों में पहुँच पाना अपने आप मे ही एक कहानी है। लेकिन वहाँ के जीवन में ढल पाना और उन इलाकों में रहने वाले लोगों कि ज़िंदगियों को बेहद करीब से देख पाना उससे भी कुछ बेहतर। किताब खोलते ही, dedication में लिखा एक वाक्य -"खिलाफ सिंह दानू के लिये जो सुंदरढूंगा की बर्फ में दब गया" - जैसे पाठक को कुछ समय सोचने के लिये मजबूर कर देता है। किताब अच्छी है, लेकिन और अच्छी हो सकती थी। कई जगह पर कहानी को फौलो करना मुश्किल होने लगता है और बहुत से characters को और जान पाने की इच्छा जैसे अधूरी ही रह जाती है। Flow भी कुछ हिस्सों में थोडा कटा-कटा सा महसूस होता है। लेकिन अंत आते आते जैसे अनिल जी आपको सुंदरढूंगा की उन पहडियो में बडे आराम से ले जाते हैं जहाँ कीडाजडी की खोज मे लोग बुग्याल की तरफ टूटे रास्तों से गुज़रते हैं। 3.5 stars के साथ ये कहना चाहूंगा की अगर आपको पहाडी जीवन में दिलचस्पी है तो इस किताब को ज़रूर पढे।
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