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252 pages, Paperback
First published January 1, 1979
घर का दरवाजा खोलते ही मैंने घर को ऐसे देखा, जैसे किसी खली डिब्बे के ढक्कन को खोलकर अंदर झाँक रहा हू। अगर खालीपन कोई चीज, तो उसी से घर ठसाठस भरा था। इसके अलावा कुछ नहीं था। घर के अंदर मैं उसी तरह आया, जैसे एक उपहारा खालीपन और आया है।