नव-यथार्थवादी सिनेमा की नींव रखने वाले बलराज साहनी निस्संदेह भारतीय स्क्रीन पर आने वाले महानतम कलाकारों में से एक थे। इस ऑटोबायोग्राफी में उन्होंने फिल्मी दुनिया के अपने सफर को विस्तार में बतलाया है।
कैसे उन्होंने रावलपिंडी से शुरुआत की, फिर पढ़ने के लिए लाहौर पहुंचे, एमए इंग्लिश किया। शांतिनिकेतन में पढ़ाया, फिर सेवाग्राम गए। वहां से पत्नी के साथ वह बीबीसी लंदन चले गए अनाउंसर का काम करने और फिर बंबई का रुख किया। बंबई में उन्होंने ईप्टा में नाटक किया और फिर फिल्मों में आए। बलराज ने फिल्म लाइन में अपने एक्टिंग स्ट्रगल का काफी गहराई से विवरण दिया है। साथ ही 1949 में परेल की कम्युनिस्ट रैली के विस्फोट के बाद अपने कुछ महीने के जेल के दिनों का भी उन्होंने मार्मिक चित्रण किया है। कैसे उन्होंने जॉनी वॉकर को बाजी में रोल दिलवाया, 'बाजी' की स्क्रिप्ट और डायलॉग लिखे, कैसे 'हमलोग' में एक्टिंग की और कैसे 'दो बीघा जमीन' बनी जिसके बाद वो मशहूर हुए, अपने फिल्मी करियर का क्रमबद्ध चित्रण उन्होंने इस किताब में किया है।
1950-60 की फिल्म इंडस्ट्री और वहां के लोगों - देव आनंद, चेतन, गुरु दत्त, बिमल रॉय, दिलीप कुमार, के आसिफ, मुराद, मीना कुमारी, नरगिस, जॉनी वॉकर आदि के किस्से भी इस किताब में हैं। साथ ही, कैसे आदर्शवाद फिल्म लाइन की दौलत-शोहरत की दुनिया में खो जाता है, और कैसे यह दुनिया भी बाहर से रंगीन पर अंदर से शोषण पर टिकी है, इसे बलराज खूब बतलाते हैं। कैसे यहां सफलता-विफलता सब क्षणिक है और कैसे सफलता सब गलतियां छुपा लेती है इसका भी जिक्र खूब है। बलराज ने अपने स्ट्रगल फेज का जिक्र इस आत्मकथा में किया है और दो बीघा जमीन पर रुक जाते हैं क्योंकि इसके बाद वो सफल हो गए थे। वो लिखते हैं कि - 'कामयाबी के बाद मेरी किस्मत में भी अपनी आत्मा से समझौता करना ही लिखा था'। एक बेहद सच्ची और रोचक फिल्मी आत्मकथा है यह।