प्रेमचंद की कथा-परंपरा को विकसित करनेवाले सुविख्यात कथाकार यशपाल के लिए साहित्य एक ऐसा शास्त्र था, जिससे उन्हें संस्कृति का पूरा युद्ध जितना था ! और उन्होंने जीता ! प्रत्येक स्टार पर वे सजग थे ! विचार, तर्क, व्यंग्य, कलात्मक सौंदर्य, मर्म-ग्राह्यता-हर स्तर पर उन्होंने अपनी प्रतिभा का प्रमाण दिया ! समाज में जहाँ कहीं भी शोषण और उत्पीडन था, जहाँ कहीं भी रूढ़ियों, परम्पराओं, नैतिकताओं, धर्म और संस्कारों की जकड में जीवन कसमसा रहा था, यशपाल की दृष्टि वहीँ पड़ी और उन्होंने पूरी शक्ति से वही प्रहार किया ! इसी दृष्टि को लेकर उन्होंने उस इतिहास-क्षेत्र में प्रवेश किया जहाँ के भीषण अनुभवों को भव्य और दिव्य कहा गया था ! उन्होंने उस मानव-विरोधी इतिहास की धज्जियाँ उडा दी ! व्यंग्य उनकी रचना में तलवार की तरह रहा है और वे रहे हैं नए समाज की पुनर्रचना के लिए समर्पित एक योद्धा ! मर्मभेदी दृष्टि, प्रौढ़ विचार और क्रन्तिकारी दर्शन ने उन्हें विश्व के महानतम रचनाकारों की श्रेणी में ला बिठाया है ! ये कहानियां उनकी इसी तेजोमय यात्रा का प्रमाण जुटती हैं !
Yashpal (3 December 1903 – 26 December 1976) was a Hindi-language author who is sometimes considered to be the most gifted since Premchand. A political commentator and a socialist who had a particular concern for the welfare of the poor and disadvantaged, he wrote in a range of genres, including essays, novels and short stories, as well as a play, two travel books and an autobiography. He won the Hindi-language Sahitya Akademi Award for his novel, Meri Teri Uski Baat in 1976 and was also a recipient of the Padma Bhushan.
Yashpal's writings form an extension to his earlier life as a revolutionary in the cause of the Indian independence movement.
यशपाल जी को पढ़ने का यह मेरा पहला अनुभव था । और पहला ही अनुभव इतना शानदार रहा । इस किताब में १९ कहानियाँ हैं और सभी इस तरह से लिखी गई हैं कि अंत तक वे आपको बाँधे रख सकती हैं । किस्सागोई की इतनी लाजवाब प्रतिभा मैंने पहली बार देखी है (मुंशी प्रेमचंद के बाद) । कहानियाँ झकझोरती हैं, कचोटती हैं और विचार करने पर मजबूर करती हैं । हर कहानी के माध्यम से यशपाल जी ने रूढ़ियों-परंपराओं पर इतने जोर का प्रहार किया है कि कोई संशय नही रह जाता । उनकी कहानियों के केन्द्र में अधिकतर शोषित-पीड़ित तथा बहिष्कृत लोग हैं । पहली कहानी 'करवा का व्रत' जहाँ मुस्कुराहट दे जाती है, वहीं ‘परदा’ गला रूँधा देती है । स्त्रियों के अधिकारों हनन करने वाले समाज से भी उन्होंने कई सवाल किए हैं । पूरी तरह से खुले और नंगे वाक्यांशों का प्रयोग हिला कर रख देता है । मसलन, ‘अपने पत्थर के खुदा से तेरे खुदा का सर फोड़ देती’ और ‘भूख से मरते हैं कमीने आदमियों के बच्चे’ इत्यादि । कहने का सारांश यह कि किताब बेमिसाल है । मेरे संग्रह मे इस किताब का होना मुझे गर्वान्वित करता है । यशपाल जी की बाकी रचनाएँ पढ़ने के लिए मैं लालायित हूँ ।