बन्धन - महासमर भाग 1 - नरेंद्र कोहली
मैं एक तरफ शिवजी सावंत की मृत्युंजय पढ़ रहा था तो दूसरी तरफ महासमर भी पढ़ रहा था। कई बार पढ़ते समय दोनों कहानियाँ उलझ जाती थी और ऐसा लगता था कि अभी तो दूसरी बात थी कहानी कैसे बदल गयी फिर याद आता था कि एक साथ एक ही कहानी के दो महान पुस्तको को पढ़ने के कारण ऐसा हो रहा है। महाभारत पर मेरे द्वारा अभी तक पढ़े गए अद्भुत किताबों में तीन किताबें है, महासमर, मृत्युंजय, और पर्व। नरेंद्र कोहली, शिवजी सावंत और एस एल भैरप्पा ने एक ही कहानी पर अलग अलग मास्टरपीस रचा है।
साहित्य के बारे में निर्मल वर्मा लिखते है कि यह प्यास को कम करने कब बजाए बढ़ाता है।इस किताब को पढ़ने के बाद भी प्यास बढ़ जाती है। जिस तरह बुद्ध पर लिखी गयी किताबें हर बार मेरे सामने एक रहस्यमयी और जादुई प्रभाव छोड़ जाती है उसी प्रकार महाभारत पर लिखी गई इन तीनो किताबों में एक अलग प्रकार का नशा है जो धीमें धीमें आपको अपने आगोश में ले लेता है। मुझे हमेशा से लगता रहा कि जिस कहानी के बारे में आप सब कुछ जानते है, हजारों बार जिसे देखा, सुना और पढ़ा है वो कैसे रोचकता के मापदंड पर आपको बांधे रख पाएगी किन्तु हर बार अद्भत किताबों ने मुझे परास्त किया है। महाभरत इतनी महान रचना है कि इसके हर किरदार या घटना को लेकर अलग से ग्रंथो की रचना की जा सकती है, की जा चुकी है और आगे भी की जाती रहेगी।
महासमर शुरू होती है देवव्रत जो कि अपने पिता शान्तनु का विवाह सत्यवती से करवाने के लिए प्रतिज्ञा लेते है और देवव्रत से भीष्म बन जाते है। वैसे तो पूरा का पूरा उपन्यास ही मनोभावो पर आधारित है, पर विवाह के प्रश्न पर भीष्म का चिंतन का एक उदाहरण पढ़िए -
और तभी से देवव्रत के मन में परिवार, समाज और संसार को ले कर अनेक प्रश्न उठते रहे हैं।...परिवार क्या है? पति-पत्नी का परस्पर आकर्षण एक-दूसरे को सम्मान और स्वतन्त्रता देने में है या अपने सुख के लिए अन्य प्राणी को अपनी इच्छाओं का दास बना लेने में? यदि दूसरे पक्ष के सुख के लिए स्वयं को खपा देना परिवार का आधार है तो दूसरे पक्ष की कामना ही क्यों होती है? स्त्री-पुरुष विवाह क्यों करते हैं–अपनी रिक्ति को भरने के लिए या दूसरे पक्ष के अभावों को दूर करने के लिए, या परस्पर एक-दूसरे का सहारा बन, अपनी-अपनी अपूर्णता को पूर्णता में बदलने के लिए?...वात्सल्य क्या है? व्यक्ति, सन्तान अपने सुख के लिए चाहता है? क्या सन्तान वह खिलौना नहीं है, जिसे बालक अपने खेलने के लिए माँगता है? बालक को खिलौने का सुख कभी अभीष्ट नहीं हुआ। माता-पिता सन्तान के लिए स्वयं को नहीं तपाते–वे तपते हैं तो अपने अभावों से तपते हैं। खिलौना टूट जाये तो बच्चा इसलिए नहीं रोता कि खिलौने को टूट कर कष्ट हुआ होगा, वह तो इसलिए रोता है कि उसकी सम्पत्ति नष्ट हो गयी है। जिससे खेल कर उसे सुख मिलता था, वह आधार नष्ट हो गया है।...
522 पन्नो में फैले इस उपन्यास में सिर्फ महाभारत की घटनाएं और कहानी ही नहीं है बल्कि समक���लीन प्रश्नों और उनके उत्तर तलाशने के बहुत प्रयत्न किए गए है। आज के दौर में माता पिता और संतान के बीच दूरियां बढ़ गयी है। गाहे बगाहे अच्छे अच्छे घरों के बुजुर्गों को अनाथालय का द्वार देखना पड़ता है। इससे भी खराब उनकी स्थिति है जो साथ में रहते हुए नारकीय स्थिति को भोगते है। ऐसे में मूल प्रश्न उठता है कि मनुष्य संतान को जन्म क्यों देता है -
“किसी को सन्तान की इच्छा होती ही क्यों है–मैं तो यह ही समझ नहीं पाती राजमाता।” अम्बिका धीरे-से बोली, “गर्भ में सन्तान का पोषण, प्रसव, फिर उसका पालन-पोषण, उसकी शिक्षा-दीक्षा...और फिर प्रत्येक क्षण उसके किसी अनिष्ट की आशंका...” उसने सत्यवती को देखा, “क्यों चाहते हैं लोग सन्तान? क्या सुख है उसका?”
सबो के मन में इस जीवन से मुक्त होने की, सत्य पर चलने की, कोई नया मार्ग खोजने की इच्छा होती है किंतु जब मनुष्य कोई ठोस कदम उठता है तो उसके परिवार , मित्रजन सब उसे मन करने लगते है। जैसे कि शान्तनु भीष्म के सन्यास पर चिंता करते हुए सोचते है -
" आज उन्हें अनुभव हो रहा था कि मनुष्य का सहज मन प्रकृति ने कुछ ऐसा बनाया है कि त्रिकालसत्य आदर्शों पर स्वयं चलने का तो वह साहस ही नहीं करता, अपने प्रियजनों को उन आदर्शों की ओर बढ़ते देख कर भी कोई प्रसन्न नहीं होता...राम, राज्य को त्याग कर वनवास के लिए चले गये थे। तो दशरथ उनके त्याग से प्रफुल्लित नहीं हुए थे। "
मेरा शुरू से ही यह मानना था कि मनुष्य निरंतर सुख चाहता है और उसी के पीछे भागते हुए जीवन गुजार द्वता है मेरे लिए सुख और शांति में कोई भेद नहीं था। पहली बार सरल शब्दों में जान की सुख और शांति एकदम अलग है।
“आकांक्षा ही सही! क्या दोष है आकांक्षाओं में? आकांक्षा, पाप है क्या?” “नहीं माँ! आकांक्षा पाप नहीं हैः आकांक्षा दुख और सुख का संगम है, अशान्ति का पर्याय है।” व्यास का स्वर गम्भीर था, “आकांक्षा और शान्ति” दोनों की कामना एक साथ नहीं की जा सकती। प्रकृति के नियम इसकी अनुमति नहीं देते।” “तो क्या व्यक्ति आकांक्षा न करे?” “करे। किन्तु तब न सुख से डरे, न दुख से। शान्ति की कामना न करे। शान्ति न सुख में है, न दुख में। शान्ति तो इन दोनों से निरपेक्ष होने में है।”
सुख, दुख, भोग, शांति, अशांति, जीवन, लक्ष्य, सन्यास, कर्म, पाप, पुण्य आदि शाश्वत प्रश्नों का उत्तर खोजती यह1 महागाथा एक दुर्लभ कृति है। अद्भुत चिंतन, मनन, अन्तर्दृष्टियाँ, अंतर्विरोधों और आदर्शों से भरी यह एक गहन चिंतन करने योग्य कृति है।
अंत में पुस्तक के कुछ अंश -
‘नियति चाहे डूबना हो, किन्तु नीति तो संघर्ष ही है।’
निराशा को जीवन से निकाला जायेगा, तो उससे जो शून्य बनेगा, वह रिक्त नहीं रहेगा–आशा आ कर उसमें डेरा डालेगी। आशा तभी टिकेगी, जब कुछ अर्जन होगा।…पर अर्जन तो कोई उपलब्धि नहीं है। उसका मन जैसे ठिठक गया…उसके तर्क के पग किस ओर उठ रहे थे?...अर्जन की ओर? भोग की ओर?...पर तर्क रुका नहीं। वह जैसे आज बहुत ही संघर्षशील हो रहा था… अर्जन कोई उपलब्धि नहीं है, पर विसर्जन ही क्या उपलब्धि है? रिक्ति को भरना तो उपलब्धि हो सकती है; किन्तु पूर्ति को रिक्ति में परिवर्तित करना क्या उपलब्धि हुई…और रिक्ति से रिक्त तक जीना भी क्या जीवन हुआ…
उसे लगता था कि उसके अपने भीतर एक बहुत बड़ी गुफा थी–काली और अँधेरी! उसका मन उसी गुफा में भटक रहा था।
“वह एक मद है, जो रक्त को उफ़नाता है। उससे उत्तेजना का अनुभव होता है। वह सुख नहीं है। सुख का भ्रम उससे अवश्य उत्पन्न होता है। उत्तेजना अपने-आप में कष्ट है। उसके अवसान की आशंका भय है।...और उसका अवसान पीड़ा है।”
“बद्धजीव कभी सुखी नहीं हो सकता माँ!” व्यास बोले, “जब तक तुम अपने बन्धनों को पहचानोगी नहीं, उन्हें अपने दुखों का कारण नहीं मानोगी, उन्हें तोड़ने का संकल्प नहीं करोगी...तब तक भीष्म तुम्हें अपने शत्रु दिखायी पड़ेंगे।...और तुम सुखी नहीं हो सकोगी माँ!”
सुख’ और ‘भोग’ दो अलग स्थितियाँ हैं माँ!” द्वैपायन बोले, “‘सुख’ एक मानसिक स्थिति है, जो भोग के अभाव में भी सम्भव है। या शायद अधिक सत्य यही है कि सुख, भोग के अभाव में ही सम्भव है। और भोग तो दुख का प्रवेश-द्वार है माँ! भोग ने कभी किसी को सुखी नहीं किया।”