शिक्षा : प्रयाग विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एम.ए., हिंदी से एम.ए. और कविवर सुमित्रानंदन पंत पर शोध कार्य कर पी-एच.डी. की उपाधि की।
गतिविधियाँ : देश विभाजन के बाद 1947 में परिवार के साथ इलाहबाद आयीं। यहाँ ‘कविवर सुमित्रानंदन पंत, इलाचंद्र जोशी, महादेवी वर्मा और प्रयाग के साहित्यकारों का सानिध्य मिला और साहित्यिक गतिविधियों से सक्रियता से जुडी।
आकाशवाणी और दूरदर्शन के महत्त्वपूर्ण पदो पर रहीं, और कई चर्चित धारावाहिक फिल्मों का निर्माण और लेखन किया। मीडिया विशेषज्ञ के रूप में कई देशों की यात्रा की।
इस किताब को पढ़ने के बाद सबसे पहला भाव जो मन में आया, वह था ग़ुस्सा उन लोगों के प्रति जिन्होंने इसे उबाऊ कहकर ख़ारिज कर दिया। मुझे समझ नहीं आता, कैसे कोई व्यक्ति किसी स्त्री की पीड़ा और उसके भीतर के संघर्ष में भी ‘रोमांच’ या ‘मनोरंजन’ ढूंढ़ सकता है?
मुझे यह नहीं मालूम कि रेत की मछली और गुनाहों का देवता कितनी हद तक सेमीऑटोबॉयोग्राफिकल हैं, लेकिन इतना ज़रूर समझ आया कि गुनाहों का देवता किताब मेरी आत्मा को क्यों नहीं छू सकी।
उसमें आदर्श थे, एक सतही नायकत्व था पर उसके पीछे कोई तीव्र, सचमुच का दर्द नहीं था। हाँ, धर्मवीर भारती की भाषा निस्संदेह सधी हुई और परिष्कृत है, लेकिन जो चुभन, जो अंदर तक उतर जाने वाली संवेदना कान्ता भारती की लेखनी में है? वह वहाँ नहीं मिलती।
कान्ता भारती की सबसे प्रभावशाली विशेषता यह है कि वे हर दृश्य को एक तरह की काव्यात्मक गहराई में ढाल देती हैं। उनके वाक्यों में ऐसा दर्द है जो शब्दों से ज़्यादा अनुभव में उतरता है। और जब पाठक यह जानता है कि यह कथा केवल कल्पना नहीं, एक स्त्री के जीवित अनुभवों का दस्तावेज़ है? तो वह भीतर तक हिल जाता है।
एक स्थान पर वे लिखती हैं — “शोभन फ़ादर पॉल के पास नितांत शिष्टता के साथ इस तरह खड़े थे जैसे गुनाहों की एक बहुत बड़ी बस्ती में एकमात्र देवता खड़ा हो।” यह पंक्ति पढ़ते ही मन जैसे रुक सा गया, और भीतर एक लंबी निःश्वास उतर आई।
मेरे लिए यह असंभव है कि कोई मुझे यह समझा सके कि गुनाहों का देवता, रेत की मछली से श्रेष्ठ है। चाहे कितने भी दलीलें/तर्क क्यों न दिए जाएँ, मैं उस मत को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं रहूँगी।
आप ये किताब इसलिए मत पढ़िए कि एक और कहानी पढ़ने का मन हो गया है, बल्कि इसलिए पढ़िए कि एक पढ़ी हुई कहानी (गुनाहों के देवता) के दूसरे पक्ष को समझ सकें।
आरंभ में ही यह स्पष्ट हो जाता है कि इस कहानी का नायक ही खलनायक है — और इसकी नायिका? उस पात्र को नायिका कहना शायद उचित नहीं होगा। कितनी बार लगा कि कहूँ — किताबी नायिका ऐसी नहीं होती। वह पलटकर जवाब देती है, स्वतंत्र होती है, उसके कंधों पर आधुनिक युग की मशाल लेकर आगे बढ़ने की जिम्मेदारी होती है।
लेकिन इस कहानी की नायिका का हावभाव असल जीवन की आम स्त्री से कितना मेल खाता है!
अगर यह कहानी सिर्फ एक कहानी है, तो यह दुःखद है — बेहद कष्टकारक और अगर इसमें रत्ती भर भी सच्चाई है, तो यह पितृसत्ता द्वारा स्त्री समाज के प्रति किया गया एक गंभीर अपराध है।
कांता भारती की यह रचना धर्मवीर भारती के असली व्यक्तित्व को बयान करती है. I have hated Shobhan throughout the book, the character based on Dharmveer Bharti and the atrocities he committed on his first wife (the author). This novel needs more attention and praise than Gunahon ka Devta for all the right reasons.
इस किताब को पढ़कर मेरे मन में बहुत कुछ बदल गया। सच कहूँ तो मुझे लगता है कि हर लड़की को यह किताब जरूर पढ़नी चाहिए।
वैसे तो इस कहानी का केंद्र कुंतल है और उसके प्रेम तथा विवाह के अनुभवों के माध्यम से उपन्यास स्त्री के संघर्षों और रिश्तों की कठिनाइयों को सामने रखता है।
लेकिन मेरे लिए यह सिर्फ एक महिला की वैवाहिक जिंदगी की कहानी नहीं थी। यह उस मानसिकता की कहानी भी है जहाँ एक औरत से लगातार समझौते करने की उम्मीद की जाती है—रिश्ते के लिए, परिवार के लिए और प्रेम के नाम पर। और शायद इसी वजह से इसे पढ़ते हुए कई जगह मुझे बहुत गुस्सा आया।
क्योंकि कई बार हम समाज में जिस चीज को “त्याग” या “सच्चा प्रेम” कह देते हैं, वह वास्तव में किसी एक व्यक्ति का लगातार खुद को मिटाते जाना भी हो सकता है।
इस कहानी ने मुझे समझाया कि सिर्फ किसी के प्यार, स्नेह या परवाह दिखाने की वजह से उस पर आँख बंद करके भरोसा नहीं करना चाहिए। रिश्ते में अपनी आँखें खुली रखना और अपने लिए खड़ा होना भी बहुत जरूरी है।
इस किताब में औरतों द्वारा रिश्ते के लिए किए गए त्याग और बार-बार समझौते देखकर मुझे एक बात बहुत गहराई से समझ आई—प्रेम वह है जिसमें आपको शांति और सुकून मिले, न कि ऐसा रिश्ता जिसमें आपका दम घुटने लगे।
प्रेम में बराबरी होनी चाहिए। अगर हर बार सिर्फ एक ही इंसान समझौता करे, सहता रहे और रिश्ते को बचाता रहे, तो वह प्रेम नहीं, दूसरे इंसान का स्वार्थ है।
किसी से प्रेम करना जरूरी हो सकता है, लेकिन अपने आप को खो देना कभी प्रेम नहीं हो सकता।
यह किताब मेरे लिए सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ी सीख बनकर रह गई।
मुझे पता नहीं की इस कहानी के कितने छोर काल्पनिक हैं और कितने नही, लेकिन जिस हद्द तक मुझे शोभन और मीनल के प्रति घिन्न और घृणा की अनुभूति हुई है उसे मैं चाह कर भी कभी शब्दों में व्यक्त तो नहीं ही कर पाऊँगी।
मुझे गुस्सा भी है इस बात का कि यह किताब इतनी प्रचलित क्यों नहीं है जितनी होनी चाहिए। प्यार भरी सीधी साधी कहानियाँ सभी को पसंद आती है, जिनमें यह तय होता है कि अंत में किसी ना किसी तरीके से मन को तृप्ति मिलेगी।
मगर इस कहानी का अंत भले कुछ और भी होता तो भी इसको पढ़ना उतना ही महत्वपूर्ण होता जितना अभी है। जिस तरह से कांता भर्ती जी ने इस कहानी की हर कड़ी को लिखा है वह किसी भी इंसान को झँझोड़कर रख सकता है, मुझे पता नहीं मैं खुदको इन सब से कैसे अलग कर पाऊँगी।
यूँ तो मेरे भीतर हमेशा से एक ग़ुस्सा सा रहा है, किन चीज़ों के लिए? पितृसत्ता और इन सभी संस्कारों और नियमों के लिए जो सिर्फ़ और सिर्फ़ औरतों के ऊपर लागू होती हैं, कोई मामूली गुस्सा नहीं है ये। यह गुस्सा मेरी ही तरह सभी औरतों के अंदर भी हैं, कुछ दबा दी गई, कुछ चुप करवा दी गई यह बोलकर की हमारे संस्कारों वाली औरतें किसीके ख़िलाफ़ नहीं बोलतीं। मैं समझती हूँ धिक्कार है ऐसे संस्कारों पर जो एक मनुष्य को उसके अधिकारों से अधीन करता है।
लिखने का तो मैं ख़ुद एक उपन्यास लिख डालू, लेकिन मन इतना भारी है की जो कुछ भी लिखा जा रहा है वो लिख रही हूँ। ये सब लिखने से पहले मैं कुछ दिन रुकना नहीं चाहती थी, रुककर देखने से कभी कुछ बदला ही कहाँ है?
बहुत दिनों से ये एक किताब सोशल मीडिया में बहुत प्रचलित हो रही है... अब पढ़ ली... . "रेत की मछली" पढ़ना एक तरह में अपने अंदर कुछ टूटने को महसूस करने जैसा था। शुरुआत में कहानी से सहानुभूति होती है, लेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, एक अजीब सा गुस्सा और बेचैनी मन में बैठने लगती है। पढ़ते-पढ़ते लगा जैसे आदर्श, विश्वास और रिश्तों की जो तस्वीर दिमाग में थी, वो धीरे-धीरे गिर रही हो। . कहानी की शुरुआत में जहाँ नायिका के लिए सहानुभूति महसूस होती है, वहीं आगे बढ़ते हुए कुछ घटनाएँ असलियत से दूर लगने लगती हैं। नायिका की लगातार चुप्पी कहीं न कहीं मन में गुस्सा भी भरती है। ऐसा लगता है जैसे यह सिर्फ एक साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि अंदर की जमा हुई पीड़ा और गुस्से का विस्फोट है। मन में सवाल उठता है कि कोई स्त्री इतनी तकलीफ़ सहकर, दूसरी औरत की मौजूदगी को भी स्वीकार कैसे कर सकती है और फिर बस एक किताब लिखकर चुप क्यों रह जाती है? क्या चुप रहना भी संस्कार है? . फिर सोचती हूँ कि सच में कोई न कोई मजबूरी रहती होगी महिलाओं की भी जब वे ऐसे अबला बन कर चुप्पी साध लेती हैं। और फिर जब एक प्रतिष्ठित लेखक ऐसे कर्मों में लिप्त है तो समाज की लाज, परंपरा और स्त्रीत्व की रक्षा करती एक पत्नी जिसका जीवन घर की चार दिवारी में क़ैद है, वो कर भी क्या सकती थी? एक पक्ष ये भी है कि इस किताब को 1975 में रिपोर्ट किया गया था, यानि कि घटनाएं उससे भी कई पहले हो चुकी होंगी। क्या उस समय का भारतीय समाज भी इन घोषणाओं के लिए तैयार था? . कई बार लगा कि ये किताब सिर्फ एक कहानी नहीं, किसी के दिल का बोझ है, गुस्सा, पीड़ा, और टूटे भरोसे का एक सलीका-सा दस्तावेज़। धर्मवीर भारती एक बेहतरीन लेखक थे, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन जब आप किसी लेखक को उसके शब्दों से प्यार करते हैं, और फिर उसकी ज़िंदगी का ये चेहरा सामने आता है, तो एक हल्का-सा झटका ज़रूर लगता है। . और वो कंटीली बेल शुरुआत से ही उखाड़ कर फेंक क्यों नहीं दी? अपनी जड़ें मज़बूत करने का मौका कैसे दे दिया?🌻🌥️📚 . - आयशा
Ret Ki Machhli, written by Kanta Bharti, is a stark, psychologically intense novel that delves into the inner life of a woman trapped in the arid expectations of a patriarchal society. The title, which translates to “A Fish in the Sand,” becomes an aching metaphor — portraying a soul meant for emotional fluidity and freedom, stranded in a life that offers no nourishment, no escape.
The protagonist — a woman unnamed, voiceless in many ways — becomes the embodiment of psychological suffocation, bound not by visible chains but by the invisible norms of gender, duty, and silence. Her life unfolds in the domestic space, a space traditionally assigned to women, but Bharti reveals how this space becomes a psychic desert, eroding identity, desire, and the self.
Through deeply introspective narration, Bharti explores themes of emotional alienation, repressed sexuality, social invisibility, and mental stagnation. The woman’s internal world, rich with unspoken fears, quiet anger, and longing for connection, stands in sharp contrast to her outer life — mechanical, thankless, and unchanging. Her silence is not passivity; it is resistance, grief, and slow-burning awareness.
What makes this novel powerful from a psychological standpoint is its raw portrayal of the fragmentation of the self. The protagonist is not mentally “ill” in a clinical sense, but she is gradually disassociating from the version of herself that society demands. Her mind becomes a battleground between survival and authenticity.
Bharti writes with minimalism and restraint — making the novel feel like an echo, a whispered scream. Ret Ki Machhli doesn’t offer resolution, and that is its truth. It portrays the lived experience of countless women whose identities are buried under roles, whose feelings are never validated, and whose silences are misunderstood as acceptance.
Ultimately, this is not just a feminist novel — it is a psychological indictment of how societies quietly erase women by denying them emotional space. Kanta Bharti’s work remains a haunting reminder that not all prisons have bars — some are made of sand, and some, of silence.
दुख की उत्तरोत्तर व्याख्या करती ये किताब चरम पर जा पहुंचती है। प्रत्येक पृष्ठ के साथ दुख का एक स्तर बढ़ाती। मन अगर संयमित ना हो तो अवसाद में डाल सकने की क्षमता है इसमें। लेखकों के भोंडेपन को उजागर करती है, उनका मुखौटा नोचती है और इस हद तक ले जाती है कि घृणा हो जाए। वैचारिक थोथलेपन को उद्घाटित करती है और मानवीय पाशविकता की यथार्थता को मनुष्य का एकमात्र सत्य बताती है। किताब में लिखा अगर एकांश भी भारती जी के सम्बंध में सत्य है तो आपको भारती के सम्पूर्ण साहित्य पर उबकाई आ जाएगी। गुनाहों के देवता के अगर उपासक हैं तो दूर रहें। ये किताब आपके लिए ईशनिंदा के बराबर है।
This is a disturbing story about the breaking up of a marriage, that's told with vividly upsetting and graphic details. Although the central character aka. the narrator describing the occurrences gives you a feeling that a lot could have been done, and the ultimate destruction happened also because of her cowardice.
Ret Ki Machhli is a tragic and brutally honest look at the other side of love. One can’t help but compare it to Gunahon Ka Devta, especially knowing it was written by Pushpa Bharati and seems semi-autobiographical but we could never know fiction from truth.
Where Gunahon Ka Devta is deeply emotional, manipulative and romanticizes pain, Ret Ki Machhli is direct, with little to no euphemism. That honesty makes it hit even harder.
हुए कुछ रोज किसी मित्र ने एक फेसबुक लिंक भेजी। किसने भेजी ये तक याद नहीं। खोली तो एक लम्बा आलेख था – ‘गुनाहों का देवता’, धर्मवीर भारती के कालजयी उपन्यास की धज्जियाँ उड़ाता हुआ, चन्दर और उसके चरित्र की धज्जियाँ उड़ाता हुआ, चन्दर और सुधा की अमर प्रेमकथा की धज्जियाँ उड़ाता हुआ। आलेख में ‘गुनाहों का देवता’ के इतर एक अन्य उपन्यास का ज़िक्र था, जिसके साथ ‘गुनाहों का देवता’ की तुलना की गई थी। इस दूसरे उपन्यास को ‘गुनाहों के देवता’ के पाठकों के लिए पढ़ना यदि अनिवार्य नहीं तो अति आवश्यक तो जरूर कहा गया था। ये उपन्यास था – ‘रेत को मछली’।
रेत की मछली एक घिनोना उपन्यास है। इसे पढ़ते समय कितनी चीजों के लिए घिन आती है कहना मुश्किल है। ‘रेत की मछली’ धर्मवीर भारती की प्रथम पत्नी श्रीमती कान्ता भारती द्वारा रचित है। ‘गुनाहों का देवता’ के छब्बीस साल बाद सन् पचहत्तर में ‘रेत की मछली’ आया।
ये उपन्यास धीरे-धीरे आगे बढ़ता हुआ भयावह होता चला जाता है। उपन्यास में नायक है, नायिका है; उनके मध्य का स्नेह है, जिसे वो आजीवन पल्लवित करने की इच्छा रख रहे हैं; सामाजिक दुविधाएं हैं, जिसे नायिका का पिता विजातीय विवाह में अपनी असहमति के रूप में प्रकट कर रहा है। येन केन प्रकारेण विवाह सम्पन्न होता है। नायिका अपने पति और उसकी माँ के साथ उज्ज्वल और सुखद भविष्य की कल्पना के साथ ससुराल आती है। क्यारियाँ खोद कर सुंदर और सुगन्धित पुष्पों की पौदों को रोपती है। उन पुष्प वल्लरियों के मध्य एक जंगली बेल भी उग आती है, उगती चली जाती है, इतनी उग जाती है कि सारी वाटिका के फूलों को खा जाती है। ये बिम्ब भयानक था। ये जंगली लता नायक की मुँह बोली बहन है। वो जिससे नायक ने कभी राखी बंधाई। कहानी बढ़ती है और ऐसा मालूम होता है जैसे कोई विषैला जीव चमड़ी के नीचे रेंग रहा हो। आपको लगता है क्यों पढ़ रहे हो आप ये सब? किस लिए? कहानी कितनी तेजी में विषैली होती चली जाती है आपको मालूम तक नहीं चलता। नायक अपनी मुँह बोली बहन को भोगता है। न केवल भोगता है बल्कि उसके लिए बेहूदगी से भरी तर्कसंगतियाँ भी रखता है। कथानायक अपनी बीमार पत्नी की उपस्थिति में उसी कमरे में उस दूसरी स्त्री को भोगता है जिसे वो समाज में बहन कर रहा है। और वीभत्सता के अगले चरण पर बढ़कर वह अपनी पत्नी को इसमें सहर्ष सम्मिलित होने का आग्रह भी करता है। नायिका की उत्सवधर्मिता दिन प्रतिदिन मरती जा रही है। दिन प्रतिदिन वह मानसिक बीमारी और अवसाद के अंधकार में घिरती जा रही है। उसका हृदय कष्ट के, वेदना के उस रसातल में डूबता जा रहा है जहाँ से उसका लौटना असम्भव है। कथा यहीं अपनी नृशंसता पर नहीं रुकती। नायक आगे अपनी कथित बहन के साथ कई बार अपनी पत्नी की उपस्थिति में सहवास करता है और उसे ये देखने पर विवश करता है, वह अपनी पत्नी का यातना से लिप्त चेहरा देखकर मुस्कुराता है। उस मुस्कान की उपस्थिति को पढ़कर आपके समस्त स्नायुतंत्र में एक सिरहन दौड़ जाती है। नायक के लिए पत्नी और उसकी आने वाली सन्तान उस परस्त्री के सम्मुख गौण हो जाते हैं। नायक अपनी पत्नी को पीटता है, और यह क्रम निरतंरता की ओर चला जा रहा है। इससे भी संतुष्ट न होकर वह अपनी पत्नी को ये लिखने पर विवश करता है कि वो दुष्चरित्रा है, उसके अन्यत्र सम्बंध हैं। कथा में ये सब तब चलता है जब कथा का नायक विश्विद्यालय में प्राध्यापक है, समाज में बुध्दिजीवी के रूप में प्रतिष्ठित है, बहुचर्चित साहित्य का रचयिता है और समाज के प्रति बौद्धिक उत्तदायित्व पर बहस करने वाली गोष्ठियों का अध्यक्ष है।
करीबन सवा सौ पन्ने की ये किताब पढ़ते समय आप इसे बीस बार पटकते हैं। आखिरी के बीस पन्ने पढ़ते समय लगता है अभी एक कुल्हाड़ी आपके सर पर गिरेगी और सर फट जाएगा। इस कथा के नायक को नायक कहा जाना भी न्यायोचित है या नहीं ये तक विवाद मालूम होता है।
इसकी तुलना ‘गुनाहों का देवता’ से की गई है। मैं इससे बचना चाहता हूँ। आरोप है कि ‘गुनाहों का देवता’ पितृसत्ता की ध्वजवाहक है। चन्दर अपने आसपास उपस्थित प्रत्येक स्त्री को बस कामोत्तेजक तनाव देना चाहता है और वही करता है। क्लिष्ट शब्दों में भारी प्रतीत होने वाली चिकनी चुपड़ी बातें करता है। मैं इसमें विश्वास नहीं करना चाहता। मैं आगे बढ़कर विरोध भी करता हूँ। चन्दर को जब तक स्वयं मालूम चलता है कि वो किसी के प्रेम में तब तक वो महानता प्राप्त करने के लालच में त्याग नाम के उपकरण का उपकरण का प्रयोग कर उसे किसी ओर को स्वयं सौंप चुका है। कथा के अंत तक कोई सर्वाधिक त्रस्त मालूम होता है तो वो चन्दर ही है। आरोप ये भी है कि चन्दर को धर्मवीर भारती ने खुद के आधार पर रचा है वहीं ‘रेत की मछली’ उनकी भार्या कान्ता भारती ने अपने निजी वैवाहिक जीवन के ऊपर लिखा है। कथानायक का जन्मदिन क्रिसमस के दिन पड़ता है। गौरतलब है कि धर्मवीर भारती का जन्म भी इसी रोज है। यदि ऐसा है तो ये सचमुच भयानक है।
‘गुनाहों का देवता’ एक सच में कालजयी उपन्यास है। भाषागत उत्कृष्टता से कथा का प्रवाह सबकुछ उत्तम है। उसके चरित्र सुधा और चन्दर हिन्दी भाषियों के लिए परिचित हैं और जब तक हिन्दी भाषा और इसका साहित्य प्रासंगिक रहेगा तब तक ये चरित्र भी परिचित रहेंगे। ‘रेत की मछली’ भाषागत दृष्टि से ‘गुनाहों का देवता’ के सम्मुख कुछ नहीं है। परन्तु यदि ये उपन्यास दस फीसदी भी सत्यता पर आधारित है तो एक बात के निर्णय पर हमें खींच ले जा सकता है कि मानव मूल रूप से दोगलेपन से ग्रसित है। ये डॉक्टर भारती की समस्त विरासत पर एक जोरदार चांटा है।
‘रेत की मछली’ को किसी पूर्वप्रकाशित और बाहुचर्चित उपन्यास की व्याख्या मात्र से यदि मुक्त रखा जाए तो अपने आप में ये एक सीधा परंतु तीक्ष्ण उपन्यास है। सीधे संवाद, सरल बहाव, स्पष्ट कथानक। बिम्ब है तो बस एक, वो जंगली बेल जो सारी फुलवारी खा गई। हर बार उसके उल्लेख से आपका हृदय ऐंठने लगता है। ‘रेत की मछली’ एक ऐसा उपन्यास है जिसे आप किसी तरह निगल तो सकते हैं पर पचा नहीं सकते। ऐसे उपन्यास को पढ़ते और उनके ऊपर टिप्पणी करते समय, लिखते समय बस यही दिमाग में आता है कि क्या इसे किसी को पढ़ने के लिए भी कहा जा सकता है?!
This entire review has been hidden because of spoilers.
this author has a very interesting way with words, unfortunately she uses them to hurt me. quite literally an emotional & a complex read when i tell you, and on a side note [this is not an actual review, but just my 2 cents, as im busy w exam prep rn] while i was reading Gunaho ka Devta, i always sensed there was sumn fishy abt how Dharmveer bharti portrayed himself as chander (never liked that bast@rd), and now after finishing Ret Ki Machli, im 110% sure RKM is counter narrative to GKD, and every idea that book perpetuates, dharamvir bharti is not what he has shown to the entire world, and it breaks my heart how the ‘open ended tragedy’ of the protagonist directly corresponds/coincides w kanta bharti’s real life, ppl who think highly of GKD, they really need to read RKM to know the other side of the story.
I read Gunahon Ka Devta by Dharmveer Bharti in 2014 (cried for days) and Ret Ki Machhali by Kanta Bharti in 2026. (Filled with rage now). I have often found myself thinking about the contrast, not just between Sudha and Kuntal, but between the versions of me that read these books twelve years apart.
Dharmveer Bharti gave us Sudha: a character remembered for her love, sacrifice, and emotional depth. Kanta Bharti gave us Kuntal: a woman who speaks, questions, resists and walks solo.
Perhaps that's why reading both books feels important. One shows how a woman is imagined; the other shows how a woman narrates herself.
The distance between Sudha and Kuntal is worth pondering. Maybe it is also the distance many of us women have travelled, from the woman shaped by patriarchy to the one who places faith on herself.
If this book contains even 1% truth of what Kanta Bharti had to go through in her life while living with Dharamveer Bharti, I don’t think I can ever see him as a good human being or an accomplished writer, for that matter.
Gunahon Ke Devta is ruined for me. Forever. This book boils your blood, leaves you stunned, and makes you feel hollow by the end.
At first, it feels like a scandalous book, but once you begin to see what she has to go through, you understand the pain being portrayed.
By the end, you see the reality of the two-faced man and you’re just… ugh.
जब कोई विवाह टूटने लगता है तो क्या होता है? कभी-कभी यह अपेक्षाकृत सरल होता है, दो लोग एक-दूसरे से दूर हो जाते हैं, समझ जाते हैं कि रिश्ता खत्म हो चुका है और अलग हो जाते हैं। लेकिन तब क्या, जब आपको एहसास हो जाए कि आपका विवाह टूट चुका है और फिर भी आप उससे बाहर नहीं निकल पा रहे हों? जब आप रोज़ क्रूरता झेलते हों, फिर भी मन के किसी कोने में यह उम्मीद बची रहे कि शायद सामने वाला बदल जाएगा और अगली बार वह आपको और गहरे तक चोट पहुँचा दे?
शायद इसी वजह से रेत की मछली शीर्षक इतना मार्मिक लगता है। मछली का जीवन पानी में है, लेकिन जब वह रेत पर छूट जाती है तो उसका अस्तित्व ही संघर्ष बन जाता है। यह रूपक उस घुटन और बेबसी को बेहद प्रभावी ढंग से सामने लाता है, जो इस उपन्यास के केंद्र में है।
कांता भारती के धर्मवीर भारती के साथ विवाह से प्रेरित या उसका काल्पनिक रूपांतरण माने जाने वाले इस उपन्यास में शोभन और कुंतल के विवाह को धीरे-धीरे, टुकड़ा-टुकड़ा टूटते हुए देखा जा सकता है। पात्रों और लेखिका के वास्तविक जीवन के बीच दिखाई देने वाली समानताओं ने इस किताब को पढ़ना और भी दिलचस्प, और कहीं अधिक असहज बना दिया।
कांता भारती का लेखन बेहद सशक्त और बेबाक है। वह कुछ भी घुमा-फिराकर नहीं कहतीं। लगभग हर पन्ने पर ऐसा व्यवहार सामने आता है जिसे पढ़ना तकलीफ़देह है। और जब आपको लगता है कि अब इससे बुरा और क्या हो सकता है, अगली ही घटना आपको फिर से झकझोर देती है। धीरे-धीरे यह बेबसी एक ऐसी सुन्नता में बदलने लगती है, जिससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।
यह एक बेहद हृदयविदारक उपन्यास है और इसकी सीधी, बेबाक भाषा इसके प्रभाव को और गहरा कर देती है। किताब ने मुझे अंत तक बाँधे रखा, लेकिन अंत में मैं प्रभावित कम और भीतर से टूट चुका ज़्यादा था। और शोभन तथा धर्मवीर भारती के बीच दिखाई देने वाले समानताओं को जानने के बाद, मैंने गुनाहों का देवता के लेखक और उनके लेखन को भी एक बिल्कुल अलग नज़र से देखना शुरू कर दिया।
हम अक्सर कहते हैं कि कलाकार और उसकी कला को अलग-अलग देखना चाहिए। लेकिन रेत की मछली पढ़ने के बाद मेरे लिए यह अंतर करना कहीं अधिक कठिन हो गया।
अगर आप अपना दिल तुड़वाना चाहते हैं, तो इसे पढ़िए। शायद यही इस किताब की सिफारिश करने का एकमात्र तरीका है।
किरदार काफ़ी वास्तविक और भावनात्मक रूप से प्रभावशाली हैं। उनसे जुड़ाव महसूस हुआ, लेकिन उनके फ़ैसले बार-बार निराश भी करते रहे। कुंतल का लगातार दुख झेलते रहना और ज़रूरत पड़ने पर भी मज़बूती से कदम न उठाना कई जगह खलता रहा, जबकि शोभन और मीनल जैसे किरदारों ने गुस्सा दिलाया।
यह उपन्यास रिश्तों, सत्ता-संबंधों और इंसानी स्वभाव के असहज पहलुओं को ईमानदारी से सामने रखता है, इसलिए पढ़ने के बाद भी याद रह जाता है। लेकिन मेरे लिए इसे पढ़ने का अनुभव ज़्यादा रोचक होने के बजाय निराशाजनक रहा। इसकी लेखन शैली और किरदारों की जटिलता की सराहना करता हूँ, फिर भी कुल मिलाकर मुझे उतना आनंद नहीं आया, जितनी उम्मीद थी।
कुंतल जी का कैसा दुर्भाग्य, जिस व्यक्ति के लिए उन्होंने समाज से, स्वयं के परिवार से विद्रोह किया उसी व्यक्ति ने उन्हें इतनी कठोर यातनाएं दी। परन्तु उनकी जिजीविषा को नमन है, जो इतना कुछ सहने के बाद भी उठ खड़ी हुई अपने पैरों पर। कांता जी का लेखन बिना किसी रहस्यमई भाषा के स्पष्ट, साफ़ एवं सीधा है। अगर आपने धर्मवीर भारती जी की कृति गुनाहों के देवता को बड़े चाव से पढ़ा है, तो रेत की मछली अवश्य पढ़िए। आप पाएंगे, कि रेत की मछली पढ़ने के बाद कुछ तो अंदर टूट चुका है।
What Manto wrote as stories, Kuntal lived it !!! What morality is ! And for whom it is ? And can we ,again a question asked many a time , separate the art from the artist ? It seems now all the recent readings I did are making sense now and pointing towards the same question about morality ! Sann a play by Piyush Mishra , the vegetarian, manto ki kahaniyan aur ret ki machli !
कांता भारती का उपन्यास 'रेत की मछली' स्त्री-पुरुष के रिश्ते, शादीशुदा ज़िंदगी के दर्द और पितृसत्ता की कड़वी सच्चाइयों की एक मज़बूत और परेशान करने वाली कहानी है। यह किताब बहुत ही सरल भाषा में लिखी गई है, इसमें कोई दिखावा या सजावट नहीं है और यह कड़वी सच्चाइयों को सीधे तौर पर पेश करती है। यह उपन्यास सिर्फ़ एक कहानी नहीं है, बल्कि एक ऐसी किताब है जो आपको उन कड़वे सच का सामना करने पर मजबूर करती है जिनका सामना तो कई लोग करते हैं, लेकिन उन पर शायद ही कभी बात करते हैं!
कहानी कुंतल के नज़रिए से, यानी 'मैं' शैली में कही गई है। शोभन कई उम्मीदों के साथ कुंतल से शादी करता है। वह उस पर पूरा भरोसा करती है और उसके लिए अपने परिवार के ख़िलाफ़ भी चली जाती है। हालाँकि, धीरे-धीरे वह एक ऐसे रिश्ते में फँसती जाती है जो रोमांटिक तो बिल्कुल नहीं है। बल्कि उसमें कंट्रोल, धोखा और मानसिक प्रताड़ना है!
इसे पढ़ते हुए आपको अक्सर गुस्सा आएगा। कभी कुंतल पर, यह सोचकर कि वह हमेशा इतना सब्र क्यों रखती है। कभी शोभन पर, यहाँ तक कि आप उससे नफ़रत करने लगते हैं। शोभन के किरदार को जानने-समझने से आपको यह भी अंदाज़ा होता है कि किसी को नापसंद करने और किसी से नफ़रत करने का क्या मतलब होता है!
'गुनाहों का देवता' भावुक और नाटकीय है और यहाँ तक कि दर्द को भी रोमांटिक अंदाज़ में पेश करता है, जबकि 'रेत की मछली' सीधी-सपाट बात करती है। इसमें किसी बनावटीपन या मीठी-मीठी बातों की ज़रूरत नहीं है। यही वजह है कि यह सीधे दिल पर असर करती है। ज़रूर पढ़े!
Last year I read a novel by Dharamveer Bharti and I remember being so furious at the male protagonist. There’s a scene where he slaps the woman he claims to love — and I had to literally close the book and walk away. I kept thinking, how is this love? How are we still romanticizing men who hurt women and call it passion?
And then yesterday, in stolen office hours (yes, I risked it 😭), I finished "Ret Ki Machali" by Kanta Bharti — and I have not been the same since.
If the "Gunahon ka Devta" book made me angry, this one left me speechless.
Knowing that both these stories are said to be drawn from the authors’ real lives — even if the names are changed — makes it hit even harder. Because this isn’t just fiction. This is lived suffocation.
In "Ret Ki Machali", Sobhan — Kuntal’s husband — is having an extramarital affair with Meenal, a girl he shamelessly introduces as “like his sister.” The audacity. But it gets worse. He forces Kuntal to stay in the same room while he is intimate with Meenal. I felt physically uncomfortable reading those pages. The humiliation. The psychological cruelty. And then the assault.
How does someone survive that?
Kuntal’s life felt like being buried alive in sand — fitting for a title that translates to “fish of the sand.” A creature that cannot breathe, cannot move, cannot escape. Every page felt heavy. There was no dramatic rebellion, no cinematic revenge — just a slow, suffocating existence inside a marriage that had rotted from the inside.
I wasn’t crying. I wasn’t even angry this time. I just felt hollow.
Books like this don’t entertain you. They expose things. They force you to sit with discomfort. They make you question how many Kuntals exist around us — smiling in family photos, carrying trays of tea, swallowing their pain because society told them endurance is virtue.
This wasn’t an easy read. It wasn’t even a “likable” read.
But it was powerful.
And I think some stories are not meant to be enjoyed — they’re meant to be witnessed.
मैंने हाल ही में रेत की मछली पढ़ी, लेकिन ईमानदारी से कहूँ तो यह समझ पाना मेरे लिए कठिन रहा कि इस पुस्तक की इतनी अधिक प्रशंसा क्यों की जाती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि साहित्यिक और भाषागत स्तर पर यह एक सशक्त कृति है—भाषा पर लेखक की पकड़, प्रतीकों का प्रयोग और भावनात्मक बनावट प्रशंसनीय है। किंतु जब कथानक और चरित्र-विश्वसनीयता की बात आती है, तो यह पुस्तक मुझे अत्यंत फीकी और असंतुलित लगी। कुंतल का चरित्र सबसे अधिक खटकता है। जो स्त्री विवाह से पहले अपने माता-पिता से विद्रोह करने का साहस रखती है, वही विवाह के बाद अपने पति के सामने पूरी तरह मौन और आत्मसमर्पित हो जाती है, अपने साथ हो रहे किसी भी अन्याय के प्रति आवाज नहीं उठाती है, यहाँ तक की सामाजिक दुर्व्यवहार को भी सहज रूप से स्वीकार करती है—यह परिवर्तन न केवल अविश्वसनीय लगता है, बल्कि लगातार पाठक को विचलित भी करता है। पढ़ते समय मेरे मन में बार-बार यह प्रश्न उठता रहा कि कोई व्यक्ति इतनी दीन-हीन और निष्क्रिय अवस्था को कैसे स्वीकार कर सकता है। शायद इसी कारण मैं इस पुस्तक के कथानक से जुड़ नहीं पाया और धीरे-धीरे ऊबने लगा। इसके अतिरिक्त, पुस्तक में चित्रित भाई-बहन का संबंध भी मुझे 1962 के सामाजिक यथार्थ से मेल खाता हुआ प्रतीत नहीं हुआ। वह संबंध न तो सामाजिक संरचना के अनुरूप लगता है और न ही उस समय की मानसिकता के। यह प्रस्तुति अधिक कल्पनात्मक और कम यथार्थपरक जान पड़ती है। यदि यह कृति कांता भारती द्वारा धर्मवीर भारती के संदर्भ में लिखी गई मानी जाए, तो यह असंगति और भी स्पष्ट हो जाती है। वास्तविक कांता भारती का व्यक्तित्व इतना असहाय और विवश प्रतीत नहीं होता जितना कि उपन्यास की कुंतल। यहाँ चरित्र और वास्तविकता के बीच का फासला पाठक को स्वीकार करने में कठिनाई होती है। कुल मिलाकर, रेत की मछली मेरे लिए एक ऐसी पुस्तक रही जिसकी ख्याति उसके कथ्य से कहीं अधिक भारी है। भाषा और शैली के स्तर पर यह कृति भले ही महत्वपूर्ण हो, लेकिन कथानक, चरित्रों की विश्वसनीयता और सामाजिक संदर्भों की दृष्टि से यह मुझे संतुष्ट नहीं कर सकी।
The writer of the book has moulded the character of Shobhan on Dharmaveer Bharti who as reported by her ex wife and author of this book once called himself as Indian Sartre. He should have added that he rivalled him as much in sexual partners as in literary popularity.