बग़लगीर संतोष दीक्षित के इस उपन्यास का वास्ता हमारे समय और समाज के एक बेहद दारुण यथार्थ से है। साम्प्रदायिकता का जहर घुलते जाने से सौहार्द किस तरह नष्ट होता है और एक समय भाईचारे की मिसाल जान पड़ते रिश्ते किस तरह शत्रुता में बदल जाते हैं, 'बग़लगीर' इसी की दास्तान है। यों इसमें सबसे मुख्य पात्र किकि यानी किशोर किरण की रुचि के सहारे साहित्यिक दुनिया में पसरे ओछेपन और करियर की दौड़ के बहाने नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार तथा खुशामदी माहौल का भी भरपूर वर्णन है, साथ ही राजनीति और अफसरशाही के भ्रष्ट गठजोड़ का भी, लेकिन मुख्य प्रतिपाद्य है यह दिखलाना कि समाज रूपी शरीर की नसों में साम्प्रदायिक वैमनस्य का विष घुलने का क्या परिणाम होता है।