नेताजी कहिन साप्ताहिक हिंदुस्तान में अनियमित रूप से प्रकाशित स्तंभ नेताजी कहिन के साथ कई विचित्रताएँ जुड़ी हैं। पहली तो यह कि संपादक ‘म. श्या. जो.’ को एक बार नेताजी पर छोटा-सा व्यंग्य लिखने के कारण पाठकों ने यह ‘सजा’ दी कि वह लगातार व्यंग्य स्तंभ लिखे, संपादकी न बघारे! दूसरी यह कि समसामयिक घटनाओं को विषय बनाने के बावजूद यह स्तंभ ‘सनातन’ में भी खूँटा गाड़े रहा। तीसरी यह कि राजनीतिक बिरादरी की संस्कारहीनता उजागर करनेवाले ये व्यंग्य कुछ महत्त्वपूर्ण पाठकों को स्वयं संस्कारहीन मालूम हुए। और चौथी यह कि बैसवाड़ी और भोजपुरी की छटा दिखाती ऐसी नेताई भाषा, कहते हैं, अब तक मात्र सुनी ही गई थी। लेकिन इस किताब में वह लिखी हुई, बल्कि बाकायदा छपी हुई, है। व्यंग्य इन लेखों का दुधारा है। नेताओं के साथ-साथ ‘किर्रुओं’ पर भी उसकी धार है। ‘किर्रू’ यानी जो नेताओं को कोसते भी रहते हैं और जीते भी रहते हैं उन्हीं के आसरे। दरअसल यहीं ‘म. श्या. जो.’ के व्यंग्य से बचाव मुश्किल है, क्योंकि तिलमिला उठता है हमारे ही भीतर बैठा कोई किर्रू! निश्चय ही ‘हिंदुस्तान’ के नेताओं और ‘किर्रुओं’ पर किए गए ये व्यंग्य हिंदी के ‘कामचलाऊ’ स्वरूप, राष्ट्रीय चरित्र और जातीय स्वभाव का बेहतरीन खुलासा करते हैं।
लखनऊ विश्वविद्यालय के विज्ञान स्नातक मनोहर श्याम जोशी ‘कल के वैज्ञानिक’ की उपाधि पाने के बावजूश्द रोजी-रोटी की खातिर छात्र जीवन से ही लेखक और पत्रकार बन गए। अमृतलाल नागर और अज्ञेय - इन दो आचार्यों का आशीर्वाद उन्हें प्राप्त हुआ। स्कूल मास्टरी, क्लर्की और बेरोजगारी के अनुभव बटोरने के बाद 21 वर्ष की उम्र से वह पूरी तरह मसिजीवी बन गए।
प्रेस, रेडियो, टी.वी. वृत्तचित्र, फिल्म, विज्ञापन-सम्प्रेषण का ऐसा कोई माध्यम नहीं जिसके लिए उन्होंने सफलतापूर्वक लेखन-कार्य न किया हो। खेल-कूद से लेकर दर्शनशास्त्र तक ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर उन्होंने कलम न उठाई हो। आलसीपन और आत्मसंशय उन्हें रचनाएँ पूरी कर डालने और छपवाने से हमेशा रोकता रहा है। पहली कहानी तब छपी जब वह अठारह वर्ष के थे लेकिन पहली बड़ी साहित्यिक कृति तब प्रकाशित करवाई जब सैंतालीस वर्ष के होने को आए।
केन्द्रीय सूचना सेवा और टाइम्स ऑफ इंडिया समूह से होते हुए सन् ’67 में हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशन में साप्ताहिक हिन्दुस्तान के संपादक बने और वहीं एक अंग्रेजी साप्ताहिक का भी संपादन किया। टेलीविजन धारावाहिक ‘हम लोग’ लिखने के लिए सन् ’84 में संपादक की कुर्सी छोड़ दी और तब से आजीवन स्वतंत्र लेखन करते रहे।
प्रकाशित कृतियाँ: कुरु-कुरु स्वाहा, कसप, हरिया हरक्यूलीज की हैरानी, हमज़ाद, क्याप, ट-टा प्रोफेसर (उपन्यास); नेताजी कहिन (व्यंग्य); बातों-बातों में (साक्षात्कार); एक दुर्लभ व्यक्तित्व, कैसे किस्सागो, मन्दिर घाट की पैड़ियाँ (कहानी-संग्रह); आज का समाज (निबंध); पटकथा लेखन: एक परिचय (सिनेमा)। टेलीविजन धारावाहिक: हम लोग, बुनियाद, मुंगेरीलाल के हसीन सपने, कक्काजी कहिन, हमराही, जमीन-आसमान। फिल्म: भ्रष्टाचार, अप्पू राजा और निर्माणाधीन जमीन।
सम्मान: उपन्यास क्याप के लिए वर्ष 2005 के साहित्य अकादेमी पुरस्कार सहित शलाका सम्मान (1986-87); शिखर सम्मान (अट्ठहास, 1990); चकल्लस पुरस्कार (1992); व्यंग्यश्री सम्मान (2000) आदि अनेक सम्मान प्राप्त।
'नेताजी कहिन' आज से 26 साल पहले लिखा गया था परंतु आज के पाठकों और आज के माहौल के लिए भी इसका कटाक्ष उतना ही सामयिक है और उतना ही तीखा भी। बस इसमें जहां जहां हज़ार रुपये का उल्लेख है उसे लाख से और जहां लाख है उसे करोड़ से बदल दीजिये और ये आज भी उतना ही प्रासंगिक हो जाएगा। हास्यात्मक शैली में लेखक ने, हमारे देश के राजनीतिक जीवनशैली में सर्वव्याप्त भ्रष्टाचार और पूरे जन समाज के ही नैतिक पतन का जैसा चित्रण किया है वह झकझोर देने वाला है और डरावना भी। सबसे हृदयविदारक बात ये है कि उपरोक्त का वर्णन आपको किनहिं मामलों में आज के भ्रष्टाचार के किस्सों से उन्नीस नहीं लगेगा। केवल एकाध शून्यों का अंतर मिलेगा लेन-देन के हिसाबों में,बस। इसी कारण से इसकी कथा से 'golden-ageism' के उस सिद्धान्त को भी बल मिलता है, जिसके अनुसार हमें सदैव ही गुज़रा हुआ ज़माना, सुहाना और हर दृष्टिकोण से आज से बेहतर और सभ्य नज़र आता है और सारी कमियाँ और त्रुटियाँ वर्तमान में ही नज़र आती हैं। क्योंकि यदि इसके कथ्य के हिसाब से चलें तो कोई खास अंतर नहीं मिलेगा आज के और आज से 26 साल पहले के समाज में। इसलिए यदि इसे पढ़कर आप निराशावाद के पुजारी हो जाएँ तो कोई बड़ी बात नहीं। अतएव इसे पढ़ें पर इसके 'after-effects' के लिए भी तयार रहें।
नेताजी कहीं एक क्लासिक व्यंग्य है इतना सार गर्भित और साथ में कॉमिक भी . हर कहानी गुदगुदाती है पर बहुत कुछ सोचने पर भी मजबूर करती है. हो सकता है आजकल के पाठकों को ये व्यंग्य उतने प्रासंगिक न लगें. पर जिन्होंने पुराना ज़माना देखा है उनके लिए ये किताब आज भी सामयिक है
super book, i have become a fan of Manohar Joshi.. three more books to read. he has painted the picture of a small time politician so effortlessly and the way he has written the dialogues.. uff. a ggod book to understand indian politics and politicians.
किताब अख़बार में छापे कॉलमस का संकलन है। पात्र वही हैं और हर बार कुछ नया किस्सा। नेताजी दिल्ली की राजनीती में एक छुटभैये नेता हैं, बिचोलिये का काम करके अपनी दिहाड़ी चला रहे हैं, कुतर्कों की खान हैं, पर जोशी जी की सक्षम कलम कभी भी हम जैसे किर्रूों को मोरल हाई ग्राउंड पर चढ़ने नहीं देती, नेताजी के समकक्ष बनाये रहती है. "एटमॉस्फेयर फ्रेंडली राखी का चाही" का नारा बुलंद करने वाले नेताजी राजनीतिज्ञों और मध्यवर्ग दोनों को आइना दिखाने में सक्षम किरदार हैं.
जोशी जी की अन्य कृतियों की तरह यहाँ भी हिंदी अपने विभिन्न स्वरूपों में मौजूद है और व्यंग्य के तीखेपन का माध्यम है. जहाँ मानक हिंदी बोलने वाले कक्का और काकी "किर्रू लयवल" लोगों के प्रतिनिधि बनते हैं, दिल्ली की राजनीति के इस अंतःस्तर में तमाम किरदार अपनी अपनी बोलियों से एक सतरंगी छटा बिखेरते रहते हैं. जैसा की नेताजी का कहना भी है की पूर्वांचल और पूर्वी बिहार की बोली दिल्ली की राजनीती की बोली है.
और तुलसी और रहीम के दोहों के अंग्रेजी अनुवाद आपको और कहाँ मिलेंगे! रहिमन सिट साइलेंटली, वाचिंग वर्ल्डली वेज़.
It's an excellent political satire.My only problem with the book was that it's been written in a dialect which makes comprehension a bit difficult and slow.