लखनऊ विश्वविद्यालय के विज्ञान स्नातक मनोहर श्याम जोशी ‘कल के वैज्ञानिक’ की उपाधि पाने के बावजूश्द रोजी-रोटी की खातिर छात्र जीवन से ही लेखक और पत्रकार बन गए। अमृतलाल नागर और अज्ञेय - इन दो आचार्यों का आशीर्वाद उन्हें प्राप्त हुआ। स्कूल मास्टरी, क्लर्की और बेरोजगारी के अनुभव बटोरने के बाद 21 वर्ष की उम्र से वह पूरी तरह मसिजीवी बन गए।
प्रेस, रेडियो, टी.वी. वृत्तचित्र, फिल्म, विज्ञापन-सम्प्रेषण का ऐसा कोई माध्यम नहीं जिसके लिए उन्होंने सफलतापूर्वक लेखन-कार्य न किया हो। खेल-कूद से लेकर दर्शनशास्त्र तक ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर उन्होंने कलम न उठाई हो। आलसीपन और आत्मसंशय उन्हें रचनाएँ पूरी कर डालने और छपवाने से हमेशा रोकता रहा है। पहली कहानी तब छपी जब वह अठारह वर्ष के थे लेकिन पहली बड़ी साहित्यिक कृति तब प्रकाशित करवाई जब सैंतालीस वर्ष के होने को आए।
केन्द्रीय सूचना सेवा और टाइम्स ऑफ इंडिया समूह से होते हुए सन् ’67 में हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशन में साप्ताहिक हिन्दुस्तान के संपादक बने और वहीं एक अंग्रेजी साप्ताहिक का भी संपादन किया। टेलीविजन धारावाहिक ‘हम लोग’ लिखने के लिए सन् ’84 में संपादक की कुर्सी छोड़ दी और तब से आजीवन स्वतंत्र लेखन करते रहे।
प्रकाशित कृतियाँ: कुरु-कुरु स्वाहा, कसप, हरिया हरक्यूलीज की हैरानी, हमज़ाद, क्याप, ट-टा प्रोफेसर (उपन्यास); नेताजी कहिन (व्यंग्य); बातों-बातों में (साक्षात्कार); एक दुर्लभ व्यक्तित्व, कैसे किस्सागो, मन्दिर घाट की पैड़ियाँ (कहानी-संग्रह); आज का समाज (निबंध); पटकथा लेखन: एक परिचय (सिनेमा)। टेलीविजन धारावाहिक: हम लोग, बुनियाद, मुंगेरीलाल के हसीन सपने, कक्काजी कहिन, हमराही, जमीन-आसमान। फिल्म: भ्रष्टाचार, अप्पू राजा और निर्माणाधीन जमीन।
सम्मान: उपन्यास क्याप के लिए वर्ष 2005 के साहित्य अकादेमी पुरस्कार सहित शलाका सम्मान (1986-87); शिखर सम्मान (अट्ठहास, 1990); चकल्लस पुरस्कार (1992); व्यंग्यश्री सम्मान (2000) आदि अनेक सम्मान प्राप्त।
लेखक इस उपन्यास का परिचय देते हुए इसी के एक पात्र के शब्दों को उद्धृत करते हैं: "एइसा कॉमेडी कि दर्शिक लोग जानेगा, केतना हास्यपद है त्रास अउर केतना त्रासद है हास्य।"
मुझे तो त्रासद ही लगी; संभवत हास्य त्रासदी का आवरण होता है।
उपन्यास के नायक का नाम और लेखक का नाम एक ही है, लेकिन लेखक ने कहा है कि यह कल्पित पात्र है। नायक के भीतर तीन तरह के पात्र हैं, कुछ इस तरह जैसे हमसब भी हर परिस्थिति को अपने भीतर मौजूद कई दृष्टियों से देखते हैं।
कहानी में ढेर सारे रिफरेन्स, ढेर सारी वर्ल्ड फेम कृतियाँ और श्लोको का ज़िक्र हुआ है जो मुझ मूढ़ के ऊपर से निकल गए। समझ लायक चीजों को समेटते हुए कहानी के साथ आगे बढ़ा।
नायक के भीतर जो तीन तरह के पात्र हैं उनमें से एक इस कहानी को सुना रहे हैं। एक इंटेलेक्चुअल और well read पत्रकार/लेखक महोदय वेश्याओं के जीवन पर कुछ खोजबीन कर रहे हैं और वहीँ उनका परिचय इस कहानी की रहस्यमयी नायिका 'पहुंचेली' के साथ होता है। नायिका, जिसका shade ग्रे है, से परिचय होता है कहना सही नहीं होगा। उसी का परिचय पाने के लिए दुनिया जहान की किताबें बांच कर खुद को इंटेलेक्चुअल समझने वाले जोशी जी इधर-उधर पटखनी खाते रहते हैं और उनकी इन पटखनियों के साथ पाठक फ़िल्मी जगत के स्ट्रगल और थोडा बहुत क्राइम जगत वालों का दर्शन करता हुआ हास्यमय त्रासद को देखता है और संभवतः त्रासद को प्राप्त होता है क्योंकि पुस्तक थोड़ी घुमावदार यानि confusing है और उतनी इंटरेस्टिंग भी नहीं।
I read this book in 2004 , the quotes like " Apsara Ko Aghori mangta , to tere Baap ka kya jaata" and " After every great pain a formal feeling comes" have stayed with me since then. Long before doing my BS course at SBA GURGAON, I have known about adult, child and parent through Manohar, Shyam and Joshi ji analogy which is used in this novel to clarify the internal thought process of the author. What a marvellous way. I used the concept to clarify my thought process since then and even wrote a full diary on this basis. Love you Sir.
this might be my 7th and last novel of MSJ. enough for now. the novel is absurd, no clear ending, but one concept is entertaining i.e. 3 men in a same man, Manohar, Shyam and Joshi ji which is writer's actual name also. may be writer wanted to emphasize that there are several person or personalities in one man. writer has a habit of quoting other books, plays etc meaning he is very very well read. name of heroine is interesting " pahuncheli"
Manohar Shyam Joshi has the art of an author and the expanse of a philosopher. While this story may sound a bit random as compared to his other works but each episode in this novel is a book in itself. The book sounds a bit like an autobiography or a part of it because of the way it's written. The language and punches are something that makes the reader come back and read again to ingest. Absolutely worth reading if you love Hindi literature.
Jarur padhi Jani chahiye.. itna Sundar vyang.. behatreen samvad.. halke andaj me gehri gehri batein. Mujhe hairani hoti h ki ye classic me kyu nahi gina jata.
Kuch kahaniya hoti h Jo Bina bht gambhir dikhe.. bht gambhir batein kehti hai. Ye wahi h
कुरु – कुरु स्वाहा… को पढ़ना एक श्रमसाध्य काम हैं| जिसमें आप कथानक के साथ जुड़ते हुए भी उससे दूर रहते हैं| उपन्यास मुंबई की एक कहानी को बारीकी, बेबाकी और बेगैरत तरीके के साथ पूरी साहित्यिकता, नाटकीयता, और सांस्कृतिकता के साथ कहता है| मनोहर श्याम जोशी से यह मेरा पहला परिचय है| मैंने कभी उनके हमलोग, बुनियाद या कोई और धारावाहिक भी नहीं देखा| जिस वक्त मेरे सहपाठी मुंगेरीलाल के हसीं सपने देखते थे मैं अपने अन्दर कोई मुंगेरीलाल पाले बैठा था| मगर कुरु – कुरु स्वाहा… पढ़ने से मुझे यह स्पष्ट हो गया कि मनोहर श्याम जोशी जीवन के हर फ्रेम को थ्री डी चश्मे से नहीं देखते वरन दस दिशाओं से अवलोकते हैं| उनके पास हर फ्रेम का बहुआयामी मॉडल रचने का माद्दा है|
जैसा कि उपन्यास के बारे में अंतिम पृष्ठ पर लिखा गया है, “एइसा कॉमेडी कि दार्शिक लोग जानेगा, केतना हास्यास्पद है त्रास अउर केतना त्रासद है हास्य”| मगर मैं सावधान हूँ, यह परिचय शायद मनोहर श्याम जोशी ने खुद लिखा है और अपने उपन्यास को स्वाहा करने के उनकी साजिश का हिस्सा मात्र है| कुरु- कुरु स्वाहा पढ़ते समय पाठक को अपने न होने का काम्प्लेक्स होने लगता है और पढ़ते हुए अपनी क्षुद्रता पर भी गर्व सा कुछ होता है कि पाठक इसे पढ़ पा रहा है| बहुत से विवरणों को पाठक पढने के साथ नकारता या छोड़ता चलता है और उसे अपनी तमाम क्षुद्रता के मार्फ़त पढ़ता समझता चला जाता है| कुरु – कुरु स्वाहा… खुद को स्वाहा करने से पहले अपने लेखक, अपने नायक और फिर पाठक को स्वाहा करता चलता है|
कुरु – कुरु स्वाहा… में कथानक है यह तो समझ में आता है मगर कई बार आप रुक कर कथानक को ढूंढने लगते है| कई बार लगता है कि कई कथानक है तो कई बार आप उन कथानकों के से आप उपन्यास का एक कथानक ढूंढने लगते हैं| कुरु – कुरु स्वाहा… को पढ़ना अपने जीवन के उन पहलुओं को पढ़ना हैं जिन्हें हम अपने आप में होते हुए नकारते चलते हैं| कुरु – कुरु का कुरु – कुरु वही है जो हम जीवन में घटित होते हुए नकार दिया जाता है या कि स्वीकार नहीं किया जाता| कथानायक अपनी उन उबासियों में जो हैं हीं नहीं, जीवन के उन्हीं पहलूओं को जीता चला जाता हैं|
अब जैसा की उप्पन्यास कहता है, यह पाठक पर है कि इस ‘बकवास’ को ‘एब्सर्ड’ का पर्याय माने या न माने|
Manohar Shyam Joshi is a name well known to an earlier generation of Indians who watched soap operas like Hum Log, Buniyad and Kakkaji Kahin. He was also a prolific writer and even won a Sahitya Academy Award for one of his novels. But he is unlikely to be seen on the recommended books lists and the bestseller lists of Hindi literature.
I loved Kuru Kuru Swaha from the page one. The book is dedicated to Hazari Prasad Dwivedi (of Banbhatt ki Aatmkatha fame) and his effect is clear. The wit, the sarcasm, the innovative craft, daft use of multiple Hindi registers. And a story of a middle class struggling writer in Mumbai who is well read in both Indian and western literature. He carries off that mix beautifully. Between Mahohar, Joshi Ji and M. S. Joshi, this is a masterful exposition of internal gymnastics going on in the heads of a middle class intellectual.
Having said that, I realize that the book may not be to everyone's taste. You would need to have a tolerance for absurd, and mental jumps from Upnishads to Graham Green in the same sentence. Usage of large number of Hindi dialects and other languages may also seem off putting. But if you can enjoy it, it is a unique ride.
The writer himself is the protagonist of this engaging novel who has two characters to play in his life. One is the publicly known image of writer and intellectual Joshi ji and the other one of a young man with all his worldly desires. The novel is set in the magical city of Bombay (not Mumbai) with Pahuncheli, a woman outside the reach of the common man Joshi. As the writer himself acknowledges that there is no story as such in the novel despite there being so many story lines running parallel throughout. A good readable work from a eminent satirist and writer Manohar Shyam Joshi.