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मकान

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HINDI
240

**Contents and Sample Pages**

239 pages, Paperback

First published January 1, 1976

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About the author

श्रीलाल शुक्ल (31 दिसम्बर 1925 - 28 अक्टूबर 2011) हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार थे। वह समकालीन कथा-साहित्य में उद्देश्यपूर्ण व्यंग्य लेखन के लिये विख्यात थे।

उन्होंने 1947 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक परीक्षा पास की। 1949 में राज्य सिविल सेवासे नौकरी शुरू की। 1983 में भारतीय प्रशासनिक सेवा से निवृत्त हुए। उनका विधिवत लेखन 1954 से शुरू होता है और इसी के साथ हिंदी गद्य का एक गौरवशाली अध्याय आकार लेने लगता है। उनका पहला प्रकाशित उपन्यास 'सूनी घाटी का सूरज' (1957) तथा पहला प्रकाशित व्यंग 'अंगद का पाँव' (1958) है। स्वतंत्रता के बाद के भारत के ग्रामीण जीवन की मूल्यहीनता को परत दर परत उघाड़ने वाले उपन्यास 'राग दरबारी' (1968) के लिये उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके इस उपन्यास पर एक दूरदर्शन-धारावाहिक का निर्माण भी हुआ। श्री शुक्ल को भारत सरकार ने 2008 में पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया है।

व्यक्तित्व
श्रीलाल शुक्ल का व्यक्तित्व अपनी मिसाल आप था। सहज लेकिन सतर्क, विनोदी लेकिन विद्वान, अनुशासनप्रिय लेकिन अराजक। श्रीलाल शुक्ल अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत और हिन्दी भाषा के विद्वान थे। श्रीलाल शुक्ल संगीत के शास्त्रीय और सुगम दोनों पक्षों के रसिक-मर्मज्ञ थे। 'कथाक्रम' समारोह समिति के वह अध्यक्ष रहे। श्रीलाल शुक्ल जी ने गरीबी झेली, संघर्ष किया, मगर उसके विलाप से लेखन को नहीं भरा। उन्हें नई पीढ़ी भी सबसे ज़्यादा पढ़ती है। वे नई पीढ़ी को सबसे अधिक समझने और पढ़ने वाले वरिष्ठ रचनाकारों में से एक रहे। न पढ़ने और लिखने के लिए लोग सैद्धांतिकी बनाते हैं। श्रीलाल जी का लिखना और पढ़ना रुका तो स्वास्थ्य के गंभीर कारणों के चलते। श्रीलाल शुक्ल का व्यक्तित्व बड़ा सहज था। वह हमेशा मुस्कुराकर सबका स्वागत करते थे। लेकिन अपनी बात बिना लाग-लपेट कहते थे। व्यक्तित्व की इसी ख़ूबी के चलते उन्होंने सरकारी सेवा में रहते हुए भी व्यवस्था पर करारी चोट करने वाली राग दरबारी जैसी रचना हिंदी साहित्य को दी।

रचनाएँ
• 10 उपन्यास, 4 कहानी संग्रह, 9 व्यंग्य संग्रह, 2 विनिबंध, 1 आलोचना पुस्तक आदि उनकी कीर्ति को बनाये रखेंगे। उनका पहला उपन्यास सूनी घाटी का सूरज 1957 में प्रकाशित हुआ। उनका सबसे लोकप्रिय उपन्यास राग दरबारी 1968 में छपा। राग दरबारी का पन्द्रह भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी में भी अनुवाद प्रकाशित हुआ। राग विराग श्रीलाल शुक्ल का आखिरी उपन्यास था। उन्होंने हिंदी साहित्य को कुल मिलाकर 25 रचनाएं दीं। इनमें मकान, पहला पड़ाव, अज्ञातवास और विश्रामपुर का संत प्रमुख हैं।
उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं -
1. सूनी घाट का सूरज (1957)
2. अज्ञातवास (1962)
3. ‘राग दरबारी (1968)
4. आदमी का ज़हर (1972)
5. सीमाएँ टूटती हैं (1973)
6. ‘मकान (1976)
7. ‘पहला पड़ाव’(1987)
8. ‘विश्रामपुर का संत (1998)
9. बब्बरसिंह और उसके साथी (1999)
10. राग विराग (2001)
11. ‘यह घर मेरी नहीं (1979)
12. सुरक्षा और अन्य कहानियाँ (1991)
13. इस उम्र में (2003)
14. दस प्रतिनिधि कहानियाँ (2003)
• उनकी प्रसिद्ध व्यंग्य रचनाएँ हैं-
1. अंगद का पाँव (1958)
2. यहाँ से वहाँ (1970)
3. मेरी श्रेष्‍ठ व्यंग्य रचनाएँ (1979)
4. उमरावनगर में कुछ दिन (1986)
5. कुछ ज़मीन में कुछ हवा में (1990)
6. आओ बैठ लें कुछ देरे (1995)
7. अगली शताब्दी का शहर (1996)
8. जहालत के पचास साल (2003)
9. खबरों की जुगाली (2005)
आलोचना
1. अज्ञेय:कुछ रंग और कुछ राग (1999)
विनिबंध
1. भगवतीचरण वर्मा (1989)
2. अमृतलाल नागर (1994)
उपन्यास:
सूनी घाटी का सूरज (1957)· अज्ञातवास · रागदरबारी · आदमी का ज़हर · सीमाएँ टूटती हैं
मकान · पहला पड़ाव · विश्रामपुर का सन्त · अंगद का पाँव · यहाँ से वहाँ · उमरावनगर में कुछ दिन
कहानी संग्रह:
यह घर मेरा नहीं है · सुरक्षा तथा अन्य कहानियां · इस उम्र में
व्यंग्य संग्रह:
अंगद का पांव · यहां से वहां · मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनायें · उमरावनगर में कुछ दिन · कुछ जमीन पर कुछ हवा में · आओ बैठ लें कुछ देर
आलोचना:
अज्ञेय: कुछ राग और कुछ रंग
विनिबन्ध:
भगवती चरण वर्मा · अमृतलाल नागर
बाल साहित्य:
बढबर सिंह और उसके साथी

निधन
ज्ञानपीठ पुरस्कार और पद्म भूषण से सम्मानित तथा 'राग दरबारी' जैसा कालजयी व्यंग्य उपन्यास लिखने वाले मशहूर व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल को 16 अक्टूबर को पार्किंसन बीमारी के कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 28 अक्टूबर 2011 को शुक्रवार सुबह 11.30 बजे सहारा अस्पताल में श्रीलाल शुक्ल का निधन हो गया।

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Profile Image for Ranendu  Das.
156 reviews64 followers
February 5, 2017
॥ একটি মানুষ, একটি বাড়ি ও একটি অজ্ঞাত শহর ॥

(হিন্দীতে শ্রীলাল শুক্লার ‘মকান্’, রাধাকৃষ্ণ প্রকাশনী, অথবা বাংলায় ‘ঘর’, অনুবাদ ননী সুর, সাহিত্য একাদেমী)

নারায়ন ব্যানার্জী লোকটিকে আপনি হয়ত চেনেন না! না কি, হয়ত চেনেন? সুর-তাল না বুঝলেও, শুনে থাকবেন হয়ত এই বাঙালী ভদ্রলোকের সেতার বাদন, কোনো কালচারাল অনুষ্ঠানে বা ফিল্মিগানের শেষে বিবিধ-ভারতীর কোনো অলস ‘সম্প্রসারনের’ মুহুর্তে!

নারায়ন সেতার বাজায়; কোনো এক কালে এক অনুষ্ঠানের শেষে বিলেয়েৎ খাঁ তার পিঠ চাপড়ে দিয়েছিলেন, সেই থেকে নারায়ন স্বঘোষিত বিলায়েৎ শিষ্য! খাঁ সাহেবের প্রশংসায় তার কিছু নাম হয়েছিল, খাঁ সাহেবের হয়ে রবিশংকরের বুরাই করে নারায়ন কিছু দুর এগিয়েছিলও, রেডিয়োতে কিছু প্রোগ্রামও করেছিল। কিন্তু, আপাতত নারায়ন এই শহরের নগর-নিগম দপ্তরের একজন সাদামাঠা সহায়ক-হিসেবরক্ষক। নারায়ন তার স্ত্রী মীনাক্ষী, পুত্র-কন্যাদের থেকে দুরে এই শহরে একা; নারায়ন এই শহরে আপন একটা বাড়ি খুঁজছে; নারায়ন এই শহরে একটি ঘরের চাবির মালিকানার আশায় আজকাল নিগম-অফিসারের কাছে দরবার করছে...

এই শহরে নারায়ন যে একদম কাউকে চেনে না, তা নয়। এই শহরে এককালে নারায়ন শ্যামাকে সেতারের টিউশন দিত। এতদিন পরে বিবাহিতা শ্যামাকে দেখে নারায়ন বুঝতে পারে শ্যামার প্রতি তার লোভ আজও মরে নি। শ্যামা অবশ্য আগের মতই আছে। শ্যামা কোনোকালেই তাকে কাছে ঘেষতে দেয় না। কখনো গম্ভীর হয়ে, কখনো পরিহাস করে, কখনো হেসে নারায়নের ইচ্ছেটাকে দমিয়ে রেখেছে।
শ্যামার বন্ধুও সিম্মীও বেশ। সিম্মীর মা-বাবা মারা গেছে বহুদিন, একাই থাকে সে। সিম্মী নারায়নকে অবশ্য শ্যামার মত দুরে সরিয়ে রাখে না। তবুও নারায়নের সঙ্গে তার সম্মন্ধটা কিছুটা আলগা; বন্ধু আর প্রেমিকের মধ্যে কোথাও একটা ধূসর পরিসরে তাদের সম্মন্ধটা টিকে আছে। (শ্যামা আর সিম্মী যেন সদ্য পড়া জহির রায়হানের 'শেষ বিকেলের মেয়ে'র জাহানারা আর শিউলির প্রতিচ্ছবি!) জনবহুল, ময়লা, বিষন্ন এই শহরে, শ্যামা আর সিম্মীই নারায়নের প্রেমের, অবসর-বিষাদের, মদিরা-নেশার, সঙ্গীত-চর্চার দুইমাত্র সঙ্গীরা!

এই উপন্যাসে লেখক নারায়নকে যথাসম্ভব উন্মুক্ত করে প্রকাশ করেছেন। কখনো নিজের, কখনো শ্যামা ও সিম্মীর, কখনো বা অন্যের নজরের মধ্যে দিয়ে লেখক নারায়নের চরিত্রটিকে খুঁজে দেখেছেন। মীনাক্ষী-শ্যামা-সিম্মীর সাথে নারায়নের সম্মন্ধের মধ্যে দিয়ে যেমন এক পুরুষ চরিত্রের প্রেম, কামনা, লোভ ইত্যাদি রিপুর প্রকাশ ঘটেছে, তেমনি আবার তার ভেতর লুকিয়ে থাকা এক শিল্পীর উদাসীন, নিস্পৃহ চরিত্রটিরও প্রকাশ ঘটেছে নারায়নের একাগ্র সঙ্গীত সাধনার মধ্যে দিয়ে। শেষপর্যন্ত নারায়নের চরিত্রের কোথাও কিছু আর লুকানো থাকে না পাঠকের কাছে, ফলে নারায়নের পরিচয় যেন আর নিছক একটি চরিত্রে আবদ্ধ থাকে না, বরং নারায়ন ব্যানার্জী আসলে হয়ে ওঠে খন্ডে-বিখন্ডে আমাদের সকলের প্রতিচ্ছবি!

নারায়ন-শ্যামা-সিম্মীর পাশাপাশি ওই নাম না জানা শহরটিও একটি চরিত্রভুমিকা হয়ে উঠেছে এই উপন্যাসে। শহরটি লক্ষ্নৌ হতে পারে, বা ইলাহাবাদ, বা বারানসী বা কানপুর! এই শহরের নোংরা গলি, পুরানো হাভেলী-মহল্লা, সিনেমাঘর, শ্রমিক লোকজন, ইউনিয়ান নেতা, বিক্ষোভ-হরতাল, পুলিশের 144 ধারা-লাঠিচার্জ, এই সবকিছু মিলেমেশে গিয়েছে নারায়নের অজ্ঞাত শহরে একটি ‘মকান্’র এর খোঁজের সাথে সাথে! আর,শ্যামা-সিম্মী-ইউনিয়ন লীডার বারীন হালদার-নিগম অফিসার-শ্রদ্ধানন্দজী সকলে নারায়নের সেতারের রাগ-রাগিনীর সঙ্গে যোগ্য সঙ্গত করে আসলে আমাদের উপহার দিয়েছেন অপূর্ব একটি কাহিনী।

এই উপন্যাসে নারায়ন মকান্ তলাশ করে, তার সাথে নারায়ন আত্ম-অন্বেষনও করে; আর, নারায়নের সাথে সাথে তলাশ করতে নেমে পাঠকও শেষে এই ভেবে আশ্চর্য হয় যে তার নিজের মনের ঘরেও বসত করে কয়জনা, তা সে নিজেই যেন হায়, জানে না! আসলে, মনই তো আত্মার ঘর, না কি? অন্তরের ঘরের অন্বেষন তাই শেষপর্যন্ত আত্মারই অন্বেষন!

Profile Image for Divya Pal.
601 reviews4 followers
May 6, 2024
एक लम्पट, मद्यप नगर निगम कार्यालय में कार्यरत निम्न स्तर का लेखाकार जो निपुण सितार वादक होते हुए भी, ocd से परेशान, छह बच्चों का बाप भी है - यह उसकी एक मकान की दुखद/हास्यप्रद खोज की कथा है। इस रोचक कहानी में Franz Kafka की रचनाओं का रस भी है ।
राग दरबारी के रचयिता श्रीलाल शुक्ल का पसंदीदा विषय प्रशासनिक अव्यवस्था है, नगर की गलियों का दृश्य, विशेष रूप से वहां की गन्दगी व कोलाहल का अति-सटीक चित्रण किया है। वातावरण पहले ही वाक्य से प्रारम्भ हो जाता है
इस नगर के सड़कें जितनी गन्दी हैं, नगर निगम का दफ्तर उतना ही शानदार है।
आगे देखिये
दस बजे तक यह सड़क ट्रक-मोटर-बस-ताँगा-रिक्शा-साइकिल-ठेला-पैदल आदि से खचखच भर जाती है और इतनी लम्बी-चौड़ी होते हुए भी गलिओं से बदतर हो जाती है। सड़क पर पड़े हुए कूड़े के ढेर और पशुओं के सचल दल प्रत्येक यात्री की गति को दुर्गति में बदल देते हैं। गई-भैंसों के खुर के नीचे दूधों नहाती-पूतों फलती, गोबर से सनी, मूट से गीली, कूड़े-भरी और कबाड़ से घिरी इस सड़क को छोड़कर। ...

मिठाई के एक घिनौने टुकड़े पर सैकड़ों चींटे गुथे पड़े हैं। उन पर पानी की दस बूँदें छिड़क दी जाएँ, तब देखिये की वे कितनी तेज़ी से कितनी असंभव दिशाओं में बिखरते हैं। सिनेमा ख़त्म हो चुका है; दर्शकों को इसी तरह सड़क पर बिखरते देखकर मुझे चींटों की। …

बम्बई के सिनेमा वाले संगीत का सलाद तैयार करने में परम निपुण हैं। सड़े टमाटर, कड़ुवे खीरे, काठ जैसे नीरस नींबू, बरगद की जड़ जैसी कड़ी मूली और गाजर के अखाद्य टुकड़ों को वे तश्तरी में इतनी खूबसूरती से सजाते हैं की उसे दूर से ही देखकर भूक दुगनी है। संगीत के अनेक सड़े-गले तत्त्वों को इसी तरह ऑर्केस्ट्रा में सजाकर वे भुक्खड़ों के सामे प्रस्तुत करते हैं। संयोग की बात कि इस तश्तरी में उबले अंडे की जो फाँक मुझे मिली, उसमें धोखा नहीं है…

रोगों की हैसियत एक ज़ालिम मर्द जैसी है जिसकी मार खाकर भी पिटी हुई पत्नी उसके न रहने पर बड़े लगाव से उसकी याद करती है। …

वे लोग गली में मुड़ गए। उसमें आगे बढ़ना और भी मुश्किल था। सर्दी पड़ने पड़ने लगी थी पर लोगों के चबूतरों से सटाकर सँकरी चारपाइयाँ रास्ते में डाल राखी थीं जिन पर बच्चे शोर कर रहे थे और कुछ बूढ़े-बूढ़ीयाँ ओढ़े-बेढ़े पड़ी थीं। कहीं-कहीं संडासों के किवाड़े टूटे या खुले पड़े थे जिनके पीछे बदबू की अँधेरी गुफाएँ थीं। कहीं चटकते कोयले की धूआँती अँगीठियाँ सुलगने के लिए रास्ते में रख दी गयी थीं। एक गाए भटककर यहाँ आ गयी थी जिसके कारण गली भी और संकरी, और भी टेढ़ी-मेढ़ी हो गयी थी।...

खुली खिड़की के पार तारा-तरह की आवाज़ें थीं - सूअरों की, गायों की, मुर्गियों की, खिड़की के नीचे किसी बुढ़िया के रह-रहकर कराहने की, कुत्तों की लगातार भोंकने की, निरंतर चलने वाली गाली-गलौज की जिसमें चार-छह आदमी शामिल जान पड़ते थे।
नायक की रूप रेखा का वर्णन
यह पैंतालीस साल के आदमी का चुचका हुआ चेहरा था, जो पुत्री-पुत्र कलत्र, भाग्य-भावना-भगवन तथा कला-कामिनी-कादम्ब के झमेले में कभी अपने को रविशंकर की, कभी डॉन हुआन की और कभी रामकृष्ण परमहं��� की कोटि में पाता है।
अति-रोचक कृति
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