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239 pages, Paperback
First published January 1, 1976
इस नगर के सड़कें जितनी गन्दी हैं, नगर निगम का दफ्तर उतना ही शानदार है।आगे देखिये
दस बजे तक यह सड़क ट्रक-मोटर-बस-ताँगा-रिक्शा-साइकिल-ठेला-पैदल आदि से खचखच भर जाती है और इतनी लम्बी-चौड़ी होते हुए भी गलिओं से बदतर हो जाती है। सड़क पर पड़े हुए कूड़े के ढेर और पशुओं के सचल दल प्रत्येक यात्री की गति को दुर्गति में बदल देते हैं। गई-भैंसों के खुर के नीचे दूधों नहाती-पूतों फलती, गोबर से सनी, मूट से गीली, कूड़े-भरी और कबाड़ से घिरी इस सड़क को छोड़कर। ...नायक की रूप रेखा का वर्णन
मिठाई के एक घिनौने टुकड़े पर सैकड़ों चींटे गुथे पड़े हैं। उन पर पानी की दस बूँदें छिड़क दी जाएँ, तब देखिये की वे कितनी तेज़ी से कितनी असंभव दिशाओं में बिखरते हैं। सिनेमा ख़त्म हो चुका है; दर्शकों को इसी तरह सड़क पर बिखरते देखकर मुझे चींटों की। …
बम्बई के सिनेमा वाले संगीत का सलाद तैयार करने में परम निपुण हैं। सड़े टमाटर, कड़ुवे खीरे, काठ जैसे नीरस नींबू, बरगद की जड़ जैसी कड़ी मूली और गाजर के अखाद्य टुकड़ों को वे तश्तरी में इतनी खूबसूरती से सजाते हैं की उसे दूर से ही देखकर भूक दुगनी है। संगीत के अनेक सड़े-गले तत्त्वों को इसी तरह ऑर्केस्ट्रा में सजाकर वे भुक्खड़ों के सामे प्रस्तुत करते हैं। संयोग की बात कि इस तश्तरी में उबले अंडे की जो फाँक मुझे मिली, उसमें धोखा नहीं है…
रोगों की हैसियत एक ज़ालिम मर्द जैसी है जिसकी मार खाकर भी पिटी हुई पत्नी उसके न रहने पर बड़े लगाव से उसकी याद करती है। …
वे लोग गली में मुड़ गए। उसमें आगे बढ़ना और भी मुश्किल था। सर्दी पड़ने पड़ने लगी थी पर लोगों के चबूतरों से सटाकर सँकरी चारपाइयाँ रास्ते में डाल राखी थीं जिन पर बच्चे शोर कर रहे थे और कुछ बूढ़े-बूढ़ीयाँ ओढ़े-बेढ़े पड़ी थीं। कहीं-कहीं संडासों के किवाड़े टूटे या खुले पड़े थे जिनके पीछे बदबू की अँधेरी गुफाएँ थीं। कहीं चटकते कोयले की धूआँती अँगीठियाँ सुलगने के लिए रास्ते में रख दी गयी थीं। एक गाए भटककर यहाँ आ गयी थी जिसके कारण गली भी और संकरी, और भी टेढ़ी-मेढ़ी हो गयी थी।...
खुली खिड़की के पार तारा-तरह की आवाज़ें थीं - सूअरों की, गायों की, मुर्गियों की, खिड़की के नीचे किसी बुढ़िया के रह-रहकर कराहने की, कुत्तों की लगातार भोंकने की, निरंतर चलने वाली गाली-गलौज की जिसमें चार-छह आदमी शामिल जान पड़ते थे।
यह पैंतालीस साल के आदमी का चुचका हुआ चेहरा था, जो पुत्री-पुत्र कलत्र, भाग्य-भावना-भगवन तथा कला-कामिनी-कादम्ब के झमेले में कभी अपने को रविशंकर की, कभी डॉन हुआन की और कभी रामकृष्ण परमहं��� की कोटि में पाता है।अति-रोचक कृति