डब्बूवाली (बंगाल),बाल्टीवाली (कानपुर), टीनावली (बिहार), कमाईका काम करने वाली (लखनऊ समेत उत्तर भारत),टोकरीवाली (हरियाणा पंजाब) थोट्टिकार (दक्षिण भारत)पकी,पीती (उड़ीसा) वातल (जम्मू कश्मीर) इस तरह से कई नाम है मैला उठाने वाली औरतों की । पूरे देश में आज भी शुष्क शौचालय इतने ज़्यादा है और उनकी सफ़ाई करने के लिए औरतें ज़्यादा तर कार्यरत रहती है। इस किताब में 2011 तक की सामाजिक नज़रिए को लेखक ने रखा है।
इस किताब को ख़त्म करने के बाद मैंने जब गूगल किया तो मुझे ये मिला “सरकारी आंकड़े बताते हैं कि देश में मैला ढोने का अमानवीय पेशा अभी भी मौजूद है और देश में 11000 से अधिक ऐसे मैला ढोने वाले हैं। इनमें से 86% अकेले उत्तर प्रदेश में हैं। 11 राज्य ऐसे हैं जहां आज भी मैला ढोने वाले मौजूद हैं। संसद द्वारा मैला ढोने पर प्रतिबंध लगाने के लिए कानून बनाने के बावजूद, यह जारी है और पुनर्वास के लिए आवंटित धन शायद ही खर्च किया जाता है।”
1993 में केंद्र सरकार द्वारा हाथों से मैला उठाने के उन्मूलन और उनके पुनर्वास के लिए लॉ बनाई ,लेकिन आज तक कई राज्य सरकारें उस पर अमल नहीं कर पायी। कई जगह राजनेता ने इसे ज़रूरी नहीं समझा तो कई जगह मैला उठाने वालों की संख्या कम होने की वजह से इनकी बातें नहीं सुनी गई । लेकिन ये सच है मैला उठाने जैसा काम करना और उसकी वजह से अपनी ज़िंदगी के साथ साथ अपने परिवार की ज़िंदगी को भी छोटा करते है ये लोग। जिसके लिए राजनेता, समाज और न्यायालय भी ज़िम्मेदार है,पत्रकारों की तो बात ही नहीं कर सकते कि उनकी भी कोई ज़िम्मेदारी हो सकती है समाज के इन निचले तपके के लोगों के लिए।
कई राज्यों में और वहाँ काम करने वाले औरतों की ज़िंदगी में रोशनी डालती हुई ये किताब आपको अलग दुनिया में ले जाती है। समाज के ऐसे गलियारे में चहलक़दमी करने का मौक़ा मिलेगा जिसके बारे में अपने कभी सोचा नहीं होगा। पढ़ के अजीब लगता है कि मैला उठाने वालों की जब शादी होती है तो इस बात पर ज़ोर दिया जाता है कि लड़के के पास कितने शौचालय है महीने में सफ़ाई के लिए या फिर लड़की अगर बहु बनेगी तो उसे भी मैला उठाना होगा। वैसे तो ज़्यादा तर औरतें ही है इस काम में है जिसकी वजह से इतनी बीमारियों का सामना करना पड़ता है उन्हें कि आने वाली जनरेशन भी मानसिक या शारीरिक रूप से कमज़ोर ही पैदा होती है।
पढ़िए जिस समाज में औरतों को देवी माना जाता है उस समाज में औरतों के साथ और कैसा- कैसा व्यवहार किया जाता है। ये भी अजीब है मैला उठाने वाली औरतों को अपना नाम सुनने तक की आदत नही होती है सोचिए आन्ध्रप्रदेश की ‘ नारायण अम्मा’ 50 साल के उम्र में अपना नाम सुनना शुरू करती है ।
One of the most hard hitting books. Those who say "Caste system in India is obsolete now", should read it. It clearly depicts the reality of the manual scavengers and while narrating the ground reality, it exposes the casteist psychology of Indians - early and modern day too.