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पारती: परिकथा
Phanishwar Nath Renu, a true son of the soil, has created in Parti Parikatha, rendered here in English as Tale of a Wasteland- a major modern classic through the original genius he brought to bear upon his theme. Every reader of this epic in prose will feel real life throbbing and pulsating through each page of this book. On its broad canvas, the life of two generations has been inimitably presented by Renu with his exquisite art which creates unforgettable characters through episodes and dialogues in an idiom that shows his power over words.
378 pages, Paperback
First published January 1, 1957
About the author
फणीश्वर नाथ रेणु
29 books79 followersPhanishwar Nath 'Renu' (4 March 1921 – 11 April 1977) was one of the most successful and influential writers of modern Hindi literature in the post-Premchand era. He is the author of Maila Anchal, which after Premchand's Godaan, is regarded as the most significant Hindi novel.
हिन्दी कथा-साहित्य को सांगीतिक भाषा से समृद्ध करनेवाले फणीश्वरनाथ रेणु का जन्म बिहार के पूर्णिया जिले के औराही हिंगना गाँव में 4 मार्च, 1921 को हुआ। लेखन और जीवन, दोनों में दमन और शोषण के विरुद्ध आजीवन संघर्ष के प्रतिबद्ध रेणु ने राजनीति में भी सक्रिय हिस्सेदारी की। 1942 के भारतीय स्वाधीनता-संग्राम में एक प्रमुख सेनानी की हैसियत से शामिल रहे। 1950 में नेपाली जनता को राणाशाही के दमन और अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए वहाँ की सशस्त्र क्रान्ति और राजनीति में सक्रिय योगदान। 1952-53 में दीर्घकालीन रोगग्रस्तता के बाद राजनीति की अपेक्षा साहित्य-सृजन की ओर अधिकाधिक झुकाव। 1954 में बहुचर्चित उपन्यास मैला आँचल का प्रकाशन। कथा-साहित्य के अतिरिक्त संस्मरण, रेखाचित्र और रिपोर्ताज़ आदि विधाओं में भी लिखा। व्यक्ति और कृतिकार, दोनों ही रूपों में अप्रतिम। जीवन की सांध्य वेला में राजनीतिक आन्दोलन से पुनः गहरा जुड़ाव। जे.पी. के साथ पुलिस दमन के शिकार हुए और जेल गए। सत्ता के दमनचक्र के विरोध में पद्मश्री लौटा दी।
मैला आँचल के अतिरिक्त आपके प्रमुख उपन्यास हैं: परती परिकथा और दीर्घतपा; ठुमरी, अगिनखोर, आदिम रात्रि की महक, एक श्रावणी दोपहरी की धूप तथा सम्पूर्ण कहानियाँ में कहानियाँ संकलित हैं। संस्मरणात्मक पुस्तकें हैं: ऋणजल धनजल, वन तुलसी की गन्ध, श्रुत-अश्रुत पूर्व। नेपाली क्रान्ति-कथा चर्चित रिपोर्ताज है।,
भारत यायावर द्वारा सम्पादित रेणु रचनावली में फणीश्वरनाथ रेणु का सम्पूर्ण रचना-कर्म पाँच खंडों में प्रस्तुत किया गया है।
11 अप्रैल, 1977 को देहावसान।
हिन्दी कथा-साहित्य को सांगीतिक भाषा से समृद्ध करनेवाले फणीश्वरनाथ रेणु का जन्म बिहार के पूर्णिया जिले के औराही हिंगना गाँव में 4 मार्च, 1921 को हुआ। लेखन और जीवन, दोनों में दमन और शोषण के विरुद्ध आजीवन संघर्ष के प्रतिबद्ध रेणु ने राजनीति में भी सक्रिय हिस्सेदारी की। 1942 के भारतीय स्वाधीनता-संग्राम में एक प्रमुख सेनानी की हैसियत से शामिल रहे। 1950 में नेपाली जनता को राणाशाही के दमन और अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए वहाँ की सशस्त्र क्रान्ति और राजनीति में सक्रिय योगदान। 1952-53 में दीर्घकालीन रोगग्रस्तता के बाद राजनीति की अपेक्षा साहित्य-सृजन की ओर अधिकाधिक झुकाव। 1954 में बहुचर्चित उपन्यास मैला आँचल का प्रकाशन। कथा-साहित्य के अतिरिक्त संस्मरण, रेखाचित्र और रिपोर्ताज़ आदि विधाओं में भी लिखा। व्यक्ति और कृतिकार, दोनों ही रूपों में अप्रतिम। जीवन की सांध्य वेला में राजनीतिक आन्दोलन से पुनः गहरा जुड़ाव। जे.पी. के साथ पुलिस दमन के शिकार हुए और जेल गए। सत्ता के दमनचक्र के विरोध में पद्मश्री लौटा दी।
मैला आँचल के अतिरिक्त आपके प्रमुख उपन्यास हैं: परती परिकथा और दीर्घतपा; ठुमरी, अगिनखोर, आदिम रात्रि की महक, एक श्रावणी दोपहरी की धूप तथा सम्पूर्ण कहानियाँ में कहानियाँ संकलित हैं। संस्मरणात्मक पुस्तकें हैं: ऋणजल धनजल, वन तुलसी की गन्ध, श्रुत-अश्रुत पूर्व। नेपाली क्रान्ति-कथा चर्चित रिपोर्ताज है।,
भारत यायावर द्वारा सम्पादित रेणु रचनावली में फणीश्वरनाथ रेणु का सम्पूर्ण रचना-कर्म पाँच खंडों में प्रस्तुत किया गया है।
11 अप्रैल, 1977 को देहावसान।
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Community Reviews
Displaying 1 - 5 of 5 reviews
July 4, 2016
अदभूत। ये उपन्यास सचमुच में लेखक महोदय के द्वारा दी गयी अतुल्य भेंट है । जिस प्रकार से इस कहानी में ग्रामीण जीवन का वृतांत किया हुआ है, पाठकगण पढ़ते वक़्त ख़ुद को उनके बीच में पायेंगे। ऐसा सजीव अवलोकन और कहानी का सार सचमुच में इस कृति को अमूल्य अविस्मरणीय बना देता है। सामाजिक धार्मिक आर्थिक मानसिक एवं अन्य सभी प्रकार की सोच को जिस तरह से एक ही धागे में पिरोया गया है वो इस कहानी को पढ़ने के लिया बाध्य करता है। इस उपन्यास के माध्यम से आज के समाज में फैले सभी प्रकार के कुवयस्थाओं पर लेखक महोदय ने एक करारी चोट भी की है और सुधरात्मक व्यवस्था की स्थापना की भी अमूल्य कल्पना की है । सचमुच में अदभूत है ये उपन्यास ।
December 7, 2024
"अद्भुत! अप्रतिम! अतुलनीय!"
October 5, 2019
Renu is legend.
October 20, 2023
A classic of Hindi literature – it begins and ends on an allegorical note of a dove trying to awaken its son जित्तू. The lyrical dehati prose garnished with subtle Maithili graphics evokes a microcosm of Indian village life.
There are some unforgettable characters – the ever-scheming and venal लुत्तो, the opportunist, conniving and corrupt lanky गरुड़ध्वज झा, the gossipy साम्बत्ति पीसी, the learned botanist Dr Roychowdhury, the educated rustic beauty मलारी whose rebellious and aspirational activities tear apart the village, the silent love-lorn ताजमनी, the besotted Mrs Rosewood aka गीता मिश्रा from an earlier generation, the lecherous railway official Barker with his repellent halitosis and, of course, the memorable and eccentric भिम्मन मामा with his sassy malapropisms, neologisms and repartee bring in doses of irreverent humour to the breathless narrative.
The book lovingly portrays the personal, cultural, socio-economic lives of the villagers, along with their political aspirations, their petty jealousies and rivalries. The author conveys accurately the village lore and myths, casteism, issues of land-possession and -redistribution; landlords and their interactions with farmers, tenants, ryots – and the use of bullies and mercenaries to carry out their nefarious designs.![]()
There are some unforgettable characters – the ever-scheming and venal लुत्तो, the opportunist, conniving and corrupt lanky गरुड़ध्वज झा, the gossipy साम्बत्ति पीसी, the learned botanist Dr Roychowdhury, the educated rustic beauty मलारी whose rebellious and aspirational activities tear apart the village, the silent love-lorn ताजमनी, the besotted Mrs Rosewood aka गीता मिश्रा from an earlier generation, the lecherous railway official Barker with his repellent halitosis and, of course, the memorable and eccentric भिम्मन मामा with his sassy malapropisms, neologisms and repartee bring in doses of irreverent humour to the breathless narrative.
बुद्धि भ्रष्ट होने से आदमी सबकुछ कर सकता है। - जित्तन बाबू इज़ सफ्रिंग फ्रॉम सेक्सोलॉजीआ। मलेरा, फ़ाइलेरिया, डायरिया, पायरिया आदि रोगों से भी मारात्मक रोग है यह सेक्सोलौजिआ।This is how he gets his name
दुखांत नहीं दुखदाएंड। सुखान्त नहीं, सुखदायक। टेलीग्राम शब्द से बहुत चिढ़ते हैं - " नो-नो, इतना बड़ा नाम नहीं चेलगा। इसके लिए उपयुक्त है - ट्रा। टक्वा ट्रा, ट्रा-ट्रा !
मामा हर पोर्टेबल मशीन के लिए ढकनकल शब्द दे रहे हैं और टेप-रिकॉर्डर के लिए धुनफीताबंद!
सही नाम - विजयमल्लसिंह। सिंह को मामा ने सन उन्नीस सौ बीस में कतरकर फेंक दिया। तब लिखने लगे - व्ही. मल्ल .,म.म.। चूँकि भिम्मलकृत भानुमति पेटिका के एक भी प्रश्न के उत्तर नहीं दे सका कोई, एक साल तक प्रतीक्षा करने के बाद भिम्मल मामा ने अपने नाम के साथ महामहोपाध्याय जोड़ना शुरू कर दिया। संक्षेप में म.म.! व्ही. मल्ल .,म.म.। कालांतर में भिम्मल मां। वे किसी के मामा नहीं, कोई उनका भांजा नहीं।At the police station he has a prompt rejoinder
थाना के दारोगा साहब अंग्रज़ी में बोले - "प्लीज! टर्न हिम आउट जित्तन बाबू !"Here, in a moment of existential angst he has a question
"दारोगा साहब, में टर्नेबल नहीं।"
"हू मेड कोकोनट ! जहाँ पवन का गमन नहीं, रवि-शशि उगे न भानु - जो फल ब्रह्मा रचे नहीं सो अबला माँगत दान। व्हाट्स देट फ्रूट ? जायफल, काफल, श्रीफल, कटहल, कटहल-बड़हल, कटहल-बड़हल! हेक्सागन प्लस पेंटागन !"This example is of casteism overcoming benefits provided by Govt
डिस्टिरक्ट बोर्ड ने प्रस्ताव पास कर परानपुर अस्पताल को बंद करा दिया है। भूमिहार डॉक्टर को राजपूतों ने मिलकर धमकी दी। कायस्थ डॉक्टर के खिलाफ दरखास्त दे गई है - पैसा लेकर भी दूसरी जातिवालों को बढ़िया दवा नहीं देता, और कायस्थों को मुफ्त में दवा और सुई देकर इलाज करता है।These are some more extract from this wonderful book
गाओं की दाल बंदी के ऊपर चढ़े करेले की भुजिया कमिटी के कढ़ाई में भूंजी जाती है न।Finally, meet the endearing Cocker Spaniel named मीत,
लुत्तो भी आजकल फर्स्ट बुक पढ़ता है, अर्जुनलाल के यहां जाकर -अ फैट कैट सैट ऑन दैट मैट। एक मोटी बिल्ली बैठी है उस चटाई पर।
लीला के मामू लीला को एक अंग्रज़ी बालबर की दुकान में ले गए। वहां सोडावाटर-लेमलेट से केश को धोया, बालबर ने।
"क्या, इसके पहले भी, किसी काल या युग में, आज की तरह अभाव-अभियोग और व्यर्थता के विलाप से सामाजिक वायुमंडल परिव्याप्त हुआ था?"
ताजमनी से पहले ही प्रफुल्ल मीत चुलबुलाता हुआ आया। ... निश्चय हे आज चाय के साथ पकोड़े आ रहे हैं। पकोड़े के लिए भी चोरी कर लेता है मीत, कभी-कभी।He has to face the ire of the villagers for his master’s perceived sins
पोसा कुत्ता सुवंशलाल को हल्का दिया! पूंछकट्टा गीदड़ कहीं का।I wonder why this book is not better known, its English translation is Tale of a Wasteland. I consider “Renu” to be superior to Premchand or any other Hindi writer…
July 30, 2022
बिहार के नेपाल से लगे इलाके के ग्रामीण जीवन पर आधारित सुंदर उपन्यास।
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