Surender Mohan Pathak, is an author of Hindi-language crime fiction with 314 books to his credit. His major characters are Crime reporter Sunil (unprecedented 123 Titles), Vimal (46 Titles) and Philosopher Detective Sudhir (23 titles). Apart from series, he has written 60+ Novels in thriller category.
मेरी पसंद की सारी चीजें उस लड़की में थी । लंबा कद । तनी हुई, सुडौल, भरपूर छातियां । पतली कमर । भारी नितंब । लम्बे, सुडौल, गोरे-चिट्टे हाथ-पांव । लम्बे, खुले काले बाल । “आओ चलें ।” - एकाएक वह बोली । “कहां ?” - मैं हड़बड़ाकर बोला । “कहीं भी । यहां से हिलो ।” मैं उसके साथ हो लिया । सड़क पार करके हम कनाट सर्कस के बरामदे में पहुंचे । उसने बड़ी बेबाकी से मेरी बांह में अपनी बांह पिरो दी और मुझसे सटकर चलने लगी । मुझे बड़ा आनंद आ रहा था । मैं मन ही मन उसके भारी ऊनी कपड़ों के नीचे छुपे उसके नंगे जिस्म की कल्पना कर रहा था और सोच रहा था कि ऐसे क्लायंट तो मुझे चाहिये थे । “किसी ने तुम्हारा पीछा तो नहीं किया था ?” - एकाएक उसने पूछा । “क्यों तुम्हें उम्मीद थी कि मेरा पीछा किया जाएगा ?” “नहीं । लेकिन मेरे लिये यह इन्तहाई जरूरी है कि किसी को मेरी और तुम्हारी इस मुलाकात की खबर न हो ।” “आई सी ।” मैं सोचने लगा कि मैं उसे उस काली सूरत के बारे बताऊं या नहीं जो मेरी फिराक में साउथ एवेन्यू पर कहीं भटक रही थी ।
“मुझे उम्मीद नहीं थी” - मैं बोला - “कि तुम मुझे यहां दिखाई दोगे ।” “मुझे भी” - वह बोला - यह शॉटगन मुझे दो ।” मैं केवल मुस्कुराया । “कोहली !” - वह बोला - “अगर अपनी खैरियत चाहते हो तो यह शाटगन मुझे दो ।” “तुम अपनी खैरियत की फिक्र करो बेटा । तुम्हारे जैसे पुलिसिये की औकात का और हकीकत का अब मुझे अच्छा अन्दाजा है ।” “क्या बक रहे हो ?” “तुम दरवाजे के ताले को चाबी लगाकर भीतर घुसे हो । रमेश मल्होत्रा की कोठी की चाबी का एक मामूली सब-इंस्पेक्टर के पास क्या काम ! तुम पुलिस के नौकर हो या रमेश मल्होत्रा के ?” “मैं यहां तफ्तीश के लिये आया हूं ।” “किस बात की तफतीश के लिए ?” “इस कोठी के मालिक और उसकी सहयोगिनी के कत्ल की तफतीश के लिए ।” “क्या ?” मैं बुरी तरह चौंका । “हो गए न होश फाख्ता । तुम्हारी जानकारी के लिए रमेश मल्होत्रा और मार्था जोन्स का कत्ल हो गया है । पुलिस ने उनकी लाशें बरामद की थीं तो उनके हाथ-पांव बंधे हुए थे और उनकी कनपटियों में गोली के सुराख दिखाई दे रहे थे ।” मैं सन्नाटे में आ गया । तब तक यादव आगे बढ़ आया था । एकाएक उसने मुझ पर छलांग लगा दी । मैंने शॉट गन को डंडे की तरह घुमाया । वह उसकी कनपटी से टकराई । वह फौरन कटे वृक्ष की तरह फर्श पर बिछे कालीन पर ढेर हो गया । मैंने शॉटगन उसके ऊपर फेंक दी और वहां से बाहर निकाल आया । एक बात की मुझे गारंटी थी । सब-इंस्पेक्टर यादव रमेश मल्होत्रा और मार्था जोन्स के कत्ल के बारे में सच बोलता हो सकता था लेकिन वहां वह केस की तफतीश के लिए नहीं आया था । तफतीश के लिए हतप्राण के घर पर वो अकेला नहीं आ सकता था ।
“मैंने उसकी आवाज सुनी थी । वह तो आवाज नहीं थी जो मैंने पहले टेलीफोन पर सुनी थी । मुझे लगा था कि वह जानबूझ कर आवाज बदल कर बोल रहा था ।” “कद और काठी में कैसा था वो ?” खूब लंबा चौड़ा । और उसके सिर के बाल भूरे थे ।” “वह चाहता क्या था ?” - मैंने फिर पूछा । “किसी पैकेट के बारे में पूछ रहा था । मैंने उसे कह दिया था की मैं किसी पैकेट के बारे में नहीं जानती थी । फिर उसने सारे फ्लैट की बड़ी बारीकी से तलाशी ली थी ।” “उसे मिला कुछ नहीं ?” “क्या मिलता ?” मैं खामोश रहा । “तुमने उस पैकेट से अभी तक पीछा छुड़ाया या नहीं ?” मैंने उत्तर नहीं दिया । “ठीक है । भाड़ में जाओ । मुझे क्या ?” “फिर शुरुआत कर रही हो ?” “मैं कोई शुरुआत नहीं कर रही । लेकिन मुझे तुम्हारी उस बेहूदी जिद का बड़ा अफसोस है जिसकी वजह से तुम्हारे लिये मेरे से ज्यादा महत्वपूर्ण वह पैकेट हो उठा है । कैसी अजीब बात है कि जो आदमी मुझे अपनी जीवन संगिनी बनाना चाहता है, वह अपनी कोई बात मेरे साथ शेयर नहीं करना चाहता । कभी-कभी तो मुझे शक होने लगता है कि तुम मुझसे मुहब्बत भी करते हो या नहीं ।” “ऐसा न कहो ऊषा” - मैं तनिक भर्राये स्वर में बोला - “मैं तुमसे मुहब्बत करता हूं लेकिन मुझे तुम्हारी एक बात से, सिर्फ एक बात से एतराज है ?'' “किस बात से ?” “मैं एक खुद मुख्तार, बालिग इन्सान हूं और मैं ऐसा बने रहना चाहता हूं, लेकिन तुम मुझे उंगली पकड़कर चलाना चाहती हो । तुम तो मुझे छींकना और खांसना तक सिखाना चाहती हो । मुझे एक बालिग आदमी को बीवी चाहिये, एक अपाहिज बच्चे को मां नहीं चाहिए ।” “सुधीर....” “ऊषा पैकेट का तुम हजार बार जिक्र कर चुकी हो, ऐसे जिक्र कर चुकी हो जैसे उसे तुम मुझसे हासिल कर लोगी तो मेरे खिलाफ कोई बहुत बड़ी जंग जीत लोगी । उस पैकेट के बारे में जब तुमने एक बार मुझे राय दी थी ते उतना ही काफी था, वही बात तुम बार-बार न दोहराती तो शायद वह पैकेट दरिया में फेंकने के लिये मैं दे देता । लेकिन तुमने क्योंकि अपनी जिद नहीं छोड़ी इसलिये मैं भी अपनी जिद पर कायम रहा । तुमने तो मुझे यहां तक कह दिया था कि अब तुम्हारा मेरा रिश्ता खतम ।” “वह तो गुस्से में मेरे मुंह से निकल गया था ।” - वह बोली । वह रोने लगी । मैंने उसे अपनी बांहों में ले लिया । मैंने बड़े प्यार से उसके आंसू पोछे और उसके होठ चूमे । वह कस कर मेरे साथ लिपट गई । मैंने उसे अपनी बांहों में उठा लिया और ड्राइंगरूम के एक कोने में लगे दीवान की ओर बढा । “मोनिका जाग जायेगी ।” - वह मेरे कान में बुदबुदाई । मैंने उसे दीवान पर लिटा दिया और धीरे से बैडरूम का दरवाजा बाहर से बन्द कर आया । मैं वापिस ऊषा के पास पहुंचा । ऊषा ने मुझे अपनी बांहों में ले लिया और लता की तरह मेरे साथ लिपट गई । मैं भी उसमें आत्मसात होने की कोशिश करने लगा । फिर पता नहीं कब उसके आगोश में ही मुझे नींद आ गई । सारी रात सोया जो नहीं था मैं ।
वह मुझे सच बोलती लगी । “खैर छोड़ो ।” - मैं बोला - “तुम पैकेट की बात करो । और यह भी बताओ की तुम्हारे जैसी शानदार लड़की कॉलगर्ल कैसे बन गई ?” उसके होठों पर एक विद्रूपपूर्ण मुस्कराहट आई - “मैं शानदार हूं इसलिए तो कॉलगर्ल हूं, मामूली होती तो कोठे की रंडी होती । मार्था की एक हजार रूपये रात वाली कॉलगर्ल बनने के लिए शानदार होना तो इन्तहाई जरूरी होता है ।” “यानि कि पैसे के लालच ने तुम्हे कॉलगर्ल बनाया ?” “यही समझ लो । सुधीर, मैं अपनी किसी विपत्ति की दास्तान सुनकर तुम्हारी हमदर्दी हासिल नहीं करना चाहती । मेरे कॉलगर्ल होने के पीछे किन्हीं भूखे मरते भाई बहनों की, किसी बीमार मां, किसी सूदखोर महाजन के कर्जे की या किसी ऐसी ही मजबूरी की कोई दुख भरी कहानी नहीं है । मैं जो कुछ हूं अपनी मर्जी से हूं । मुझे अच्छा खाने का अच्छा पहनने का और ऐश की जिन्दगी गुजारने का शौक था और मुझ जैसी गरीब लड़की के ऐसे शौक पतन के गर्त में गिरे बिना पूरे नहीं हो सकते थे । मैंने अपने अंजाम को पूरी तरह से सोच-समझकर इस धंधे में कदम रखा था । शादी करके किसी क्लर्क, चपरासी की रोटियां पकाने, बर्तन मांजने, कपड़े धोने और उसके बच्चे पैदा करने के इज्जतदार कामों के मुकाबले में कॉलगर्ल बनने के पतित काम को तरजीह दी थी । मुझे अपनी जिन्दगी से कोई शिकायत नहीं । मैंने सिर्फ इतना किया है की जो चीज अच्छे घरों की शरीफजदियां मुफ्त में बांटती हैं, उसकी मैंने उजरत हासिल करने की कोशिश की है ।”
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सुरेंद��र मोहन पाठक की आखिरी कोशिश मुझे कुछ हद तक हार्ड बोइल्ड डिटेक्टिव कहानी ही लगी... या यूँ कहे कि यह वास्तव मे एक हार्ड बोइल्ड जासूसी उपन्यास ही है, बस भारतीय तड़के के साथ मे।
मुझे निजी तौर पर हार्ड बोइल्ड पसंद नही पर फिर भी इस उपन्यास ने मेरा मनोरंजन किया। हाँ हार्ड बोइल्ड होने के कारण मुझे इसे पढ़ने मे ज्यादा समय लगा, लेकिन मेरा कही जी नही किया कि इसे बंद करके रख दूँ। यह एक बढ़िया पेज टर्नर है।
मैं इसे 3 स्टार देता... एक खास कारण से 1 स्टार काट रहा हूँ। मुझे शुरुआत मे ही अंदाज़ा हो गया था कि आखिर मुख्य मास्टरमाइंड कौन है और उस रहस्यमई पैकेट मे क्या हो सकता है? और हुआ भी यही, जिस कारण मुझे निराशा हुई।
कहानी के ट्विस्ट कोई नए नही है और 20 के दशक मे अमेरिका मे उनका काफी उपयोग हो चुका है, जिस कारण मैं उनसे अवगत था।
अंत मे यही कहूँगा कि यह किताब आपका मनोरंजन करेगी...
Started with Surrender Mohan Pathak's thriller.. an interesting read. Not bad for an Indian writer. Being a delhite, I liked references of Delhi places and monuments in this book