Surender Mohan Pathak, is an author of Hindi-language crime fiction with 314 books to his credit. His major characters are Crime reporter Sunil (unprecedented 123 Titles), Vimal (46 Titles) and Philosopher Detective Sudhir (23 titles). Apart from series, he has written 60+ Novels in thriller category.
A few days ago, the greatest ODI batsman Sachin Tendulkar took retirement from One Day Internationals.....and in near future, he'll be retiring from Test Cricket as well........Experts say that his reflexes have slowed down.......his willow has lost its shine. But for me, watching cricket without Sachin is like having Ice-cream without Ice.
However, I am thankful to the Almighty, that the shine of ink of Pathak sir's pen has not lost its sheen with time and age. If you think otherwise, I recommend you to read "Secret Agent" - his latest novel.
Secret Agent is the story of a Police Inspector whose has converted from a corrupt police officer into an honest person and is feeling guilt for his past wrongdoings. His fortune gives him an opportunity to make amends while working as an undercover agent for his Department, but it involves risk of his life. He takes the risk and grabs the opportunity. However, sooner than later, his identity was revealed on his adversaries and now he faces danger of losing his life.
Whether he would be able to avert the threat on his life? Whether he would be able to unmask the true perpetrators? "Secret Agent" not only answers these queries but also takes you to a wonderful journey where you are introduced to several characters, who seems to be so real.
Inspector Neelesh Gokhale, earlier appeared in "Gawaahi" is again our companion to this wonderful journey. While his was a multi-layered character in Gawaahi, in Secret Agent, he transforms into a true hero, who is determined to leave his dark past, at any cost. Shyamala Mokashi's character though seems to be confused, but when it comes to take concrete decision, shows clear intent to support what is right. She also guides his deviant father to chose the right path. Baburao Mokashi's character tells us that even a bad guy has some goodness left in him.
The thunderstorm in the climax of the novel reflects the storm the protagonist is going through in his life. And the conversation between the two main characters in the last few pages of the Novel gives you feeling of a roller-coaster ride of emotions.
In all, "Secret Agent" is an unforgettable creation with full of emotions, having immense repeat value.
"सुबह का भूला अगर शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते।"
यह उपरोक्त वाक्य, हम सभी के जीवन में बहुत मायने रखता है। हम सभी ने कभी न कभी इसको अपने से बड़ो या अपने दोस्तों के मुह से जरूर सुना होगा। कुछ ऐसा ही हुआ नीलेश गोखले के साथ, जब गृह मंत्रालय ने डीसीपी पाटिल के अनुमोदन पर कोनकोना द्वीप पर एक सीक्रेट एजेंट के रूप में भेजने का प्रस्ताव उसके सामने रखा।
गोखले ने बीते साल में अपने जीवन में कई उथल पुथल देखे थे। गोखले ने अपनी प्रतिष्ठित नौकरी खो दी थी । वह महाराष्ट्र पुलिस में एक पुलिस इंस्पेक्टर था महाराष्ट्र पुलिस में। लेकिन वो बड़े भाई लोगों से बिक हुआ था। वह एक भ्रष्ट पुलिसिया था जिसके कारण उसे अपनी नौकरी खोनी पड़ी। गोखले ने अपने छोटे भाई राजेश गोखले को खो दिया था। राजेश गोखले भी महाराष्ट्र पुलिस में सब इंस्पेक्टर था । लेकिन वह इमानदार था। और अपनी इमानदारी के कारण वह एक क़त्ल का गवाह बन बैठा था और मुंबई के भाई लोगों से पंगा ले लिए था। मुंबई के भाई लोगों ने उसका क़त्ल करवा दिया। जिनका हाथों निलेश गोखले बिका हुआ था उन्होंने ही उसके भाई का क़त्ल करवा दिया था। निलेश गोखले ने उनसे बदला लिया और सभी का नामोनिशान मिटा डाला। अपनी जिन्दगी में निलेश गोखले ने जितने पाप किये थे उन पापों की सजा उसके भाई को मिली। उसने अब सुधरने की सोची थी और इसी राह में उसने एक बार में बाउंसर की नौकरी पा ली थी। (इन सभी की विस्तृत जानकारी के लिए "गवाही" पढ़ें)
अब निलेश गोखले को गृह मंत्रालय से एक ऐसा प्रस्ताव आया था जिससे वह अपने पापों का प्रायश्चित कर सकता था। इसी विषय पर निलेश गोखले अपने कुलगुरु आचार्य के पास पहुंचा जो उसके स्वर्गीय पिता के दोस्त थे और अब भी गोखले परिवार के शुभचिंतक हैं । जब निलेश ने अपनी परेशानी आचार्य जी को बताया तो आचार्य जी ने उसका मार्गदर्शन किया और उसको इस शानदार प्रस्ताव को मान लेने को कहा।
दोस्तों जिस प्रकार से भगवान् कृष्ण ने मद भागवत गीता कहकर अर्जुन के अन्दर उठ रहे शंकाओं का निदान किया था और अर्जुन को कर्त्तव्य का पाठ पढाया था वैसा ही आचार्य जी ने निलेश का मार्गदर्शन किया। इस मर्मस्पर्शी और दिल को छू जाने वाले वार्तालाप को जब आप पढ़ते हैं तो आप के रोयें खड़े हो जाते हैं, आँखों से बरबस ही आंसू निकलने को तत्पर हो उठते हैं। इस वार्तालाप में जिंदगी से लड़ने और जूझने के ऊपर एक लम्बा सा कथन है आचार्य जी के द्वारा उसे जरूर पढ़े और अच्छी तरह से पढ़े, बहुत आनंद आएगा।
निलेश गृह मंत्रालय का प्रस्ताव मान लेता है और कोनकोना द्वीप पहुँच जाता है। कोनकोना द्वीप मुंबई से ८५ कि.मी. दूर स्थित एक मनोरम, दर्शनीय और पर्यटक स्थल है। यह द्वीप चारों ओर से समुद्र से घिरा हुआ है। इस द्वीप पर आने जाने के दो साधन हैं - एक स्टीमर द्वारा और दूसरा हेलेकोप्टर द्वारा। लेकिन इतने शांत और मनोरम स्थान पर अब अराजकता का राज था। कोनकोना द्वीप के तीन त्रिमूर्ति या तीन M 's - महाबोले, मोकासी और मेग्नारो ने इस द्वीप कि सुख शान्ति पर ग्रहण सा लगा दिया है। अनिल महाबोले, कोनकोना द्वीप के थाने का थानाध्यक्ष जो अपनी वर्दी और दारु के नशे में खुद को कोनकोना द्वीप का मालिक समझता था और कुछ भी कर गुजरने से उसे गुरेज नहीं था। बाबुराव मोकासी, कोनकोना द्वीप के निगम पार्षद जिसकी महाबोले के साथ हाथ और दस्ताने वाली दोस्ती थी। फ्रांसिस मेग्नारो, गोवा से आया एक गुंडा जिसने कोनकोना द्वीप पर गैरकानूनी जुए और वैश्यावृति का जाल फैला रखा था और इसे महाबोले और मोकासी दोनों का सरंक्षण प्राप्त था। अब कोनकोना द्वीप एक रावण कि लंका बना हुआ था, जहाँ से हमेशा जुर्म, ड्रग्स, अत्याचार, जुए, वैश्यावृति, सट्टा और कई प्रकार के दुर्गन्ध आ रही थी। और यह दुर्गन्ध जब गृह मंत्रालय के पास पहुंची तो उन्होंने त्वरित कार्रवाई करते हुए लेकिन गुप्त रूप से निलेश को कोनकोना द्वीप भेज था। निलेश को यह काम सौंपा गया था कि वह इन त्रिमुर्तियों के खिलाफ सभी प्रक्कर के सबूत इकठ्ठा करे और अपनी रिपोर्ट भेजे।
निलेश ने कोनकोना द्वीप पहुँच कर कोंसिका क्लब में एक बाउंसर कि नौकरी पा ली। कोंसिका क्लब कोनकोना द्वीप के होटल इम्पीरियल रीट्रीट के सामने एक साधारण सा क्लब था। इम्पीरियल रीट्रीट ही वह स्थान है जहाँ जुए का खुला खेल होता है। निलेश अपनी रिपोर्ट समय समय पर डी सी पी को भेजता रहता है। निलेश कि मुलाक़ात वहां रोमिला सांवत से होती है जो उसी बार में काम करती है और ग्राहकों का मनोरंजन करती है। रोमिला निलेश पर शक करती है कि वह और लोगों से अलग है और वह जैसा दिखाई देता है वैसा है नहीं। निलेश उसकी बात को नकार देता है। एक घटना के दौरान निलेश कि मुलाक़ात श्यामला मोकासी से होती है जो निगम पार्षद बाबुराव मोकासी कि बेटी है। उसी घटना के दौरान अनिल महाबोले, थानाध्यक्ष श्यामला को थाणे ले जाता है। कोंसिका क्लब का प्रबंधक गोपाल पुजारा निलेश को बताता है कि अनिल महाबोले श्यामला पर दिल रखता है। निलेश , अनिल महाबोले के सामने जाकर खड़ा हो जाता है और श्यामला को छोड़ने कि मांग करता है। महाबोले श्यामला को छोड़ देता है। महाबोले, निलेश कि पूरी पड़ताल करवाता है। निलेश श्यामला के सामने डेट का प्रस्ताव रखता है जिसे श्यामला मान लेती है। उसी रात कोंसिका क्लब का मालिक गोपाल पुजारा उसे नौकरी से निकालने का नोटिस दे देता है। महाबोले को निलेश के श्यामला का घुलना मिलना पसंद नहीं आता। महाबोले निलेश पर हमला करवाता है। जब निलेश थाने इस हमले कि रिपोर्ट करने पहुँचता है तो वह पहली बार मोकासी से मिलता है। वहां हुई एक लम्बी बहस के बाद निलेश श्यामला से मिलने पहुँचता है। इस मुलाक़ात के अंत में श्यामला और निलेश एक दुसरे को प्यार का इज़हार करते हैं। निलेश अपने घर पहुँचता है। घर पहुँचते ही उसे एक टेलीफोन कॉल आता है। वह टेलीफोन काल रोमिला द्वारा किया गया ���ा जो कहती है कि उसे कुछ रूपये कि जरूरत है और वह इस द्वीप से जल्दी से जल्दी निकलना चाहती है। वो निलेश को बताती है कि वह उसे सैलर्स बार में मिले। निलेश सैलर्स बार पहुँचता है पर वहां उसे रोमिला नहीं मिलती। वह पुरे शहर में चक्कर लगता है पर रोमिला उसे नहीं मिलती। उसे रोमिला से कई ऐसी जानकारियां मिलने कि उम्मीद थी जिससे वह त्रीमुर्तियों के नीवें हिल सकता था। निलेश कोनकोना द्वीप पर मौजूद तटरक्षक सेन�� के बंकर में पहुँचता है, जहाँ से वह डी. सी. पी. नितिन पाटिल से बात करता है। नितिन पाटिल उसे वही रुकने को कहता है। सुबह पांच बजे निलेश, नितिन पाटिल के रूबरू होता है और अपनी पूरी रिपोर्ट देता है। डी. सी. पी नितिन पाटिल और जॉइंट कमिश्नर उसे इस अभियान से निकल जाने को कहते हैं। इसके पीछे इस कारण को तरजीह दी जाती है कि उसे नौकरी से निकाल दिया गया है। लेकिन जब निलेश उन्हें रोमिला के गायब होने कि बात और उससे मिलने वाली जानकारी के बारे में बताता है। तभी उन्हें खबर मिलती है कि रोमिला सावंत कि लाश एक हाईवे के किनारे पाई गयी है।
दोस्तों अब हमारे मन में निम्न प्रश्न उठते हैं जिनके जवाब जानने के लिए हमें श्री सुरेन्द्र मोहन पाठक जी का नवीनतम उपन्यास "सीक्रेट एजेंट" पढना जरूरी हो जाएगा:-
१) क्या निलेश गोखले अपने मकसद में कामयाब हो पायेगा? २) क्या निलेश गोखले त्रीमुर्तियों से मुकाबला कर पायेगा? ३) क्या निलेश गोखले कोनकोना द्वीप पर चल रहे गुंडाराज, रावणराज का खात्मा कर पायेगा? ४) क्या रोमिला सावंत किसी दुर्घटना कि शिकार हुई या उसकी हत्या हुई? ५) क्या निलेश रोमिला सावंत के हत्यारों के पता लगा पायेगा? ६) क्या निलेश गोखले और श्यामला के बीच पनपा प्यार परवान चढ़ पायेगा? ७) जब श्यामला को निलेश गोखले कि असलियत पता चलेगी तो उसका निलेश के लिए कैसा वर्ताव होगा?
और भी कई प्रश्न हैं....लेकिन मुख्य रूप से यही प्रश्न मेरे सामने आते हैं।
अब मैं अगर इस उपन्यास कि कहानी के बारे में बात करूँ तो यह कहानी जिस रफ़्तार से शुरू होती है उसी रफ़्तार से ख़तम भी होती है। कहीं भी कहानी रफ़्तार में कमी नहीं आती। पाठक सर ने बहुत मजबूती से कहानी का खाका खींचा और अंतिम तक इसे मजबूती से बाँध कर रखा है। कहानी में कई ऐसे क्षण आते हैं जब पढ़ते पढ़ते आँखे भीग जाती है। कहानी को पूर्ण रूप से निलेश गोखले के इर्द-गिर्द गढ़ा गया है। कहानी को एक अलग ही अंदाज में पेश किया गया है। इस कहानी में एक शहर में हो रहे संगठित अपराध को पूर्ण रूप से देख सकते हैं और किस प्रकार से निलेश गोखले इस संगठित अपराध कि कलई खोल के रख देता है। कहानी जहाँ एक संगठित अपराध के प्रति छेड़ी गयी गुप्त रूप से अभियान से शुरू होती हैं, वहीँ यह एक प्रेम और मोहब्बत के किनारे पर भी जा लगती है, फिर कहानी एक तीखा मोड़ लेते हुए एक क़त्ल के रहस्य कि और बढती है और आगे ख़तम होती है रावण राज के खात्मे पर। जिन चौबीस घंटों में यह उपन्यास अपने उच्चतम जलाल पर होता है उन्ही चौबीस घंटों में उपन्यास में दिखाया गया, मौसम का रूप भी जलाल पर होता है। जैसे जैसे उपन्यास कि कहानी कि रफ़्तार बढती जाती है वैसे वैसे मौसम के कहर कि मार भी बढती जाती है। और कहानी और मौसम कि मार का अंत लगभग एक समय ही होता है। कहानी में तीन M 's को मुख्य विलेन करार दिया गया है। लेकिन पुरे कहानी में सिर्फ और सिर्फ अनिल महाबोले का किरदार ही है जो विलेन के रूप में दिखाई देता है। अनिल महाबोले का चरित्र चित्रण, एक ऐसे भ्रष्ट और शक्तिशाली पुलिसवाले के रूप में कि गयी है जो अगर पुलिस कि नौकरी भी छोड़ दे तो वहां का निजाम संभाल सकता था। अनिल महाबोले का किरदार बाकी दोनों विलेन मोकासी और मेग्नारो पर भारी पड़ता दीखता है। और दुसरे किरदारों कि सीमाए बंधी बंधी सी नजर आती है जो उपन्यास के लिए सही भी है।
अब इस उपन्यास का सबसे सुन्दर पहलु पर आऊं तो वह है इस उपन्यास में कई स्थानों पर कि गई वार्तालापों में दार्शनिक पहलु का प्रयोग करना। मैं ऊपर आचार्य और निलेश गोखले के बीच के वार्तालाप का तो जिक्र कर ही चूका हूँ जो कि सबसे शानदार हैं।
दोस्तों जब इस नोवेल को मैंने एक बार पढ़ा तो मैंने अपने मित्र से यह बात कह डाली की इसमें "सीक्रेट एजेंट" जैसी कोई बात ही नहीं थी। लेकिन जब मैंने इसे दुबारा और तिबारा पढ़ा तो मुझे लगा की बिलकुल यह एक "सीक्रेट एजेंट" जैसी ही बात है।
मैं अत्यधिक विवेचना नहीं करना चाहूँगा और आरम्भ से अंत तक पहुँच गया हूँ लेकिन एक बात तो जरूर कहूँगा...
"एक बार पढने से इस उपन्यास का अर्थ नहीं निकलेगा, कम से कम दो बार तो जरूर पढ़ें"।
Being a sequel is not an easy thing. You have to compete the success of your predecessor and full fill the expectations.
This is where - Secret Agent - scores.
A thrilling fast paced temerarious, venturesome,hazardous and headstrong 'secret agent' Neelesh Ghokhle jumps into a malignant, menacing, mortal, and nasty island to counter the trio desperado.
The atmospheric conditions makes it hard to stand alone.