जयशंकर ने सत्तर लाख रूपये लूटने का एक मास्टर प्लान बनाया था । एक ऐसा प्लान जिसमें उसे कामयाबी की शत-प्रतिशत गारन्टी थी बस अगर कोई कमी थी तो एक पांचवे साथी की ।बम्बई से भागकर मद्रास पहुंचा विमल जब जयशंकर से टकराया तो जैसे जयशंकर की मन की मुराद पूरी हो गयी और विमल ने फिर ना चाहते हुए भी खुद को एक जुर्म में शरीक पाया ।
Surender Mohan Pathak, is an author of Hindi-language crime fiction with 314 books to his credit. His major characters are Crime reporter Sunil (unprecedented 123 Titles), Vimal (46 Titles) and Philosopher Detective Sudhir (23 titles). Apart from series, he has written 60+ Novels in thriller category.
I'd decided to read all 44 books in this series and I'm actually going to. And I was reconfirmed right after reading this wonderful thriller. It's compulsive and gripping. An absolute page turner. I obviously recommend it.
“अन्ना स्टेडियम !” - अब्राहम के मुंह से निकला । “सोमवार रात को तो” - सदाशिवराव बोला - “वहां कोई बहुत बड़ा शो होने वाला है ।” “बाढ़ पीड़ितों की सहायतार्थ ।” - जयशंकर बोला - “उस शो में सारे संसार के कलाकर आमन्त्रित हैं । अमरीकी पॉप सिंगरों और बम्बई के फिल्मी सितारों की वहां खासतौर से भरमार होगी । रॉक म्यूजिक का ऐसा लाइव प्रोग्राम होना बताते हैं जैसा कि कम से कम हिन्दोस्तान में पहले कभी नहीं हुआ होगा । इसी वजह से उस शो की टिकट सौ रुपये है ।” जयशंकर एक क्षण ठिठका और फिर बोला - “वहां कोई पहला, दूसरा और तीसरा दर्जा नहीं । हर सीट एक ही दर्जे की होगी और उसकी कीमत सौ रुपये होगी । उस शो की बड़ी खूबी यह है कि टिकटों की कोई एडवांस बुकिंग नहीं होगी । सामेवार दोपहर को बुकिंग खुलेगी, टिकटें बिकनी शुरू होंगी, जब सत्तर हजार टिकटें बिक जायेंगी तो बुकिंग बन्द हो जायेगी जब बुकिंग बंद होगी तो स्टेडियम के भीतर टिकटों की बिक्री से हासिल हुआ सत्तर लाख रुपया मौजूद होगा ।” “और वह रुपया हमको लूटना है ?” - सदाशिवराव अविश्वासपूर्ण स्वर में बोला । “हां ।” - जयशंकर बोला । “नामुमकिन !” “साथियो ।” - जयशंकर बोला - “इन्सान में अक्ल होनी चाहिए और कुछ कर डालने की हिम्मत होनी चाहिए फिर इस संसार में कुछ भी नामुमकिन नहीं । मैंने बड़ी मेहनत से स्टेडियम की गेट मनी लूटने की स्कीम तैयार की है । अगर आप लोग मुझ पर भरोसा करें और जैसा मैं कहूं, बेहिचक वैसा करें तो मैं असम्भव को सम्भव करके दिखा सकता हूं लेकिन अगर आपको मुझ पर भरोसा नहीं और आप में भरपूर हौसला नहीं तो फिर स्टेडियम को लूटने की कोशिश करना बेकार है ।” “हमें तुम पर पूरा भरोसा है ।” - सदाशिवराव एक बार अपने दायें देखता हुआ बोला - “लेकिन मुझे तो यह हो सकने वाला काम नहीं दिखाई देता । उस शो में स्टेट का चीफ मिनिस्टर मौजूद होगा । स्वयं प्रधानमन्त्री के आगमन की भी बात सुनी जा रही है । राजनैतिक नेताओं की वहां मौजूदगी की वजह से तुम ही सोचो कि वहां सिक्योरिटी का कितना तगड़ा प्रबन्ध होगा ! चप्पे-चप्पे पर सशस्त्र कमांडो गार्ड्स बिछे होंगे । फिर रुपया भी भीतर कहीं लावारिस तो पड़ा नहीं होगा । वह गिना जा रहा होगा, सम्भाला जा रहा होगा और कई आदमी इस काम में मशगूल होंगे । ऐसा कैश भला कैसे लुट जाएगा !” “बड़े आराम से लुट जाएगा । तुम चार जने भीतर जाओगे और कैश निकाल लाओगे ।”
“मिस्टर विमल” - जयशंकर गिड़गिड़ाता हुआ बोला - “भगवान के लिये मेरे साथ ऐसी ज्यादती मत करो । मैं तो तुम्हारा साथी हूं ।” “तुम मेरे साथी नहीं हो ।” - विमल घृणापूर्ण स्वर में बोला - “तुम किसी के साथी नहीं हो । तुम किसी के साथी हो ही नहीं सकते । तुम सिर्फ पैसे के साथी हो । तुम इतने नीचे गिरे हुए और इतने लालची इन्सान हो कि तुम उन्हीं लोगों को धोखा देने से बाज नहीं आये जिन्होंने अपनी जान हथेली पर रख कर तुम्हारी स्कीम को कामयाबी बख्शी । अगर तुमने सारा माल खुद हड़पने का लालच ना किया होता तो आज शायद तुम्हारी यह हालत न होती । न मालूम हो तो सुन लो कि अब्राहम और वीरप्पा भी अपनी जान से हाथ धो चुके हैं । सदाशिवराव तुम्हारे सामने ही स्टेडियम में गार्ड की गोलियों का शिकार हो चुका था । तुम्हारा पुराना यार कुप्पूस्वामी भी मर चुका है ।”
Pehli Book se Jyada intresting, agr ap crime thriller book dhundh rhe ho to ye book se shuru kr skte hai, pehla book se kuch khas juda nahi hai lekin Vimal k past k baare me thoda bahut pata ho to reading experience thoda smooth rahega. Main 2-3 character aur Vimal ka character development kafi achhi trh se hai baki side character thik thak hi hai. page turner book to ye hai, agr 40-50 page tk intrest bana rha to ek hi seat me khatm kr deni ki ichha rahegi.
I think Surrender Mohan Pathak was (is) influenced by Richard Stark. If not, then most definitely the 13th book in the Parker series was his 'inspiration' behind Daulat aur Khoon. I like Vimal, the character. Unlike Parker he isn't a professional criminal. Situation made him a criminal. That's where the two characters differ and perhaps that's the reason why I may choose to read more of Vimal books in future.
सुब्रमनिम गार्ड की चालाकी, विरप्पा का गुस्सा, जयशंकर का धोखा तो बहुत पसंद आया. वैसे मुझे स्टेडियम चोरी की बारिकियां ढंग से समझ नहीं आयी लेकिन रोमांच जरूर महसूस किया. कुल मिलाकर कहूँ तो बेहतरीन थ्रीलर कहानी है, अब पढ़कर एहसास हो रहा है की विमल सीरीज इतनी पॉपुलर क्यों है🤟🏽🤟🏽🤟🏽