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Vimal #7
मौत का फरमान
भाग्य की कैसी विडम्बना थी कि छ: राज्यों द्वारा घोषित इश्तिहारी मुजरिम विमल एक ऐसे अपराध की एवज में पकड़ा गया जो उसने किया नहीं था । विमल के दर्जनों अपराधों में से हर अपराध उसे फांसी के फंदे पर पहुंचा सकता था, लेकिन उसकी हकीकत से बेखबर, इन्स्पेक्टर महिपाल सिंह उससे एक ऐसी हत्या का अपराध कुबुलवाना चाहता था जो उसने की नहीं थी ।
Mass Market Paperback
First published November 1, 1978
About the author
Surender Mohan Pathak
335 books398 followersSurender Mohan Pathak, is an author of Hindi-language crime fiction with 314 books to his credit. His major characters are Crime reporter Sunil (unprecedented 123 Titles), Vimal (46 Titles) and Philosopher Detective Sudhir (23 titles). Apart from series, he has written 60+ Novels in thriller category.
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Displaying 1 - 4 of 4 reviews
January 30, 2021
“बसन्त !” - तभी उसने मुझे बैडरूम से आवाज लगाई । “हां ।” - मैं बोला । “ड्रिंक्स यहां ले आओ ।” मैंने सिगरेट जमीन पर फेंककर जूते से मसल दिया । मैंने विस्की के दोनों गिलास उठाये और बैडरूम की तरफ बढा । बैडरूम के भीतर कदम रखते ही मैं थमक कर खड़ा हो गया । मेरी आंखें फट पड़ीं और मुंह खुला का खुला रह गया । वह सम्पूर्ण नग्नावस्था में पलंग पर चित पड़ी थी । उसके कपड़े एक ढेर की सूरत में तिरस्कृत से पलंग के पायताने फर्श पर पड़े थे । उसके पहाड़ की चोटियों जैसे उन्नत उरोज उसकी गर्म सांसों के साथ उठ-गिर रहे थे । उसकी बांहें आमन्त्रण के तौर पर मेरी तरफ फैली हुई थीं और उसका चेहरा लालसा से दहक रहा था । मुझे यूं लगा जैसे मुझे दिल का दौरा पड़ने वाला हो । फिर एकाएक दोनों गिलास मेरे हाथ से फिसले और एक झनाक की आवाज के साथ फर्श पर गिरकर टूट गये । फिर जैसे मुझे दिल का दौरा पड़ गया, मैं मर गया और मरकर उसकी अपनी तरफ फैली बांहों में ढेर हो गया।
एकाएक मेरे कानों में लड़की की खनकती-सी हंसी पड़ी और फिर उसने लड़के को अपने से परे धकेल दिया । चांद की रोशनी में मैंने देखा कि लड़की अपनी कालर वाली कमीज के बटन व्यवस्थित कर रही थी । लड़के ने उसे दबोचने की कोशिश की लेकिन लड़की ने उसकी कोशिश कामयाब न होने दी । “अभी सब्र करो, अनिल ।” - वह बोली - “पहले मेरे साथ भीतर चलो ।” “पागल हुई हो क्या ?” - लड़का बौखलाए स्वर में बोला - “मैं नहीं जाने का ।” “तो फिर मैं खुद जाऊंगी ।” - वह धमकी भरे स्वर में बोली । “जाती हो तो जाओ, लेकिन मैं तुम्हारे साथ तुम्हारी इस खतरनाक हरकत में शामिल नहीं होना चाहता ।” “डरपोक !” - वह तिरस्कारपूर्ण स्वर में बोली । मुझे उसकी आवाज यूं लगी जैसे नशे में थरथरा रही हो । फिर वह कार से बाहर निकली । मैंने देखा कि वह भरपूर जवान लेकिन ज्यादा-से-ज्यादा बीस साल की लड़की थी । वह एक बैलबॉटम जीन और मुश्किल से कमर के खम तक पहुंचने वाली मरदाने कटाव की कमीज पहने हुए थी । उसके बाल कटे हुए थे और चेहरा चांद की रोशनी में चांद जैसा ही सुन्दर लग रहा था । “इन्तजार करने में कुछ हासिल दिखाई दे तो मेरा इन्तजार कर लेना ।” - वह लड़के से बोली । “कुछ क्या, सभी कुछ हासिल है, डार्लिंग ।” - लड़का बोला - “मेरी निगाह में नुक्स तुम्हारे दिमाग में है, तुम्हारे जिस्म में नहीं ।” “डरपोक ! मैं डरपोक आदमी से मुहब्बत नहीं करती ।” “करने लगोगी । एक-एक ड्रिंक हो जाने के बाद देखना क्या होता है !” - लड़के के स्वर में सम्पूर्ण आत्मविश्वास का पुट था ।
“तुमने उससे पूछा नहीं कि उस फ्लैट का खर्चा वह कैसे उठाती थी ?” “मैंने पूछा तो नहीं था, पूछना मुझे अच्छा नहीं लगा था, लेकिन मेरा ख्याल था कि कोई पुरानी खानदानी जमा पूंजी होगी उसके पास ।” “या शायद उसने कोई और, तुमसे ज्यादा सम्पन्न यार पाला हुआ हो ?” उसने सख्त नाराजगी से मेरी ओर देखा और फिर गुस्से में बोला - “नामुमकिन । मेरे सिवा उसकी जिन्दगी में कोई मर्द नहीं था । हम दोनों बहुत करीब थे । होता तो मुझे मालूम होता ।” “शायद तुम्हें बड़ी देर बाद, अब, मालूम हुआ और तुमने ईर्ष्या की भावना से प्रेरित होकर कंचन का कत्ल कर दिया शायद तुमसे उसकी दगाबाजी बर्दाश्त न हुई और तुमने उसे मार...” “बकवास !” - वह गुस्से में बोला - “मैं उससे मुहब्बत करता था । उसके बिना मुझे अपनी जिन्दगी खोखली मालूम हो रही है । मैं उसका कत्ल कैसे कर सकता था ?” वह सच बोलता लग रहा था, लेकिन मैं उसकी बात पर विश्वास नहीं करना चाहता था । आखिर किसी ने तो कंचन का कत्ल किया ही था । किसने ? किसने ?
“थी ।” - वह सहमति में सिर हिलाता हुआ बोला - “वह सब जानती थी । कंचन कहती थी कि शेखावत साहब की बीवी बड़ी ठण्डी औरत है । सैक्स में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं । बीस-बाईस साल पहले शादी होते ही उसने शेखावत के लिए एक बच्चा पैदा कर दिया था और समझ लिया था कि एक पत्नी के लिहाज से उसकी जिम्मेदारी खत्म । वह औरत क्योंकि खुद सैक्स से विरक्त थी इसलिए वह परवाह नहीं करती थी कि उसका पति अपनी सैक्स की भूख कहां जाकर मिटाता था !” “लेकिन मर्द का एक ही औरत से लम्बा और पक्का रिश्ता तो ठण्डी बीवियों को भी काबिलेएतराज लगता है ।” “मुझे इस बारे में कुछ नहीं मालूम ।” “शेखावत की बीवी को कंचन की खबर लगी कैसे थी ?” “सुना है जब शेखावत साहब ने एकाएक रातों को घर आना बन्द कर दिया था तो उनकी बीवी ने उनके पीछे जासूस लगा दिये थे ।” “यह कब की बात है ?” “कोई एक साल पहले की ।” “हूं । मिसेज शेखावत को कंचन की खबर लग गई फिर भी उसने कोई कोई फसाद नहीं खड़ा किया ?” “जाहिर है कि नहीं किया । अगर किया होता तो एक साल के वक्फे में कोई हल्लागुल्ला न हो गया होता ? कोई तलाक वगैरह की नौबत आ गई होती ?”
“आपसे मिलने के बाद हैरानी हो रही है कि शेखावत साहब इतना समय घर से बाहर गुजारते हैं ।” वह सकपकाई । उसने गौर से मेरी तरफ देखा । मैं निडर भाव से उसकी आंखों में झांकता रहा फिर उसके चेहरे से सकपकाहट गायब हो गई और उसका स्थान उदासी ने ले लिया । “सारा शहर वजह जानता है ।” - वह बोली । “अगर कोई आप जैसी परम सुन्दरी मेरे घर में बैठी होती तो मैं तो छ:-छ: महीने घर की चौखट के बाहर कदम न रखता ।”“सब कहने की बातें हैं । तुम सब मर्द एक ही जैसे होते हो । भंवरे । कली-कली का रस चूसने वाले । किसी एक के प्रति - खास तौर से घर की औरत के प्रति - तुम लोग भला कैसे ईमानदार रह सकते हो !”“आप जैसी औरत घर पर हो तो लानत भेजिये उस पर जो कहीं और झांकने भी जाये ।”“तुम बातें बड़ी अच्छी करते हो । तुम्हारी बातों ने तो मेरा हौसला बुलन्द कर दिया है । यहां आते-जाते रहा करो ।”“अच्छा !” अब मैं और दिलेर हो उठा - “मेरी समझ में नहीं आता कि आपके पति आप जैसी शानदार औरत घर में होते हुए उस कंचन नाम की घटिया लड़की से कैसे रिश्ता रखे हुए थे !” यहां मुझसे गलती हो गई । शायद यह बात मुझे जरा चालाकी से कहनी चाहिए थी या थोड़ा रुककर, माहौल को परखकर कहनी चाहिए थी । उसके चेहरे से एकाएक मिठास के सारे भाव गायब हो गये और उसका स्थान सख्ती और सन्देह ने ले लिया । “क्या चक्कर है ?” - वह कठोर स्वर में बोली - “तुम कौन होते हो ऐसी बात कहने वाले ?”“मैं एक प्राइवेट जासूस हूं ।” - मैं जल्दी से बिगड़ी बात बनाने की कोशिश में बोला - “आपके पति ने मेरी सेवायें प्राप्त की हैं ।”“मेरे पति ने ? क्यों ? किसलिये ?”“उन्हें किसी ब्लैकमेलर ने फोन किया था और कहा था कि कंचन की हत्या की रात उसने आपको कंचन के कॉटेज के पास देखा था ।”“बकवास ।” - वह क्रोधित स्वर में बोली - “शेखावत साहब ऐसी किसी बात की तफ्तीश के लिये कोई प्राइवेट जासूस क्यों रखेंगे ? उन्हें खूब मालूम है कि हत्या की रात को मैं यहां पार्टी में महल में कई मेहमानों के बीच मौजूद थी । नहीं, नहीं । तुम मेरे पति द्वारा रखे कोई प्राइवेट जासूस नहीं हो सकते । सच-सच बोलो, कौन हो तुम ?”
“तुम गलत कह रहे हो । लगता है कि तकदीर ने हमेशा तुम्हारा साथ दिया है । अगर ऐसा न होता तो पहली ही बार तुम्हारा काम न हो गया होता ? इतने बड़े-बड़े अपराध करने के बावजूद तुम हर बार बच जाते हो, क्या यह इसलिए नहीं है, क्योंकि तकदीर ने तुम्हारा साथ हमेशा दिया है ? इस बार ही देख लो । अगर मेरी जगह इंस्पेक्टर महिपाल सिंह तुम्हें पहचान लेता तो वो कंचन के कत्ल का अपराध तुम पर साबित करने की कोशिश छोड़कर तुम्हें फांसी पर चढाने का सामान करने लगता । फिर पुलिस की पकड़ से छूटे भी तुम कैसे करिश्मासाज ढंग से ! अपनी तकदीर तो मत कोसो, मिस्टर ।”“शायद तुम ठीक कह रही हो ।” - मैं बोला - “बात को इस ढंग से मैंने आज तक नहीं सोचा था ।”“और तुम मेरी ओर से निश्चिन्त रहो ।” - उसने आश्वासन दिया - “मैं तुम्हारी हकीकत किसी पर जाहिर नहीं करूंगी ।”“शुक्रिया ।” - मैं कृतज्ञ स्वर में बोला । “और मैं तुम्हारी हर मुमकिन मदद करने को तैयार हूं ।”“शुक्रिया ।”“लेकिन एक शर्त तुम्हें मेरी भी माननी होगी ।”“क्या ?” - मैं सशंक स्वर में बोला । “यह उल्लू-सा नक्शा तानना छोड़ो । मैं ऐसा मर्द पसन्द नहीं करती, जो मुझसे बेजार दिखाई दे ।”
एकाएक मेरे कानों में लड़की की खनकती-सी हंसी पड़ी और फिर उसने लड़के को अपने से परे धकेल दिया । चांद की रोशनी में मैंने देखा कि लड़की अपनी कालर वाली कमीज के बटन व्यवस्थित कर रही थी । लड़के ने उसे दबोचने की कोशिश की लेकिन लड़की ने उसकी कोशिश कामयाब न होने दी । “अभी सब्र करो, अनिल ।” - वह बोली - “पहले मेरे साथ भीतर चलो ।” “पागल हुई हो क्या ?” - लड़का बौखलाए स्वर में बोला - “मैं नहीं जाने का ।” “तो फिर मैं खुद जाऊंगी ।” - वह धमकी भरे स्वर में बोली । “जाती हो तो जाओ, लेकिन मैं तुम्हारे साथ तुम्हारी इस खतरनाक हरकत में शामिल नहीं होना चाहता ।” “डरपोक !” - वह तिरस्कारपूर्ण स्वर में बोली । मुझे उसकी आवाज यूं लगी जैसे नशे में थरथरा रही हो । फिर वह कार से बाहर निकली । मैंने देखा कि वह भरपूर जवान लेकिन ज्यादा-से-ज्यादा बीस साल की लड़की थी । वह एक बैलबॉटम जीन और मुश्किल से कमर के खम तक पहुंचने वाली मरदाने कटाव की कमीज पहने हुए थी । उसके बाल कटे हुए थे और चेहरा चांद की रोशनी में चांद जैसा ही सुन्दर लग रहा था । “इन्तजार करने में कुछ हासिल दिखाई दे तो मेरा इन्तजार कर लेना ।” - वह लड़के से बोली । “कुछ क्या, सभी कुछ हासिल है, डार्लिंग ।” - लड़का बोला - “मेरी निगाह में नुक्स तुम्हारे दिमाग में है, तुम्हारे जिस्म में नहीं ।” “डरपोक ! मैं डरपोक आदमी से मुहब्बत नहीं करती ।” “करने लगोगी । एक-एक ड्रिंक हो जाने के बाद देखना क्या होता है !” - लड़के के स्वर में सम्पूर्ण आत्मविश्वास का पुट था ।
“तुमने उससे पूछा नहीं कि उस फ्लैट का खर्चा वह कैसे उठाती थी ?” “मैंने पूछा तो नहीं था, पूछना मुझे अच्छा नहीं लगा था, लेकिन मेरा ख्याल था कि कोई पुरानी खानदानी जमा पूंजी होगी उसके पास ।” “या शायद उसने कोई और, तुमसे ज्यादा सम्पन्न यार पाला हुआ हो ?” उसने सख्त नाराजगी से मेरी ओर देखा और फिर गुस्से में बोला - “नामुमकिन । मेरे सिवा उसकी जिन्दगी में कोई मर्द नहीं था । हम दोनों बहुत करीब थे । होता तो मुझे मालूम होता ।” “शायद तुम्हें बड़ी देर बाद, अब, मालूम हुआ और तुमने ईर्ष्या की भावना से प्रेरित होकर कंचन का कत्ल कर दिया शायद तुमसे उसकी दगाबाजी बर्दाश्त न हुई और तुमने उसे मार...” “बकवास !” - वह गुस्से में बोला - “मैं उससे मुहब्बत करता था । उसके बिना मुझे अपनी जिन्दगी खोखली मालूम हो रही है । मैं उसका कत्ल कैसे कर सकता था ?” वह सच बोलता लग रहा था, लेकिन मैं उसकी बात पर विश्वास नहीं करना चाहता था । आखिर किसी ने तो कंचन का कत्ल किया ही था । किसने ? किसने ?
“थी ।” - वह सहमति में सिर हिलाता हुआ बोला - “वह सब जानती थी । कंचन कहती थी कि शेखावत साहब की बीवी बड़ी ठण्डी औरत है । सैक्स में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं । बीस-बाईस साल पहले शादी होते ही उसने शेखावत के लिए एक बच्चा पैदा कर दिया था और समझ लिया था कि एक पत्नी के लिहाज से उसकी जिम्मेदारी खत्म । वह औरत क्योंकि खुद सैक्स से विरक्त थी इसलिए वह परवाह नहीं करती थी कि उसका पति अपनी सैक्स की भूख कहां जाकर मिटाता था !” “लेकिन मर्द का एक ही औरत से लम्बा और पक्का रिश्ता तो ठण्डी बीवियों को भी काबिलेएतराज लगता है ।” “मुझे इस बारे में कुछ नहीं मालूम ।” “शेखावत की बीवी को कंचन की खबर लगी कैसे थी ?” “सुना है जब शेखावत साहब ने एकाएक रातों को घर आना बन्द कर दिया था तो उनकी बीवी ने उनके पीछे जासूस लगा दिये थे ।” “यह कब की बात है ?” “कोई एक साल पहले की ।” “हूं । मिसेज शेखावत को कंचन की खबर लग गई फिर भी उसने कोई कोई फसाद नहीं खड़ा किया ?” “जाहिर है कि नहीं किया । अगर किया होता तो एक साल के वक्फे में कोई हल्लागुल्ला न हो गया होता ? कोई तलाक वगैरह की नौबत आ गई होती ?”
“आपसे मिलने के बाद हैरानी हो रही है कि शेखावत साहब इतना समय घर से बाहर गुजारते हैं ।” वह सकपकाई । उसने गौर से मेरी तरफ देखा । मैं निडर भाव से उसकी आंखों में झांकता रहा फिर उसके चेहरे से सकपकाहट गायब हो गई और उसका स्थान उदासी ने ले लिया । “सारा शहर वजह जानता है ।” - वह बोली । “अगर कोई आप जैसी परम सुन्दरी मेरे घर में बैठी होती तो मैं तो छ:-छ: महीने घर की चौखट के बाहर कदम न रखता ।”“सब कहने की बातें हैं । तुम सब मर्द एक ही जैसे होते हो । भंवरे । कली-कली का रस चूसने वाले । किसी एक के प्रति - खास तौर से घर की औरत के प्रति - तुम लोग भला कैसे ईमानदार रह सकते हो !”“आप जैसी औरत घर पर हो तो लानत भेजिये उस पर जो कहीं और झांकने भी जाये ।”“तुम बातें बड़ी अच्छी करते हो । तुम्हारी बातों ने तो मेरा हौसला बुलन्द कर दिया है । यहां आते-जाते रहा करो ।”“अच्छा !” अब मैं और दिलेर हो उठा - “मेरी समझ में नहीं आता कि आपके पति आप जैसी शानदार औरत घर में होते हुए उस कंचन नाम की घटिया लड़की से कैसे रिश्ता रखे हुए थे !” यहां मुझसे गलती हो गई । शायद यह बात मुझे जरा चालाकी से कहनी चाहिए थी या थोड़ा रुककर, माहौल को परखकर कहनी चाहिए थी । उसके चेहरे से एकाएक मिठास के सारे भाव गायब हो गये और उसका स्थान सख्ती और सन्देह ने ले लिया । “क्या चक्कर है ?” - वह कठोर स्वर में बोली - “तुम कौन होते हो ऐसी बात कहने वाले ?”“मैं एक प्राइवेट जासूस हूं ।” - मैं जल्दी से बिगड़ी बात बनाने की कोशिश में बोला - “आपके पति ने मेरी सेवायें प्राप्त की हैं ।”“मेरे पति ने ? क्यों ? किसलिये ?”“उन्हें किसी ब्लैकमेलर ने फोन किया था और कहा था कि कंचन की हत्या की रात उसने आपको कंचन के कॉटेज के पास देखा था ।”“बकवास ।” - वह क्रोधित स्वर में बोली - “शेखावत साहब ऐसी किसी बात की तफ्तीश के लिये कोई प्राइवेट जासूस क्यों रखेंगे ? उन्हें खूब मालूम है कि हत्या की रात को मैं यहां पार्टी में महल में कई मेहमानों के बीच मौजूद थी । नहीं, नहीं । तुम मेरे पति द्वारा रखे कोई प्राइवेट जासूस नहीं हो सकते । सच-सच बोलो, कौन हो तुम ?”
“तुम गलत कह रहे हो । लगता है कि तकदीर ने हमेशा तुम्हारा साथ दिया है । अगर ऐसा न होता तो पहली ही बार तुम्हारा काम न हो गया होता ? इतने बड़े-बड़े अपराध करने के बावजूद तुम हर बार बच जाते हो, क्या यह इसलिए नहीं है, क्योंकि तकदीर ने तुम्हारा साथ हमेशा दिया है ? इस बार ही देख लो । अगर मेरी जगह इंस्पेक्टर महिपाल सिंह तुम्हें पहचान लेता तो वो कंचन के कत्ल का अपराध तुम पर साबित करने की कोशिश छोड़कर तुम्हें फांसी पर चढाने का सामान करने लगता । फिर पुलिस की पकड़ से छूटे भी तुम कैसे करिश्मासाज ढंग से ! अपनी तकदीर तो मत कोसो, मिस्टर ।”“शायद तुम ठीक कह रही हो ।” - मैं बोला - “बात को इस ढंग से मैंने आज तक नहीं सोचा था ।”“और तुम मेरी ओर से निश्चिन्त रहो ।” - उसने आश्वासन दिया - “मैं तुम्हारी हकीकत किसी पर जाहिर नहीं करूंगी ।”“शुक्रिया ।” - मैं कृतज्ञ स्वर में बोला । “और मैं तुम्हारी हर मुमकिन मदद करने को तैयार हूं ।”“शुक्रिया ।”“लेकिन एक शर्त तुम्हें मेरी भी माननी होगी ।”“क्या ?” - मैं सशंक स्वर में बोला । “यह उल्लू-सा नक्शा तानना छोड़ो । मैं ऐसा मर्द पसन्द नहीं करती, जो मुझसे बेजार दिखाई दे ।”
This entire review has been hidden because of spoilers.
Read
August 16, 20221/5 stars
मुझे ये उपन्यास थ्रीलर से ज्यादा मर्डर मिस्टरी लगा, यहाँ कंचन बेवजह विमल से मिलती है और उसका खून हो जाता है. फिर विमल उसका क़ातिल ढूंढता है, कुछ मामला जमा नहीं. शुक्र है की अंत में डीएसपी चौधरी ने थोड़ा सा संभाल लिया नहीं तो किताब बहुत है बोरिंग हो रही थी.... मुझे पसंद नहीं आयी 👎👎👎👎
मुझे ये उपन्यास थ्रीलर से ज्यादा मर्डर मिस्टरी लगा, यहाँ कंचन बेवजह विमल से मिलती है और उसका खून हो जाता है. फिर विमल उसका क़ातिल ढूंढता है, कुछ मामला जमा नहीं. शुक्र है की अंत में डीएसपी चौधरी ने थोड़ा सा संभाल लिया नहीं तो किताब बहुत है बोरिंग हो रही थी.... मुझे पसंद नहीं आयी 👎👎👎👎
December 31, 2021
A decent read. I liked it. But I was not enthralled by it as before.
7 done and 37 yet to
I recommend it. .
7 done and 37 yet to
I recommend it. .
August 23, 2013
Vimal at it again! A fantastic murder mystery where Vimal is the prime suspect. How he proves himself innocent is the gist of the story. A breathtaking fast paced story with an amazingly refreshing character (Sheetal) thrown is the usp of this book.
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