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Vimal #20
लेख की रेखा
‘कम्पनी’ के नये सरताज से झूझते, हर पल पनाह मांगते विमल की तरफ एक कानून - वो कानून जिससे वो भागता फिर रहा था - के मुहाफिज ने जब विमल की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया तो विमल विश्वास नहीं कर पाया ! कदम कदम पर दुश्मनों से घिरे विमल के लेख में ये एक नया पड़ाव था !
- GenresThriller
236 pages, Mass Market Paperback
First published July 1, 1990
About the author
Surender Mohan Pathak
335 books398 followersSurender Mohan Pathak, is an author of Hindi-language crime fiction with 314 books to his credit. His major characters are Crime reporter Sunil (unprecedented 123 Titles), Vimal (46 Titles) and Philosopher Detective Sudhir (23 titles). Apart from series, he has written 60+ Novels in thriller category.
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Community Reviews
Displaying 1 - 4 of 4 reviews
January 9, 2021
“क्योंकि वो हर उस आदमी के खून का प्यासा है जो आर्गेनाइज्ड क्राइम का झंडाबरदार है । बखिया की मौत के बाद उसने इस शहर को आर्गेनाइज्ड क्राइम के जेरेसाया पलती कत्लगाह कहा था, अत्याचार का ऐसा डेरा कहा था जहां कोई जिंदगी महफूज नहीं, इंसान की बर्बरता और उसके वहशी नंगे रूप की नुमाइशगाह कहा था । इसलिए उसने अपनी बेमानी जिंदगी को कोई मानी देने की नीयत से आर्गेनाइज्ड क्राइम की मुखालफत करने का बीड़ा उठाया था । उसने मुझे वार्निंग दी थी कि मैं कुछ भी करूं, बखिया बनने की कोशिश न करूं । कालिया, तब उसने जो कुछ कहा था उसका एक-एक लफ्ज आज भी हर घड़ी मेरे कानों में गूंजता है । उसने कहा था - ‘जब-जब बखिया की ‘कंपनी’ जैसी आर्गेनाइज्ड क्राइम की कोई संस्था इस मुल्क में सिर उठाएगी, तब-तब मैं उस पर कहर बनके टूटूंगा । यह मेरा आर्गेनाइज्ड क्राइम के बखिया जैसे उन तमाम महंतों से वादा है जो अपने आपको कायदे-काननू और सरकार से ऊंचा समझते हैं, जो मुल्क के कानून को अपना गुलाम और मुल्क की सरकार को अपनी लौंडी समझते हैं । मैं काननू की मुखालफत करके कानून का रखवाला बनके दिखाऊंगा’ ।”
कालिया एक क्षण खामोश रहा और फिर गहरी सांस लेकर बोला - “मैं समझता था मैं इकबालसिंह को पीट सकता था, इसलिए मैंने उससे पंगा लिया । मेरा ये ख्याल गलत न था, लेकिन ये मैंने बाद में जाना कि मेरा मुकाबला इकबालसिंह से नहीं, बखिया के स्थापित निजाम से था । उस निजाम का मुकाबला मुझे भारी पड़ रहा है । भारी बॉल का धक्का देकर लुढकाना शुरू किया जाता है, बाद में धक्का देना भी बंद कर दिया जाए तो बॉल लुढकती रहती है । यही कुछ बखिया के निजाम के साथ हो रहा है । उसकी लुढकाई, उसकी कूव्वत और दिलेरी से रफ्तार में आई ‘कंपनी’ की भारी बॉल अभी भी लुढक रही है, किसी इकबालसिंह की उस रफ्तार से शिरकत न होने के बावजूद लुढक रही है और जाने कब तक लुढकती चली जाएगी ।”
कालिया एक क्षण खामोश रहा और फिर गहरी सांस लेकर बोला - “मैं समझता था मैं इकबालसिंह को पीट सकता था, इसलिए मैंने उससे पंगा लिया । मेरा ये ख्याल गलत न था, लेकिन ये मैंने बाद में जाना कि मेरा मुकाबला इकबालसिंह से नहीं, बखिया के स्थापित निजाम से था । उस निजाम का मुकाबला मुझे भारी पड़ रहा है । भारी बॉल का धक्का देकर लुढकाना शुरू किया जाता है, बाद में धक्का देना भी बंद कर दिया जाए तो बॉल लुढकती रहती है । यही कुछ बखिया के निजाम के साथ हो रहा है । उसकी लुढकाई, उसकी कूव्वत और दिलेरी से रफ्तार में आई ‘कंपनी’ की भारी बॉल अभी भी लुढक रही है, किसी इकबालसिंह की उस रफ्तार से शिरकत न होने के बावजूद लुढक रही है और जाने कब तक लुढकती चली जाएगी ।”
September 24, 2022
3/5 stars
अब तक पिछली सभी किताबों में डकैती बिना बताये होती थी लेकिन इस उपन्यास में बादशाह को पता था की उसके टापू में डकैती होगी, यही बात इस कहानी को थोड़ा अलग बनाती है.60% के बाद बेवजह खिंचावट का एहसास होता है, कथानक बोरिंग सा हो जाता है और फिर क्लाइंमैक्स भी कुछ ख़ास पसंद नहीं आया.. किताब अच्छी है लेकिन अपनी पिछले भागो के मुक़ाबले काफी कमजोर है.
अब तक पिछली सभी किताबों में डकैती बिना बताये होती थी लेकिन इस उपन्यास में बादशाह को पता था की उसके टापू में डकैती होगी, यही बात इस कहानी को थोड़ा अलग बनाती है.60% के बाद बेवजह खिंचावट का एहसास होता है, कथानक बोरिंग सा हो जाता है और फिर क्लाइंमैक्स भी कुछ ख़ास पसंद नहीं आया.. किताब अच्छी है लेकिन अपनी पिछले भागो के मुक़ाबले काफी कमजोर है.
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April 5, 2017very nice
Displaying 1 - 4 of 4 reviews



