विमल के गुरुओं की सीख थी कि दीन के हित में लड़ना चाहिये, जुल्म के खिलाफ आवाज उठानी चाहिये । और फिर एक पीड़ित लड़की की हमलावर बांह की फरियाद सुनकर विमल निर्लिप्त ना रह पाया ! शीघ्र ही उसने खुद को जहाज के पंछी की भांति अपनी गुनाह से पिरोई जिंदगी के रूबरू पाया !
Surender Mohan Pathak, is an author of Hindi-language crime fiction with 314 books to his credit. His major characters are Crime reporter Sunil (unprecedented 123 Titles), Vimal (46 Titles) and Philosopher Detective Sudhir (23 titles). Apart from series, he has written 60+ Novels in thriller category.
कल रात इण्डिया गेट पर हुई घटना और भी शर्मनाक है जहां कि रक्षक ही भक्षक बन बैठे, जहां पुलिस के नुमायन्दों ने ही बलात्कारियों का रोल अदा करने की कोशिश की । इससे कोई क्या सबक ले ? क्या ये कि दिल्ली शहर में आदमी का बच्चा कहीं महफूज नहीं, किसी के हाथों महफूज नहीं - न उनके हाथों जो कानून के मुहाफिज हैं और न उनके हाथों जो कानून के दुश्मन हैं । क्या हम ये कबूल कर लें कि हम जुल्म और गुंडागर्दी के उस दौर में कदम रख चुके हैं जहां कोई नेक शहरी न सड़क पर महफूज है और न अपने घर पर । कहने को हम एक आजाद मुल्क में रहते हैं लेकिन अगर हमारे किसी अनिष्ट की आशंका हमें घर के दरवाजे बन्द करके भीतर दुबके रहने पर मजबूर करती है तो हम आजाद कैसे हुए ? ये कैसी आजादी है जिसमें हमें ये सुझाया जाता है कि अगर हम अपनी सलामती चाहते हैं तो हम अपने घरों में दुबककर बैठें ? हमें लगता है कि स्थानीय पुलिस अपनी तमाम जिम्मेदारियों की परिणति इसी में समझने लगी है कि वो अपनी जिप्सी वैनों के काफिलों से नेक शहरियों में - ध्यान दें, अपराधियों में नहीं, नेक शहरियों में - खौफ पैदा करें, सड़कों पर जगह-जगह बैरियर लगाकर और यूं पैदा होने वाले लम्बे-लम्बे ट्रैफिक जामों से पूर्ण निर्लिप्त दिखाये और कम्यूटर्स को हलकान करें, काले शीशों वाली कारों के चालान करने और सार्वजनिक पार्कों में बैठे नौजवान जोड़ों को खौफजदा करने में ही अपनी वर्दी की शान समझें, अपनी ही शै पर धन्धा करती एक कार्लगर्ल को और उसके दलाल को पकड़कर यूं वाहवाही लूटने की कोशिश करें जैसे सुलताना डाकू मार लिया हो । यूं इस शहर का निजाम नहीं चल सकता । यूं इस मुल्क का निजाम नहीं चल सकता । पुलिस को चेतना होगा । पुलिस के ऊपर बैठे ब्यूरोक्रैट्स को चेतना होगा, उनसे भी ऊपर बैठे मन्त्रियों और नेताओं को चेतना होगा । ऐसा नहीं होगा तो ये सारा शहर एक कत्लगाह बन जायेगा । अभी एक हफ्ते में चौदह कत्ल हुए हैं, फिर चौदह सौ होंगे, चौदह हजार होंगे । ये वांछित नहीं । मरने वाले चाहे खूनी थे, चाहे बलात्कारी थे, उनका यूं इंसाफ नहीं होना चाहिए जैसे कि हो रहा है । हम पुलिस कमिश्नर साहब से दरख्वास्त करते हैं कि वो ऐसे पुलिसकर्मियों पर अंकुश लगायें जो रेहड़े-तांगे वालों से हफ्ता वसूल करके और रंडियों से चौथ वसूल करके ही समझते हैं कि उनकी ड्यूटी हो ली ।
“ये तो नहीं सोचा होगा कि सूरमाई की तरफ उठता तुम्हारा कदम तुम्हारी बीवी को विधवा बना सकता है ?” “यकीनन बना सकता है । लेकिन मेरी बीवी को भी ये याद रखना चाहिये कि उसने एक मामूली इंसान को नहीं एक गैंगस्टर को, एक मवाली को स्वेच्छा से अपना पति चुना है । ऐसी बीवी ऐसे पति के आखिरी अंजाम को नजर अन्दाज करती है तो ये उसकी भूल है । उसे हमेशा याद रखना चाहिए कि मवाली की बीवी विधवा ही मरेगी ।” “खबरदार जो तकाल संध्या के वक्त अपशब्द मुंह से निकाले ।” “ये हकीकत है । ए गैंगस्टर्स वाइफ विल डाई ए विडो ।”
“इसीलिये तो” - विमल बोला - “आज के हालात पर ये पुरानी कहावत फिट नहीं बैठती कि ‘क्राइम डज नाट पे’ ।” “ऐग्जैक्टली ।” - शिव नारायण बोला - “क्राइम डज पे’ अब तो ये बात स्थापित हो चुकी है । नाट ओनली इट डज पे, इट पेज बैटर दैन दि आनेस्ट लेबर । नतीजन अब ये बात भी गलत साबित ही गयी है कि अपराध अन्याय, अशिक्षा या अभाव का परिणाम होता है । मेरी निगाह में आज के जमाने में अपराध का मूल जरूरत नहीं, लालच है । और हमारी जेलों में ग्रैजुएट पोस्ट ग्रैजुएट कैदियों का बहुतायत में पाया जाना इस बात का सबूत है कि अशिक्षा ही अपराध की जन्मदात्री नहीं ।” सबके सिर सहमति में हिले । “दरअसल हमारे समाज की ट्रेजेडी ही ये है कि इतना ही नहीं कि क्राइम पे करने लगा है, वो फायदे का धन्धा होता जा रहा है, बल्कि उसके हासिल में भी इजाफा होता जा रहा है और उसे अंजाम देने पर आने वाली लागत घटती जा रही है ।” “वो कैसे ?” - विमल बोला । “भई, हर क्राइम के लिए ए के-47 राइफल दरकार थोड़े ही होती है ! एक कमानीदार चाकू या एक देसी कट्टे पर लागत हो कितनी आती है ।”
“अपराध होता क्यों है !” - चान्दवानी बोला - “अपराध की तरफ जो पहला कदम उठताहै, उसके लिये क्या हमारी सरकार जिम्मेदार नहीं जो कि अपने नागरिकों की रोटी कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी जैसी बुनियादी जरूरियात पूरी नहीं कर सकती ?” “ये मुद्दा समाजशास्त्रियों के लिए है” - शिव नारायण तनिक झुंझलाकर बोला - “नेता लोगों के लिए है । अपराध विज्ञान विशेषज्ञों के लिए है । समाज सुधारकों के लिए है । अपराध क्यों होता है इसकी सौ वजह हो सकती हैं । कंगाली, भुखमरी, लालच, फिरकापरस्ती, धर्म में अनास्था या धार्मिक उन्माद, ड्रग्स, वायलेंस को बढावा देने वाली फिल्में, सैक्स, एडवेन्चर, पैसे की कमी या पैसे की बहुतायत, धांधली, पोर्नोग्राफी जैसी हजार वजह हो सकती हैं । मेरा मुद्दा अपराध करने वालों से नहीं अपराध झेलने वालों से ताल्लुक रखता है । आपका लड़का स्मैक पीता है तो ये आपकी व्यक्तिगत समस्या है लेकिन अगर वही लड़का अपनी तलब पूरी करने लिए मेरा सिर फोड़ के मेरा बटुवा निकाल लेता है तो ये सिर्फ मेरी नहीं सारी सोसायटी की प्राब्लम है क्योंकि आज जो मेरे साथ हुआ है, वो कल किसी के साथ भी हो सकता है । साहबान, कोई पड़ोसी देश हमारे ऊपर हमला कर दे तो उस वक्त हम ये नहीं सोचेंगे कि उस हमले के पीछे उस बेचारे देश को कोई मजबूरी होगी, उसकी कोई जरूरत होगी वो हमला, बल्कि हम हमले का मुंहतोड़ जवाब देंगे और डटकर उसका मुकाबला करेंगे । साहबान, ऐसा ही हमला अपराधियों की निरन्तर बड़ी होती जा रही एक जमात हमारे हकूक पर, हमारी आजादी पर करती है, इसलिए उसका भी हमने मुंहतोड़ जवाब देना है और डट के मुकाबला करना है, बिना इस बात से हमदर्दी दिखाये कि हमलावर की कोई मजबूरी थी या उसे हमलावर बनाने में हमारे निजाम की किन्हीं कमियों का कोई हाथ था।
“राह दिखाने वाले बहुत मिल जाते हैं” - आप्टे बोला - “लेकिन दिखाई गयी राह पर कोई चलने वाला भी तो होना चाहिये ।” “ऐग्जैक्टली ।” - विमल बोला - “महात्मा गान्धी ने कौम को आजादी दिलाई तो उसने सिर्फ इतना नहीं कहा था कि वो सामने आजादी की राह है, देशवासियो चल पड़ो उस पर । वो उस राह पर देशवासियों के साथ चला था, उनकी रहनुमाई करता हुआ । उनके साथ लाठी गोली खाता हुआ । हमारे गुरुओं ने... आई मीन सिख गुरुओं ने पहले कुरबानी की मिसाल खुद पेश की थी और फिर ललकारा था अपने अनुयायियों को कुरबानी देने के लिये । गुरु गोविन्द सिंह ने कहा था कि चिड़ियां तों मैं बाज लड़ावां, तां गोविन्द सिंह नां कहांवां । नेलसन मन्डेला सत्ताइस साल जेल में रहने के बाद अपनी कौम का नूरेनजर और इन्टरनेशनल हीरो बना था । नारायण साहब, जैसा आप कह रहे हैं, वो तो किनारे पर बैठकर तूफानी लहरों का नजारा करने जैसा हुआ !”
ज़ब सहजपाल एसआई था तो दरोगा ने डायरेक्ट उससे बात क्यों नहीं करी, इसके विपरीत फिगरप्रिंट मेच कराने की क़्या जरुरत थी. अंत में संदेशवाहक और ज्ञानभरी की बातें भी अति हो गई थी इनसे बचा जा जाता तो बेहतर होता. ऊपर से मुबारक अली को जरुरत से ज्यादा ताकतवर दिखा दिया जैसे गुलबक्श डॉन नहीं कोई छोटा मोटा चोर हुआ.
इस बार की कहानी मुंबई से हटकर पूरी तरीके से दिल्ली (ओवरकोट ब्रिगेड)में घटित होती है और दिल्ली निवासी होने के चलते आराम से रिलेट कर पाया. विमल से ज्यादा फोकस तो दरोगा लूथरा पर लगा और यही हीरो भी लगा, उपन्यास में पुलिस का रोल बहुत अधिक और महत्वपूर्ण है.सिर्फ एंटरटेनमेंट के नजरिये से देखा जाएं तो किताब कहीं से भी निराश नहीं करती.
✨4.5✨ Everything was just perfect. Good paced, excellent characters, great plot. Only the thing that lacked was a conclusive ending. Ending was not at all conclusive.