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मुर्दो का टीला

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पुस्तक के विषय में
भारत की प्राचीन सम्मत। और संस्कृति का इतिहास मोअन-जो-दड़ो के उत्खनन में मिली सिंधु घाटी की सभ्यता से शुरू होता है । इस सष्यता का विकसित स्वरूप उस समय की ज्ञात किसी सम्मत। की तुलना में अधिक उन्नत है। प्रसिद्ध उपन्यासकार रांगेय राघव ने अपने इस उपन्यास 'मुर्दों का टीला' में उस आदि तन्यता के संसार का सूक्ष्म चित्रण किया है । मोअन-जो-दड़ो सिंधी शब्द है। उसका अर्थ हैं-मृतकों का स्थान अर्थात् 'मुर्दों का टीला'।
'मुर्दो का टीला' शीर्षक इस उपन्यास में रांगेय राघव ने एक रचनाकार की दृष्टि से मोअन-जो-दड़ो का उत्खनन करने का प्रयास किया है । इतिहास की पुस्तकों में तो इत सभ्यता के बारे में महज तथ्यात्मक विवरण पाते हैं। लेकिन रांगेय राषद के इस उपन्यास के सहारे हम सिंधु घाटी सभ्यता के समाज की जीवित धड़कनें सुनते हैं।
सिंधु पाटी सम्मत। का स्वरूप क्या था? उस समाज के लोगों की जीवन-शैली कैसी थी? रीति-रिवाजवाज कैसे थे? शासन-व्यवस्था का स्वरूप क्या था? इन प्रर्श्नों का इतिहाससभ्मत उतर आप इस उपन्यास में पाएँगे । भारतीय उपमहाद्वदीप की अल्पज्ञात आदि सभ्यता को लेकर लिखा गया यह अद्वितीय उपन्यास है । रांगेय राघव का यह उपन्यास प्राचीन भारतीय सम्भता और संस्कृति में प्रदेश का पहला दरवाजा है ।...
मुर्दो का टीला
रांगेय राघव
जन्म: 17 जनवरी, 1923, आगरा
भूल नाम : टी.एन वी. आचार्य (तिरुमल्लै नबकम् वीरराघव .आचार्य) ।
शिक्षा आगग में। सेंट जॉन्स कांलेज से 1944 में स्नातकोत्तर और 1949 में आगरा विश्वविद्यालय से गुरु गोरखनाथ पर पी-एच. डी. हिंदी, अंग्रेज़ी, ब्रज और सस्कृत पर असाधारण अधिकार।
कृतियाँ 13 वर्ष की आयु में लिखना शुरू किया । 1942 में अकालग्रस्त बंगाल की यात्रा के बाद एक रिपोर्ताज लिखा- दुकानों के बीच यह रिपोर्ताज हिन्दी में चर्चा का विषय बना ।
मात्र 39 वर्ष की आयु में कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, रिपोर्ताज के अतिरिक्त आलोचना, सस्कृति और सभ्यता पर कुल मिलाकर 150 से अधिक पुस्तकें लिखीं । साहित्य के अतिरिक्त चित्रकला, सगीत और पुरातत्व में विशेष रुचि । अनेक रचनाओं का हिंदीतर भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद ।
सम्मान हिदुस्तानी अकादमी पुस्कार (1947), डालमिया पुरस्कार (1954) उत्तरप्रदेश शासन पुरस्कार (1957 तथा 1959), राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार (1961) और मरणोपरात महात्मा गाधी पुरस्कार (1966) से सम्मानित।
निधन. लंबी बीमारी के बाद 12 सितंबर, 1962 को बंबई में ।

341 pages, Paperback

First published January 1, 1948

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About the author

रांगेय राघव

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रांगेय राघव हिंदी के उन विशिष्ट और बहुमुखी प्रतिभावाले रचनाकारों में से हैं जो बहुत ही कम उम्र लेकर इस संसार में आए, लेकिन जिन्होंने अल्पायु में ही एक साथ उपन्यासकार, कहानीकार, निबंधकार, आलोचक, नाटककार, कवि, इतिहासवेत्ता तथा रिपोर्ताज लेखक के रूप में स्वंय को प्रतिस्थापित कर दिया, साथ ही अपने रचनात्मक कौशल से हिंदी की महान सृजनशीलता के दर्शन करा दिए।आगरा में जन्मे रांगेय राघव ने हिंदीतर भाषी होते हुए भी हिंदी साहित्य के विभिन्न धरातलों पर युगीन सत्य से उपजा महत्त्वपूर्ण साहित्य उपलब्ध कराया। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर जीवनीपरक उपन्यासों का ढेर लगा दिया। कहानी के पारंपरिक ढाँचे में बदलाव लाते हुए नवीन कथा प्रयोगों द्वारा उसे मौलिक कलेवर में विस्तृत आयाम दिया। रिपोर्ताज लेखन, जीवनचरितात्मक उपन्यास और महायात्रा गाथा की परंपरा डाली। विशिष्ट कथाकार के रूप में उनकी सृजनात्मक संपन्नता प्रेमचंदोत्तर रचनाकारों के लिए बड़ी चुनौती बनी।


Rangeya Raghava, birth name Tirumalai Nambakam Vir Raghava Acharya, was born in Agra, a city of Uttar Pradesh state, India. A prominent Hindi writer of the 20th century, he completed his post-graduation studies from St. John's College, Agra, and later completed his Ph.D. on Guru Gorakhnath and his times. He started writing at the age of 13 years, and during his short life of 39 years, he was endowed with a number of prizes.

https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%...

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September 1, 2024
A must read.. Takes you back to medieval
times. Indus Valley civilization days.
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