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ठेले पर हिमालय​

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163 pages, Hardcover

First published January 1, 1968

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Dharamvir Bharati

29 books104 followers

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1 review
October 8, 2018
Good book
This entire review has been hidden because of spoilers.
52 reviews27 followers
December 26, 2016
'ठेले पर हिमालय' धर्मवीर भारती जी की गद्य रचनाओं का संकलन है। इसमें विभिन्न विधाओं को प्रतिनिधित्व मिला है जैसे कि यात्रा-वृत्तांत, डायरी, पत्र, शब्द-चित्र, साहित्यिक डायरी, संस्मरण, कैरीकेचर, वव्यंग और श्रद्धांजलि। गुनाहों का देवता और सूरज का सातवाँ घोड़ा उपन्यास हैं और कुछ व्यक्तियों के इर्द-गिर्द घूमते हैं। 'ठेले पर हिमालय' में जो रचनायें संकलित की गई हैं उनमें किसी व्यक्ति की प्रधानता नहीं है, बल्कि कथानक की ही प्रधानता है। कुछ रचनाएँ अपवादस्वरूप व्यक्ति प्रधान बन पड़ी हैं लेकिन यह शायद उस विधा की माँग रही हो। उदाहरण के लिए भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को दी गई श्रद्धांजलि में लेखक ने उनके निजी जीवन के बारे में की गई टीका-टिप्पणियों से अलग उनके एक अलग रूप को प्रस्तुत किया है और साथ ही साथ कहा भी है - 'मैं चाँद के कलंक को स्वीकार करता हूँ।'

'ठेले पर हिमालय' पुस्तक का शीर्षक एक यात्रा-विवरण से लिया गया है जिससे इस पुस्तक की शुरुआत होती है। इसमें भारती जी ने कौसानी की अपनी यात्रा का लेख जोखा दिया है। एक अन्य यात्रा विवरण में उन्होंने कूर्मांचल में बिताए हुये कुछ दिनों को याद किया है। भारती जी के दोनों यात्रा-वृत्तांत इस लिहाज़ से रोचक हैं कि उन्होंने उनमें अपनी दिनचर्या का विवरण नहीं दिया है, बल्कि उस परिवेश की खूबी को चित्रित किया है। कूर्मांचल, उत्तराखंड का कुमाऊं मंडल, में ऐसा क्या है जो आने वाले लोगों को मोह लेता है, यह भारती जी ने बताया है। साथ ही साथ वहां पर प्रचलित कुछ लोकोक्तियों का भी उल्लेख किया है।

भारती जी की डायरी रचनाओं में उनकी सोच के दर्शन होते हैं। सामान्यतया कोई भी रचना किसी खाँचे में बांध दी जाती है और लेखक उस खाँचे से अपने आपको पृथक नहीं कर पाता है, लेकिन डायरी में लेखक स्वयं होता है और उसे किसी परिपाटी में बंधने की आवश्यकता नहीं होती है। यहाँ पर दी गई छः रचनाओं में भारती जी उन्मुक्त भाव से अपने विचार व्यक्त करते हैं। ज्यादातर डायरी रचनायें ललित निबंध की तरह हैं, जिसमें किसी भाव का स्वतंत्र रूप से बिना किसी आशाओं के अधीन हुए वर्णन किया गया है। अब उदाहरण के लिए 'क्षणों की नीलिमा' को ही ले लीजिये। यह डायरी रचना भारती जी के पसंदीदा रंग नीले पर है जिसमें भारती जी यह कहते हैं कि उनसे किसी ने पूछा था कि प्रणयोन्माद का रंग क्या होना चाहिये तो उन्होंने झटपट कहा था कि नीला होना चाहिए।

आजकल के संचार के माध्यमों के व्यापक प्रसार के कारण पत्र लेखन की कला कहीं खो सी गई है। पत्र लेखन को कला कहना कहीं से भी ज्यादती नहीं है जब आप यह देखेंगे कि पत्रों को सहेजकर जब दशकों तक रख जा सकता है तो क्यों न थोड़ा सा मेहनत करके उसे इस लायक बना दिया जाए कि उसे दोबारा पढ़ने पर एक बीता हुआ समय याद आ सके। पत्रों के नाम पर पहला स्मरण शायद जवाहरलाल नेहरू के इंदिरा गांधी को लिखे गए पत्रों का आता है। भारती जी के इस पुस्तक में संकलित किये गए पत्रों में कुछ निजी हैं और कुछ को साहित्यिक और व्यक्तिगत दुनिया से जुड़ा हुआ पाया जा सकता है। एक साहित्यकार के पत्र पढ़ते हुये कई बार आश्चर्य हो सकता है, जैसा की यहाँ पर हुआ था, कि 'लाल कनेर के फूल और लालटेन वाली नाव' शीर्षक एक साहित्यकार के मन में कैसे रुचिकर विचार ला सकता है।

साहित्यिक डायरी भाग में भारती जी की रचनाओं में सरकारों के प्रति निराशा साफ़ झलकती है। 'राज्य और रंगमंच' में उन्होंने दिखाया है कि किस तरह से नौकरशाही के हाथ में रंगमंच की कमान दिए जाने के पश्चात रंगमंच की गुणवत्ता को छोड़कर सिर्फ नाटक के आसान होने को नौकरशाही द्वारा अच्छा माना जा रहा है। ऐसी ही उन्होंने एक चर्चा का उदाहरण दिया है जिसमें पंत जी स्वयं मौज़ूद थे। भारती जी ने समकालीन समालोचकों द्वारा विद्रोही स्वाभाव वाले साहित्यिकों की आलोचना का विरोध किया है। समालोचकों की नज़र में साहित्यकारों का वह वर्ग, जो कविता और उपन्यास में बने हुये ढर्रे पर नहीं चलता है, साहित्य में सुंदरता का ध्यान नहीं रखता है, बल्कि जो है उसे यथार्थ रूप में पेश करता है और अपने ढंग से जीवन की व्याख्या करने का दावा करता है और जिनके मन में यह काव्य-प्रकृति नास्तिकता पर आधारित है, उसको अनास्थावान करार दे दिया गया है। भारती जी ने ऐसी किसी भी सोच का विरोध किया है।

व्यंग भाग में प्रस्तुत रचनाओं में कुछ रचनायें गहरे कटाक्ष को लिये हुये हैं। 'यू. एन. ओ. में हिंदी पर मुक़दमा' में एक बात प्रकट करने की कोशिश की गई है। जब यह कहा जाता है कि हिंदी और उर्दू भाषायें एक ही भाषा हैं और उसे हिंदुस्तानी कहा जाना चाहिये, तब यह बहुत आसानी से भुला दिया जाता है कि यहाँ पर बात सिर्फ खड़ी बोली की हो रही है। हिंदी की बहुत सी बोलियाँ हैं जिन पर उर्दू का व्यापक प्रभाव नहीं पड़ा है और उनका विकास काफी हद तक स्वतंत्रतापूर्वक हुआ है। समकालीन सुर्ख़ियों को विषय बनाकर लिखे गए व्यंग भी अच्छे लगे हैं जैसे 'डाकखाना मेघदूत : शहर दिल्ली।' भारती जी का प्रकृति प्रेम 'ठेले पर हिमालय' की रचनाओं में देखा जा सकता है। भारती जी ने जिस विधा को छुआ उसे एक चमक प्रदान की। आज इनमें से बहुत सी विधायें विलुप्तप्राय हो चली हैं।

http://www.yayawar.in/2016/07/book-re...
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