हरिशंकर परसाई उन व्यंग्यकार लेखकों में से हैं जिनके बिना हिन्दी के आधुनिक व्यंग्य लेखन की प्रतिष्ठा सम्भव नहीं होती । उनके व्यंग्य लेखन ने हमारे समाज की तकलीफों को उजागर करने के साथ-साथ मानवीय सहानुभूति, संवेदना और करुणा को भी रेखांकित किया है । वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ऐसा व्यंग्य लिख पाना दुर्लभ है । हरिशंकर परसाई विचारक और चिन्तक भी हैं । एक प्रखर सामाजिक चेतना और सघन आन्तरिक उनके वैचारिक लेखन की विशिष्ट पहचान है । उनका गम्भीर लेखन अपने आसपास के जाने-अनजाने सत्य को बहुत बारीक तथ्य से अभिव्यक्त करता है । 'ऐसा भी सोचा जाता है' में संकलित परसाई जी के गम्भीर वैचारिक लेखों में राजनीतिक,सांस्कृतिक, साहित्यिक और सामाजिक विषय-सन्दर्भों पर महत्वपूर्ण विचार-चिन्तन है, जिनमें आज के आम आदमी की पीड़ा और संघर्षशीलता के कई आयामों से पाठकों का साक्षात्कार होता है । कहने की जरूरत नहीं है कि 'परसाई' और 'व्यंग्य' तो एक-दूसरे के पर्याय हैं ।