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Sunil #58

चोर सिपाही

जुगल ने जब एक निर्दोष, और हालात की शिकार खूबसूरत नौजवान लड़की की मदद करने की ठानी थी तो उसे नहीं पता था कि स्मगलिंग के कारोबार में माल पहले किसी उस जैसे अनजान, निर्दोष व्यक्ति के मत्थे मढ़ देना और फिर डेंजर जोन से गुजर जाने के बाद वापिस हथिया लेना आम बात हो गयी है । और जब उसे इस बात का अहसास हुआ तो बहुत देर हो चुकी थी और अब उसे आसरा था तो सिर्फ ब्लास्ट के स्पेशल कोरसपोंडेंट सुनील चक्रवर्ती का ।

Mass Market Paperback

First published November 1, 1975

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About the author

Surender Mohan Pathak

335 books398 followers
Surender Mohan Pathak, is an author of Hindi-language crime fiction with 314 books to his credit. His major characters are Crime reporter Sunil (unprecedented 123 Titles), Vimal (46 Titles) and Philosopher Detective Sudhir (23 titles). Apart from series, he has written 60+ Novels in thriller category.

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2 (3%)
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Profile Image for Rajan.
637 reviews43 followers
April 7, 2021
“सवाल ही नहीं पैदा होता । ‘ब्लास्ट’ का सुनील कुमार चक्रवर्ती नाम का एक स्पेशल कारस्पान्डेन्ट मेरा पतलूनिया यार है ?” “पतलूनिया यार !” “हां । आजकल तो बच्चा भी लंगोटी नहीं बांधता और फिर मेरी उसकी यारी पतलून पहनने की उम्र से आरम्भ हुई थी ।” “ओह !” “अगर सुनील को तुम्हारी कहानी पर यकीन आ गया तो कोई वजह ही नहीं कि मुरारी काटन मिल के मालिकों का सारा कच्चा चिट्ठा ‘ब्लास्ट’ में न छपे ।” “यकीन न आने की भी कोई वजह नहीं है । मेरे पास अपनी हर बात सिद्घ करने के लिए अकाट्य प्रमाण हैं ।” “ठीक है । मैं कल सुबह की फ्लाइट से यहां से रवाना हो रहा हूं । तुम भी मेरे साथ राजनगर चलो ।” “क्या मेरा जाना जरूरी है ?” “तुम्हारे जाये बिना कैसे काम चलेगा ?” “मेरा मतलब है आप कागजात से भरा यह ब्रीफकेस अपने साथ ले जाईये । मैं वहां जाकर क्या करूंगी !” “अव्वल तो सुनील सारी कहानी तुम्हारी जुबानी सुनना चाहेगा और फिर यहां जब तुम अकेली रह जाओगी तो क्या तांतिया तुम्हारा धड़नतख्ता नहीं कर देगा ?” “लेकिन... लेकिन मेरे पास प्लेन का टिकट खरीदने के लिये पैसे नहीं है ।” “मैं क्या मर गया हूं ?” - बन्दर फुंफकार कर यूं बोला जैसे ज्योति को बरसों से जानता हो । “लेकिन...” “क्या लेकिन ?” “फिर भी...” “क्या फिर भी ? देखो मुझे ऐसी नानटैक्नोब्लास्टिक बातें पसन्द नहीं ।” “नानटैक्नो... टैक्नो...?” “ब्लास्टिक बातें ।” “वे क्या होती हैं ?” “जो तुम इस वक्त कर रही हो या करने की कोशिश कर रही हो । फौरन ट्यून बदलो, नहीं तो मैं रूठ जाऊंगा ।” “तांतिया की मौजदूगी में कल मुझे होटल से बाहर कैसे निकालोगे ?” - ज्योति धीरे से बोली । “कल की फिक्र कल । फिलहाल तुम यह बताओ कि कल तुम मेरे साथ राजनगर चल रही हो न ?” “आपने प्लेन में अपनी सीट बुक करवाई हुई है ?” “हां ।” “मेरी सीट का क्या होगा ?” “उसका मैं अभी इन्तजाम करता हूं । मैं अभी आया । तुम दरवाजा भीतर से बन्द कर लो और पहले की तरह पूर्वनिर्धारित ढंग से दरवाजा खटखटाये जाने के बाद ही दरवाजा खोलना ।” ज्योति ने सहमतिसूचक ढंग से सिर हिला दिया । बन्दर फिर कमरे से बाहर निकल गया । होटल में इण्डियन एयरलाइन्स का चौबीस घंटे खुला रहने वाला बुकिंग आफिस था । सौभाग्यवश कल सुबह की राजनगर की फ्लाइट में अभी सीटें उपलब्ध थीं । बन्दर ने ज्योति के लिये एक टिकट खरीद ली । उसने रिसेप्शन से एक कोरा कागज लेकर उस पर सुनील का पता और यह संदेश लिखा: 18 को फ्लाइट नम्बर 442 से राजनगर पहुंच रहा हूं । साथ में ऐसी ऐन्टीफ्लोजिस्टीन लड़की ला रहा हूं कि देखते ही हास्पिटल केस बन जाओगे । एयरपोर्ट पर मिलो । तुम्हारे मतलब की बात है । जुगल उसने वह कागज रिसेप्शानिस्ट को यह कह कर सौंप दिया कि वह सन्देश फोनोग्राम की सूरत में राजनगर भिजवा दिया जाये । वह वापिस अपने कमरे की ओर लौट पड़ा । उसे विश्वास था कि तांतिया और उसके साथियों को यह नहीं सूझेगा कि ज्योति हवाई जहाज द्वारा मुम्बई से बाहर जाने की कोशिश करेगी । वे कभी नहीं सोच पायेंगे कि ज्योति के स्तर की लड़की हवाई जहाज से सफर की बात सोचेगी ।






Bandar aka Jugal Kishore is a weird character. Any girl can fool him. The story starts with Bandar and Jyoti in Bombay and ends with a diamond heist in Rajnagar.

A fast paced thriller. Rare novel of Sunil which doesn't have a murder mystery.
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