What do you think?


Sunil #63
नया दिन नयी लाश
वो एक वहशी दरिन्दा था । पहले जब वो फौज में था तो भी एक मनोवैज्ञानिक केस माना जाता था जिसे कि एकाएक वहशत का दौरा पड़ जाता था । वो कई खूबसूरत नौजवान लड़कियों की नृशंस हत्याओं के लिये जिम्मेदार ठहराया भी चुका था । अब वो फरार था तो क्या नया दिन नयी लाश का सिलसिला फिर शुरू होने वाला था ?
Mass Market Paperback
First published February 1, 1977
About the author
Surender Mohan Pathak
335 books398 followersSurender Mohan Pathak, is an author of Hindi-language crime fiction with 314 books to his credit. His major characters are Crime reporter Sunil (unprecedented 123 Titles), Vimal (46 Titles) and Philosopher Detective Sudhir (23 titles). Apart from series, he has written 60+ Novels in thriller category.
Ratings & Reviews
Friends & Following
Create a free account to discover what your friends think of this book!
Community Reviews
Displaying 1 - 1 of 1 review
May 16, 2021
Reminds of Kajol and Bobby Deol starrer "Gupt".
This is a fast paced thriller. SMP has written few serial killer novels and this is one of the best.
Psychopaths are mentally disturbed people who love to kill just for fun. This is the story of one such killer.
RAJEEV Mathur is convicted of killing many women in gruesome manner. When he escaped from prison only two people thought that he was innocent. His sister Malti and Sunil. However after his escape murders started again.
Can Sunil prove his innocence before it is too late?
This is a fast paced thriller which doesn't let the tempo down right from first page. This one is unputdownable.
The climax is also fitting and there were many clues given.
“फालतू बातें छोड़ो । वह वहशी दरिन्दा आजाद हो गया है ।” “तो मैं क्या करूं ?” “तुम क्या करो ? अरे, उसकी कोई खोज- खबर निकालो ।”
“मैं खोज- खबर निकालूं ? यह तो पुलिस का काम है ।” “बकवात मत करो ।” “अगर वह आजाद हो गया है तो आफत क्या आ गई ? इतनी हाय- हाय किसलिए ?” “और मजाक भी मत करो । इस नगर में तुम्हारी कोई बहन- बेटी होती और वह सैक्स मैनियाक, वह वहशी दरिन्दा आजाद होता तो तुम्हें कैसा लगता ?”
“क्या पता कैसा लगता !” - सुनील विनोदपूर्ण स्वर में बोला - “तुमने जो मिसाल दी है, वह सारी- की- सारी ही गलत है । मेरी कोई बहन नहीं, मेरी कोई बेटी नहीं, यह सोचने की कोई बुनियाद नहीं कि वह इस वक्त राजनगर में मौजूद है और सबसे बड़ी बात यह है कि तुम्हें इस बात का कतई कोई अफसोस नहीं है कि वह वहशी दरिन्दा आजाद हो गया है । उलटे तुम तो खुश हो रहे हो कि बैठे- बिठाये ‘ब्लास्ट’ के लिए एक सनसनीखेज खबर का सामान हो गया ।” राय ने बेचैनी से पहलू बदला ।
“तुम्हें किसी इन्सान की जाती ट्रेजेडी, उसके दुख, तकलीफ से कोई लगाव नहीं । तुम्हें तो मतलब है उन हालात से हासिल होने वाली कॉपी से । चटपटी खबर से । मेरा दावा है कि अगर तुम्हें यह खबर लगे कि उसने आजाद होते ही और तीन- चार नौजवान लड़कियों को बड़े ही वीभत्स ढंग से कत्ल कर डाला है या उसका भाग निकलने का उपक्रम विफल करने के लिए पुलिस ने उसे गोली मार दी है तो तुम और भी खुश होओगे।”
..........
“जरा होश सम्भालिये ।” - वह कठोर स्वर में बोला - “अच्छे डाक्टर हैं, आप ।” जगन्नाथ के होंठ लेकिन मुंह से बोल न फूटा । “ये डेन्टिस्ट हैं ।” - सुनील ने बताया - “दांतों के डाक्टर ।”
“मैं नहीं देखना चाहता ।” - जगन्नाथ कंपित स्वर में बोला । “क्या नहीं देखना चाहते आप ?” - प्रभूदयाल ने उसे घूरते हुए पूछा । “स्वर्णलता की लाश ।” “आपको यह किसने कहा कि आपकी यहां स्वर्णलता की लाश दिखाने के लिए लाया गया है ?” “नहीं कहा । लेकिन मुझे मालूम है । मैं लाश नहीं देखना चाहता ।”
“कैसे मालूम है ?” “आप बताइये इस चादर के नीचे उसकी लाश है या नहीं ?” “लेकिन आपने कैसे जाना ?” “मुझे ऐसी यातना मत दो । साफ-साफ बताओ ।” “खुद ही देख लो ।” - प्रभूदयाल बोला और एकाएक उसने स्ट्रेचर पर से चादर खींच ली ।
सुनील ने देखा लाश के कटे हुए विभिन्न अंगों को यथास्थान जोड़-जोड़कर स्ट्रेचर पर रख दिया गया था । बड़ा हौलनाक दृश्य था । जगन्नाथ उस ओर आंख भी नहीं उठा रहा था ।
“देखो !” - प्रभूदयाल ने आदेश दिया । जगन्नाथ पत्ते की तरह कांपने लगा । आसार ऐसे ही लग रहे थे कि वह किसी भी क्षण चेतना खो बैठेगा । “सुना नहीं तुमने ?” - प्रभूदयाल गर्जा - “लाश की तरफ देखो ।” जगन्नाथ ने सिर भी नहीं उठाया ।
This is a fast paced thriller. SMP has written few serial killer novels and this is one of the best.
Psychopaths are mentally disturbed people who love to kill just for fun. This is the story of one such killer.
RAJEEV Mathur is convicted of killing many women in gruesome manner. When he escaped from prison only two people thought that he was innocent. His sister Malti and Sunil. However after his escape murders started again.
Can Sunil prove his innocence before it is too late?
This is a fast paced thriller which doesn't let the tempo down right from first page. This one is unputdownable.
The climax is also fitting and there were many clues given.
“फालतू बातें छोड़ो । वह वहशी दरिन्दा आजाद हो गया है ।” “तो मैं क्या करूं ?” “तुम क्या करो ? अरे, उसकी कोई खोज- खबर निकालो ।”
“मैं खोज- खबर निकालूं ? यह तो पुलिस का काम है ।” “बकवात मत करो ।” “अगर वह आजाद हो गया है तो आफत क्या आ गई ? इतनी हाय- हाय किसलिए ?” “और मजाक भी मत करो । इस नगर में तुम्हारी कोई बहन- बेटी होती और वह सैक्स मैनियाक, वह वहशी दरिन्दा आजाद होता तो तुम्हें कैसा लगता ?”
“क्या पता कैसा लगता !” - सुनील विनोदपूर्ण स्वर में बोला - “तुमने जो मिसाल दी है, वह सारी- की- सारी ही गलत है । मेरी कोई बहन नहीं, मेरी कोई बेटी नहीं, यह सोचने की कोई बुनियाद नहीं कि वह इस वक्त राजनगर में मौजूद है और सबसे बड़ी बात यह है कि तुम्हें इस बात का कतई कोई अफसोस नहीं है कि वह वहशी दरिन्दा आजाद हो गया है । उलटे तुम तो खुश हो रहे हो कि बैठे- बिठाये ‘ब्लास्ट’ के लिए एक सनसनीखेज खबर का सामान हो गया ।” राय ने बेचैनी से पहलू बदला ।
“तुम्हें किसी इन्सान की जाती ट्रेजेडी, उसके दुख, तकलीफ से कोई लगाव नहीं । तुम्हें तो मतलब है उन हालात से हासिल होने वाली कॉपी से । चटपटी खबर से । मेरा दावा है कि अगर तुम्हें यह खबर लगे कि उसने आजाद होते ही और तीन- चार नौजवान लड़कियों को बड़े ही वीभत्स ढंग से कत्ल कर डाला है या उसका भाग निकलने का उपक्रम विफल करने के लिए पुलिस ने उसे गोली मार दी है तो तुम और भी खुश होओगे।”
..........
“जरा होश सम्भालिये ।” - वह कठोर स्वर में बोला - “अच्छे डाक्टर हैं, आप ।” जगन्नाथ के होंठ लेकिन मुंह से बोल न फूटा । “ये डेन्टिस्ट हैं ।” - सुनील ने बताया - “दांतों के डाक्टर ।”
“मैं नहीं देखना चाहता ।” - जगन्नाथ कंपित स्वर में बोला । “क्या नहीं देखना चाहते आप ?” - प्रभूदयाल ने उसे घूरते हुए पूछा । “स्वर्णलता की लाश ।” “आपको यह किसने कहा कि आपकी यहां स्वर्णलता की लाश दिखाने के लिए लाया गया है ?” “नहीं कहा । लेकिन मुझे मालूम है । मैं लाश नहीं देखना चाहता ।”
“कैसे मालूम है ?” “आप बताइये इस चादर के नीचे उसकी लाश है या नहीं ?” “लेकिन आपने कैसे जाना ?” “मुझे ऐसी यातना मत दो । साफ-साफ बताओ ।” “खुद ही देख लो ।” - प्रभूदयाल बोला और एकाएक उसने स्ट्रेचर पर से चादर खींच ली ।
सुनील ने देखा लाश के कटे हुए विभिन्न अंगों को यथास्थान जोड़-जोड़कर स्ट्रेचर पर रख दिया गया था । बड़ा हौलनाक दृश्य था । जगन्नाथ उस ओर आंख भी नहीं उठा रहा था ।
“देखो !” - प्रभूदयाल ने आदेश दिया । जगन्नाथ पत्ते की तरह कांपने लगा । आसार ऐसे ही लग रहे थे कि वह किसी भी क्षण चेतना खो बैठेगा । “सुना नहीं तुमने ?” - प्रभूदयाल गर्जा - “लाश की तरफ देखो ।” जगन्नाथ ने सिर भी नहीं उठाया ।
Displaying 1 - 1 of 1 review


