What do you think?


Sunil #77
अनोखी चाल
अपने अखबार के दोस्त की एक बेटी को ड्रग्स की लत से बचाने के लिये सुनील ने जब शहर में पूछताछ शुरू की तो जैसे कुछ लोग ना सिर्फ उसके बल्कि पूरे ब्लास्ट के दुश्मन बन गये । और फिर दुश्मन ने एक ऐसी अनोखी चाल चली कि सुनील को फांसी का फंदा साक्षात अपने सामने लहराता दिखाई देने लगा ।
Mass Market Paperback
First published September 1, 1979
About the author
Surender Mohan Pathak
335 books398 followersSurender Mohan Pathak, is an author of Hindi-language crime fiction with 314 books to his credit. His major characters are Crime reporter Sunil (unprecedented 123 Titles), Vimal (46 Titles) and Philosopher Detective Sudhir (23 titles). Apart from series, he has written 60+ Novels in thriller category.
Ratings & Reviews
Friends & Following
Create a free account to discover what your friends think of this book!
Community Reviews
Displaying 1 - 2 of 2 reviews
March 21, 2021
5/5
In this rare book Sunil comes across Kala Pahad aka Raj bahadur Bakhia. Although They never meet fave to face and Kala Pahad never shows up in person. Still Bakhia has strong presence in novel.
It is more a thriller and less a whodunit. Though climax felt incomplete without explaining what Kala Pahad did ultimately. Maybe covered in some other book.
“यह कहता है कि यह नहीं हो सकता कि जिस गोली से एलबर्ट की जान गई थी वह अट्ठारह या बीस इंच की दूरी से चली हो ।” “मेरी रिपोर्ट गलत नहीं हो सकती ।” - अग्निहोत्री दृढ स्वर में बोला । “शायद आपसे कोई गलती हुई हो !” - सुनील बोला । “नामुमकिन । सवाल ही नहीं पैदा होता । इस धन्धे में मेरे बाल सफेद हो गये हैं बरखुरदार । अगर आज तक गलती नहीं हुई तो अब कैसे हुई होगी ।” “आप इस नतीजे पर कैसे पहुंचे कि गोली अट्ठारह या बीस इंच के फासले से चलाई गई थी ?” “बड़े साइंटिफिक तरीके से ।” “क्या मैं उसके बारे में कुछ सुन सकता हूं ?”
“सुनो” - अग्निहोत्री एकाएक यूं बोलने लगा जैसे लैक्चर थियेटर में क्लास ले रहा हो - “किसी आदमी को गोली लगने के समय रिवाल्वर उससे कितनी दूर थी, इस बात की जानकारी वैज्ञानिक तरीकों से हासिल की जा सकती है । जिसको गोली लगती है उस पर गोली के साथ रिवाल्वर में से निकले बारूद के कण भी छिटकते हैं । वे कण हत्प्राण की गोली के जख्म के आसपास की खाल पर और उसके कपड़ों पर एक पैट्रन- सा बना देते हैं । जब गोली चलती है तो बारूद के कुछ कण तो तुरन्त पिघलकर गैस बन जाते हैं और वातावरण में अपनी गन्ध फैलाते हुए गायब हो जाते हैं लेकिन बाकी सारे कण, जो जलकर गैस नहीं बन पाते, हथियार की नाल में से एक बौछार की सूरत में निकलते हैं । उस बौछार के बिखरने का एक स्वाभाविक पैट्रन होता है । गोली का शिकार जितना उस बौछार के करीब होगा उतने ही बारूद के कण उस पर ज्यादा बिखरेंगे और जितना वह उस बौछार से दूर होगा उतने ही कम बारूद के कण उसके शरीर पर पाये जायेंगे । उस पैट्रन को स्टडी करके हम बड़ी आसानी से यह बता सकते हैं कि जब गोली चली थी, उस वक्त हथियार की नाल हत्प्राण से कितनी दूर थी ।” “कैसे ?” - सुनील ने पूछा - “उसके कपड़ों पर बिखरे बारूद के कण देखकर ?”
“वे कण अगर बहुत ढेर सारे हों तो कपड़ों पर बिखरे दिखाई दे जाती हैं ।” - अग्निहोत्री बोला - “बहुत कम हों तो आंखों से दिखाई नहीं देते । लेकिन दोनों ही हालतों में हम करते यह हैं कि हम उस परिधान को जिस पर कि बारूद के कण छितरे होते हैं एक इस्त्री करने वाले बोर्ड पर फैला देते हैं । उस परिधान के नीचे हम एक विशेष प्रकार के फोटोग्राफिक पेपर की शीट लगा देते हैं । फिर एक विशेष प्रकार के रसायन में भीगा हुआ एक ब्लाटिंग पेपर हम परिधान के ऊपर उस स्थान पर रख देते हैं जहां हमें बारूद के कण बिखरे होने का अन्दाजा होता है । उसके बाद भीगे हुए ब्लाटिंग पेपर पर एक गर्म इस्त्री चलाई जाती है । इस्त्री की गर्मी से ब्लाटिंग पेपर में मौजूद रसायन पदार्थ भाप बन जाता है । वह भाप बारूद के कणों तक पहुंचती है तो एक रासायनिक प्रक्रिया हो जाती है । फिर उस रासायनिक प्रक्रिया का परिणाम परिधान के नीचे मौजूद फोटोग्राफिक पेपर की शीट पर एक ऐसे पैट्रन के रूप में अंकित हो जाता है जिससे कोई भी तजुर्बेकार बैलेस्टिक एक्सपर्ट यह नतीजा निकाल सकता है कि गोली कितने फासले से चली ।”
In this rare book Sunil comes across Kala Pahad aka Raj bahadur Bakhia. Although They never meet fave to face and Kala Pahad never shows up in person. Still Bakhia has strong presence in novel.
It is more a thriller and less a whodunit. Though climax felt incomplete without explaining what Kala Pahad did ultimately. Maybe covered in some other book.
“यह कहता है कि यह नहीं हो सकता कि जिस गोली से एलबर्ट की जान गई थी वह अट्ठारह या बीस इंच की दूरी से चली हो ।” “मेरी रिपोर्ट गलत नहीं हो सकती ।” - अग्निहोत्री दृढ स्वर में बोला । “शायद आपसे कोई गलती हुई हो !” - सुनील बोला । “नामुमकिन । सवाल ही नहीं पैदा होता । इस धन्धे में मेरे बाल सफेद हो गये हैं बरखुरदार । अगर आज तक गलती नहीं हुई तो अब कैसे हुई होगी ।” “आप इस नतीजे पर कैसे पहुंचे कि गोली अट्ठारह या बीस इंच के फासले से चलाई गई थी ?” “बड़े साइंटिफिक तरीके से ।” “क्या मैं उसके बारे में कुछ सुन सकता हूं ?”
“सुनो” - अग्निहोत्री एकाएक यूं बोलने लगा जैसे लैक्चर थियेटर में क्लास ले रहा हो - “किसी आदमी को गोली लगने के समय रिवाल्वर उससे कितनी दूर थी, इस बात की जानकारी वैज्ञानिक तरीकों से हासिल की जा सकती है । जिसको गोली लगती है उस पर गोली के साथ रिवाल्वर में से निकले बारूद के कण भी छिटकते हैं । वे कण हत्प्राण की गोली के जख्म के आसपास की खाल पर और उसके कपड़ों पर एक पैट्रन- सा बना देते हैं । जब गोली चलती है तो बारूद के कुछ कण तो तुरन्त पिघलकर गैस बन जाते हैं और वातावरण में अपनी गन्ध फैलाते हुए गायब हो जाते हैं लेकिन बाकी सारे कण, जो जलकर गैस नहीं बन पाते, हथियार की नाल में से एक बौछार की सूरत में निकलते हैं । उस बौछार के बिखरने का एक स्वाभाविक पैट्रन होता है । गोली का शिकार जितना उस बौछार के करीब होगा उतने ही बारूद के कण उस पर ज्यादा बिखरेंगे और जितना वह उस बौछार से दूर होगा उतने ही कम बारूद के कण उसके शरीर पर पाये जायेंगे । उस पैट्रन को स्टडी करके हम बड़ी आसानी से यह बता सकते हैं कि जब गोली चली थी, उस वक्त हथियार की नाल हत्प्राण से कितनी दूर थी ।” “कैसे ?” - सुनील ने पूछा - “उसके कपड़ों पर बिखरे बारूद के कण देखकर ?”
“वे कण अगर बहुत ढेर सारे हों तो कपड़ों पर बिखरे दिखाई दे जाती हैं ।” - अग्निहोत्री बोला - “बहुत कम हों तो आंखों से दिखाई नहीं देते । लेकिन दोनों ही हालतों में हम करते यह हैं कि हम उस परिधान को जिस पर कि बारूद के कण छितरे होते हैं एक इस्त्री करने वाले बोर्ड पर फैला देते हैं । उस परिधान के नीचे हम एक विशेष प्रकार के फोटोग्राफिक पेपर की शीट लगा देते हैं । फिर एक विशेष प्रकार के रसायन में भीगा हुआ एक ब्लाटिंग पेपर हम परिधान के ऊपर उस स्थान पर रख देते हैं जहां हमें बारूद के कण बिखरे होने का अन्दाजा होता है । उसके बाद भीगे हुए ब्लाटिंग पेपर पर एक गर्म इस्त्री चलाई जाती है । इस्त्री की गर्मी से ब्लाटिंग पेपर में मौजूद रसायन पदार्थ भाप बन जाता है । वह भाप बारूद के कणों तक पहुंचती है तो एक रासायनिक प्रक्रिया हो जाती है । फिर उस रासायनिक प्रक्रिया का परिणाम परिधान के नीचे मौजूद फोटोग्राफिक पेपर की शीट पर एक ऐसे पैट्रन के रूप में अंकित हो जाता है जिससे कोई भी तजुर्बेकार बैलेस्टिक एक्सपर्ट यह नतीजा निकाल सकता है कि गोली कितने फासले से चली ।”
August 23, 2013
This time Sunil is in a fix. He’s wanted in a double murder case and all things point towards him. Is he really the culprit as he is made out to be ? If not how will he come out of it? Another gem from the pen of great Pathak saheb.
Displaying 1 - 2 of 2 reviews



