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Sunil #98
कानून का चेलेंज
सुनील के सामने चैलेन्ज था कानून का असम्भव को सम्भव कर दिखाने का, एक ऐसे मुजरिम को बेगुनाह साबित कर दिखाने का जिसके खिलाफ न सिर्फ एक एयरटाईट केस था, बल्कि जो खुद अपनी जुबानी खुद को गुनहगार तसलीम कर चुका था ! क्या सुनील उस चैलेन्ज पे खरा उतर पाया ?
Mass Market Paperback
First published August 1, 1990
About the author
Surender Mohan Pathak
335 books398 followersSurender Mohan Pathak, is an author of Hindi-language crime fiction with 314 books to his credit. His major characters are Crime reporter Sunil (unprecedented 123 Titles), Vimal (46 Titles) and Philosopher Detective Sudhir (23 titles). Apart from series, he has written 60+ Novels in thriller category.
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Displaying 1 - 3 of 3 reviews
October 18, 2013
कानून का चैलेंज
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कहते हैं की अगर इंसान मन में ठान ले और अपने आप को आत्मविश्वास से भर ले तो, वह असंभव से असंभव कार्य को भी संभव बना सकता है| ब्लास्ट के चीफ क्राइम रिपोर्टर सुनील कुमार चक्रवर्ती को भी ऐसा ही एक असंभव कार्य को संभव में तब्दील करने का चैलेंज मिला था| चैलेंज-कर्ता, कोई और नहीं सुनील का ज़माने से प्रतिद्वंदी रहा इंस्पेक्टर प्रभुदयाल था| यह एक ऐसा चैलेंज था जिसमे सुनील को गजेन्द्र सिक्का नाम के एक नवयुवक को प्रेमचंद ओसवाल नामक बैंक अधिकारी के क़त्ल के इलज़ाम में गिरफ्तार किया गया था|
गजेन्द्र सिक्का, प्रेमचंद ओसवाल की बेटी शोभना से शादी करना चाहता था और इस बाबत प्रेमचंद ओसवाल से मिलने झेरी से राजनगर आया था| शोभना ने गजेन्द्र के आगमन की खबर पत्र द्वारा अपने पिता को दे दिया था| गजेन्द्र सिक्का के अनुसार प्रेमचंद ओसवाल ने उसका स्वागत किया, फिर इधर उधर की कुछ बातें की| कुछ समय पश्चात प्रेमचंद ओसवाल ने गजेन्द्र सिक्का को ड्रिंक ऑफर किया और उसके दो सिप पीने के बाद गजेन्द्र सिक्का के ऊपर बेहोशी छाने लगी|
होश आने के पश्चात उसने प्रेमचंद ओसवाल को उस तीर से क़त्ल हुआ पाया जो उसने अपने आगमन के दौरान प्रेमचंद ओसवाल की स्टडी में सजावट के तौर पर दीवार पर टंगा पाया था| प्रेमचंद ओसवाल ने गजेन्द्र को बताया था की यह तीर उसके द्वारा तीरंदाजी के एथलेटिक्स में जीते गए वर्ष को प्रदर्शित करता है| गजेन्द्र सिक्का ने देखा था की जो व्हिस्की की बोतल खुली थी अब पूरी तरह से सील पैक थी| जिस गिलास में सिक्का ने व्हिस्की पिया था वो खाली था और स्टडी का दरवाजा अन्दर से बंद था|
पुलिस ने गजेन्द्र सिक्का को सविता खुराना (प्रेमचंद ओसवाल की विश्वसनीय सेक्रेटरी), परमेश्वर (प्रेमचंद ओसवाल का वफादार नौकर) और दसरथ प्रसाद शुक्ल (प्रेमचंद ओसवाल के पडोसी) के इस बयान पर गिरफ्तार किया था की उन्होंने सिक्का को ओसवाल की स्टडी से अकेले निकलते देखा था, जिसमे प्रेमचंद ओसवाल की लाश पायी गयी थी| पुलिस ने गजेन्द्र सिक्का के मैकिनटोश (एक प्रकार का कोट) से एक रिवाल्वर भी तलाश किया था जिसने गजेन्द्र के इरादतन क़त्ल करने वाली बात को मजबूती प्रदान की|
सुनील को इंस्पेक्टर प्रभुदयाल ने चैलेंज दिया था की अगर वह अपने आप को बहुत बड़ा तीसमारखां समझता है तो इस एयरटाइट केस को पंचर करके दिखाए| इंस्पेक्टर प्रभुदयाल ने सुनील को इस केस में पूरी सहायता देने का आश्वासन दिया था| सुनील ने इस “कानून का चैलेंज” को गजेन्द्र सिक्का से बात करने बाद स्वीकार भी कर लिया| सुनील को गजेन्द्र सिक्का की बात पर भरोसा हो गया था की वह बेगुनाह है|
सुनील ने अपनी तहकीकात शुरू कर दी थी, इसमें रमाकांत भी सुनील का भरपूर साथ दे रहा था| सभी गवाहों से बात करने के पश्चात भी सुनील को कोई सुराग नहीं मिल पा रहा था| लेकिन उसने इस असंभव काम को संभव कर लेने का जो चैलेंज स्वीकार किया था इसलिए उसने आखिरी दम तक हार नहीं मानी|
सर सुरेन्द्र मोहन पाठक साहब के कलम से निकला ११७ वां शाहकार और सुनील का ९८ वां रोमांच भरा सफ़र-नामा “कानून का चैलेंज” भी एक ऐसा ही उपन्यास है जिसे “मीना मर्डर केस” सरीखे उपन्यासों के करीब तो रखा ही जा सकता है| “कानून का चैलेंज” एक ऐसा उपन्यास है जिसमे “Who Done it?” और “How Done it?”, दोनों ही मसाले हैं जो क्राइम-फिक्शन उपन्यासों की लोकप्रियता के लिए जरूरी होते हैं|
जहाँ तक मैंने पाठक साहब के उपन्यासों को पढ़ा है और उसे पढ़ कर परखा है (हालाँकि इस मामले में मैं अभी बच्चा ही हूँ), उससे यही जाना है की पाठक साहब सीधा अपने पाठकों की नब्ज पकड़ते हैं| अगर आपने क्राइम-थ्रिलर-फिक्शन नावेल पढ़ा है और आपने गलती से पाठक साहब के उपन्यास को पढ़ लिया तो इस गलती की सजा आपको यह मिलेगी की, आप पाठक साहब के उपन्यासों के अलावा किसी और लेखक के उपन्यास में वह मजा नहीं खोज पायेंगे जो पाठक साहब के उपन्यासों में आएगा|
इंस्पेक्टर प्रभुदयाल का चैलेंज, सुनील की नाक की खोजी सूंघ और रहस्यों और रोमांचों से भरी यह कहानी, सुनील, इंस्पेक्टर प्रभुदयाल, रमाकांत, गजेन्द्र सिक्का और प्रेमचंद ओसवाल के घर के सदस्यों के आस-पास घुमती है| सुनील को तो एक समय ऐसा लगता है की वह चैलेंज को कभी पूरा नहीं कर पायेगा लेकिन वह अपने अन्दर के आत्मविश्वास को समाप्त नहीं होने देता|
एक आदि से लेकर अंत तक रोमाच से भरपूर कहानी, आपको इस उपन्यास से चिपके रहने पर मजबूर कर देती है| आप देखेंगे की कैसे सुनील परत दर परत तहकीकात करते हुए, असली अपराधी तक पहुँचता है| सुनील का सच के लिए लड़ना, मजलूमों और बेगुनाहों को इन्साफ दिलाना, आपको भावुक होने पर मजबूर भी कर देगा| दोस्तों, यह उपन्यास सच में मकड़ी के जाले की तरह बुनी हुई है जिसे आसानी से सुलझाना सिर्फ और सिर्फ सुनील कुमार चक्रवर्ती के बस की बात है|
कहानी आरम्भ से ही तेज़ रफ़्तार के स्केल पर चलती है और अंत तक भी इसी दर से समाप्त होती है| पाठक साहब ने कहानी में कई ऐसे ट्विस्ट डाले हैं जो आपको अचंभित भी कर देंगे| पाठक साहब जितना अपनी कहानी को सत्यता के करीब रखते हैं उतना किसी और लेखक के उपन्यास में देखने को नहीं मिलेगा| पाठक साहब सिर्फ कोरी कल्पना से ही उपन्यास नहीं लिखते बल्कि उसे सत्यता और विश्वसनीयता के करीब भी रखते हैं| पाठक साहब अपनी कहानियों में वास्तविकता को इतना करीब रखते हैं की पाठकों को यह लग ही नहीं पाता है की इसमें कल्पना का इस्तेमाल किया गया है|
दोस्तों, अगर आपने इस उपन्यास को नहीं पढ़ा है तो जरूर पढ़िए| अगर आपको इस उपन्यास को पढ़े बहुत समय बीत गया है तो आप दुबारा पढ़ डालिए क्यूंकि इसका मजा बारम्बार पढने पर भी ख़त्म नहीं होता बल्कि बढ़ता है|
दोस्तों, कोशिश है की ऐसी समीक्षाओं के द्वारा आपके अन्दर पढने की इच्छा समाप्त नहीं हो बल्कि और बढे ही, इसलिए कई बिन्दुओं को आपके सामने नहीं रखा गया है| इन बिन्दुओं को आप आसानी से इस उपन्यास को पढ़ कर जान सकते हैं|
आभार
राजीव रोशन
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कहते हैं की अगर इंसान मन में ठान ले और अपने आप को आत्मविश्वास से भर ले तो, वह असंभव से असंभव कार्य को भी संभव बना सकता है| ब्लास्ट के चीफ क्राइम रिपोर्टर सुनील कुमार चक्रवर्ती को भी ऐसा ही एक असंभव कार्य को संभव में तब्दील करने का चैलेंज मिला था| चैलेंज-कर्ता, कोई और नहीं सुनील का ज़माने से प्रतिद्वंदी रहा इंस्पेक्टर प्रभुदयाल था| यह एक ऐसा चैलेंज था जिसमे सुनील को गजेन्द्र सिक्का नाम के एक नवयुवक को प्रेमचंद ओसवाल नामक बैंक अधिकारी के क़त्ल के इलज़ाम में गिरफ्तार किया गया था|
गजेन्द्र सिक्का, प्रेमचंद ओसवाल की बेटी शोभना से शादी करना चाहता था और इस बाबत प्रेमचंद ओसवाल से मिलने झेरी से राजनगर आया था| शोभना ने गजेन्द्र के आगमन की खबर पत्र द्वारा अपने पिता को दे दिया था| गजेन्द्र सिक्का के अनुसार प्रेमचंद ओसवाल ने उसका स्वागत किया, फिर इधर उधर की कुछ बातें की| कुछ समय पश्चात प्रेमचंद ओसवाल ने गजेन्द्र सिक्का को ड्रिंक ऑफर किया और उसके दो सिप पीने के बाद गजेन्द्र सिक्का के ऊपर बेहोशी छाने लगी|
होश आने के पश्चात उसने प्रेमचंद ओसवाल को उस तीर से क़त्ल हुआ पाया जो उसने अपने आगमन के दौरान प्रेमचंद ओसवाल की स्टडी में सजावट के तौर पर दीवार पर टंगा पाया था| प्रेमचंद ओसवाल ने गजेन्द्र को बताया था की यह तीर उसके द्वारा तीरंदाजी के एथलेटिक्स में जीते गए वर्ष को प्रदर्शित करता है| गजेन्द्र सिक्का ने देखा था की जो व्हिस्की की बोतल खुली थी अब पूरी तरह से सील पैक थी| जिस गिलास में सिक्का ने व्हिस्की पिया था वो खाली था और स्टडी का दरवाजा अन्दर से बंद था|
पुलिस ने गजेन्द्र सिक्का को सविता खुराना (प्रेमचंद ओसवाल की विश्वसनीय सेक्रेटरी), परमेश्वर (प्रेमचंद ओसवाल का वफादार नौकर) और दसरथ प्रसाद शुक्ल (प्रेमचंद ओसवाल के पडोसी) के इस बयान पर गिरफ्तार किया था की उन्होंने सिक्का को ओसवाल की स्टडी से अकेले निकलते देखा था, जिसमे प्रेमचंद ओसवाल की लाश पायी गयी थी| पुलिस ने गजेन्द्र सिक्का के मैकिनटोश (एक प्रकार का कोट) से एक रिवाल्वर भी तलाश किया था जिसने गजेन्द्र के इरादतन क़त्ल करने वाली बात को मजबूती प्रदान की|
सुनील को इंस्पेक्टर प्रभुदयाल ने चैलेंज दिया था की अगर वह अपने आप को बहुत बड़ा तीसमारखां समझता है तो इस एयरटाइट केस को पंचर करके दिखाए| इंस्पेक्टर प्रभुदयाल ने सुनील को इस केस में पूरी सहायता देने का आश्वासन दिया था| सुनील ने इस “कानून का चैलेंज” को गजेन्द्र सिक्का से बात करने बाद स्वीकार भी कर लिया| सुनील को गजेन्द्र सिक्का की बात पर भरोसा हो गया था की वह बेगुनाह है|
सुनील ने अपनी तहकीकात शुरू कर दी थी, इसमें रमाकांत भी सुनील का भरपूर साथ दे रहा था| सभी गवाहों से बात करने के पश्चात भी सुनील को कोई सुराग नहीं मिल पा रहा था| लेकिन उसने इस असंभव काम को संभव कर लेने का जो चैलेंज स्वीकार किया था इसलिए उसने आखिरी दम तक हार नहीं मानी|
सर सुरेन्द्र मोहन पाठक साहब के कलम से निकला ११७ वां शाहकार और सुनील का ९८ वां रोमांच भरा सफ़र-नामा “कानून का चैलेंज” भी एक ऐसा ही उपन्यास है जिसे “मीना मर्डर केस” सरीखे उपन्यासों के करीब तो रखा ही जा सकता है| “कानून का चैलेंज” एक ऐसा उपन्यास है जिसमे “Who Done it?” और “How Done it?”, दोनों ही मसाले हैं जो क्राइम-फिक्शन उपन्यासों की लोकप्रियता के लिए जरूरी होते हैं|
जहाँ तक मैंने पाठक साहब के उपन्यासों को पढ़ा है और उसे पढ़ कर परखा है (हालाँकि इस मामले में मैं अभी बच्चा ही हूँ), उससे यही जाना है की पाठक साहब सीधा अपने पाठकों की नब्ज पकड़ते हैं| अगर आपने क्राइम-थ्रिलर-फिक्शन नावेल पढ़ा है और आपने गलती से पाठक साहब के उपन्यास को पढ़ लिया तो इस गलती की सजा आपको यह मिलेगी की, आप पाठक साहब के उपन्यासों के अलावा किसी और लेखक के उपन्यास में वह मजा नहीं खोज पायेंगे जो पाठक साहब के उपन्यासों में आएगा|
इंस्पेक्टर प्रभुदयाल का चैलेंज, सुनील की नाक की खोजी सूंघ और रहस्यों और रोमांचों से भरी यह कहानी, सुनील, इंस्पेक्टर प्रभुदयाल, रमाकांत, गजेन्द्र सिक्का और प्रेमचंद ओसवाल के घर के सदस्यों के आस-पास घुमती है| सुनील को तो एक समय ऐसा लगता है की वह चैलेंज को कभी पूरा नहीं कर पायेगा लेकिन वह अपने अन्दर के आत्मविश्वास को समाप्त नहीं होने देता|
एक आदि से लेकर अंत तक रोमाच से भरपूर कहानी, आपको इस उपन्यास से चिपके रहने पर मजबूर कर देती है| आप देखेंगे की कैसे सुनील परत दर परत तहकीकात करते हुए, असली अपराधी तक पहुँचता है| सुनील का सच के लिए लड़ना, मजलूमों और बेगुनाहों को इन्साफ दिलाना, आपको भावुक होने पर मजबूर भी कर देगा| दोस्तों, यह उपन्यास सच में मकड़ी के जाले की तरह बुनी हुई है जिसे आसानी से सुलझाना सिर्फ और सिर्फ सुनील कुमार चक्रवर्ती के बस की बात है|
कहानी आरम्भ से ही तेज़ रफ़्तार के स्केल पर चलती है और अंत तक भी इसी दर से समाप्त होती है| पाठक साहब ने कहानी में कई ऐसे ट्विस्ट डाले हैं जो आपको अचंभित भी कर देंगे| पाठक साहब जितना अपनी कहानी को सत्यता के करीब रखते हैं उतना किसी और लेखक के उपन्यास में देखने को नहीं मिलेगा| पाठक साहब सिर्फ कोरी कल्पना से ही उपन्यास नहीं लिखते बल्कि उसे सत्यता और विश्वसनीयता के करीब भी रखते हैं| पाठक साहब अपनी कहानियों में वास्तविकता को इतना करीब रखते हैं की पाठकों को यह लग ही नहीं पाता है की इसमें कल्पना का इस्तेमाल किया गया है|
दोस्तों, अगर आपने इस उपन्यास को नहीं पढ़ा है तो जरूर पढ़िए| अगर आपको इस उपन्यास को पढ़े बहुत समय बीत गया है तो आप दुबारा पढ़ डालिए क्यूंकि इसका मजा बारम्बार पढने पर भी ख़त्म नहीं होता बल्कि बढ़ता है|
दोस्तों, कोशिश है की ऐसी समीक्षाओं के द्वारा आपके अन्दर पढने की इच्छा समाप्त नहीं हो बल्कि और बढे ही, इसलिए कई बिन्दुओं को आपके सामने नहीं रखा गया है| इन बिन्दुओं को आप आसानी से इस उपन्यास को पढ़ कर जान सकते हैं|
आभार
राजीव रोशन
August 23, 2013
Now this is what you call a real page-turner. A book that doesn't leave your hand until you finished it. The suspense is killing and pace is exhilarating. Kudos to Pathak Saab, a real 4 star.
November 29, 2022
Excellent.
पुलिस द्वारा घोषित हत्यारा जिसने खुद भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया था और सारे साक्ष्य जिसके विरुद्ध थे एवं जिसके बचने का कोई अवसर नहीं था और स्वयं इंस्पेक्टर प्रभूदयाल ने सुनील को चुनौती दी थी कि हत्यारा सिक्का का बचना असंभव था को सुनील जी तोड़ मेहनत करके पर्याप्त साक्ष्य एकत्र करके बचा लेता है। अदभुत कहानी।
पुलिस द्वारा घोषित हत्यारा जिसने खुद भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया था और सारे साक्ष्य जिसके विरुद्ध थे एवं जिसके बचने का कोई अवसर नहीं था और स्वयं इंस्पेक्टर प्रभूदयाल ने सुनील को चुनौती दी थी कि हत्यारा सिक्का का बचना असंभव था को सुनील जी तोड़ मेहनत करके पर्याप्त साक्ष्य एकत्र करके बचा लेता है। अदभुत कहानी।
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