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अमिता

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163 pages, Paperback

First published January 1, 1956

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About the author

Yashpal

77 books54 followers
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Yashpal (3 December 1903 – 26 December 1976) was a Hindi-language author who is sometimes considered to be the most gifted since Premchand. A political commentator and a socialist who had a particular concern for the welfare of the poor and disadvantaged, he wrote in a range of genres, including essays, novels and short stories, as well as a play, two travel books and an autobiography. He won the Hindi-language Sahitya Akademi Award for his novel, Meri Teri Uski Baat in 1976 and was also a recipient of the Padma Bhushan.

Yashpal's writings form an extension to his earlier life as a revolutionary in the cause of the Indian independence movement.

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Profile Image for Ved Prakash.
189 reviews28 followers
June 18, 2019
सन् 1947 में देश की आज़ादी के बाद अपने देश की गुटनिरपेक्षता और अहिंसा की विदेश और सैन्य नीति से लेखक काफी प्रभावित थे। सन् 1956 में प्रकाशित इस उपन्यास के माध्यम से भी वे यही कहना चाह रहे हैं कि सैन्य शक्ति और युद्ध से विश्व उन्नति नहीं कर सकता है।


यह ऐतिहासिक तथ्य है कि कलिंग विजय में हुए नरसंहार से विरक्त होकर सम्राट अशोक ने अहिंसा का रास्ता अपना लिया था। उसने कई शिलालेखों में अहिंसा धर्म की महानता से सम्बद्ध बातों को लिखवा दिया था ताकि वे चिरस्मरणीय रह सकें।

इसी ऐतिहासिक घटना को पृष्ठभूमि बनाकर यह काल्पनिक उपन्यास लिखा गया है। अशोक के एक आक्रमण को कलिंग विफल कर चूका है, लेकिन इस घटना में वहाँ के राजा घायल हो जाते हैं और कुछ दिनों बाद मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। अब वहाँ की रानी को सत्ता पर रखकर वहाँ के देशभक्त महामात्य ही राज्य चला रहे हैं और अशोक के द्वितीय आक्रमण से देश की रक्षा के उपाय में लगे हैं। अपने पति को खोने के बाद रानी बौद्ध धर्म की शरण में चली जाती हैं और सारा समय धार्मिक कार्यों और बौद्ध भिक्षुओं की सेवा में व्यतीत करती हैं। उनकी धारणा हो गई है कि देश की रक्षा सैन्य बल या युद्ध से न होकर तथागत की कृपा और दिव्य शक्तियों से ही होगी । वे बौद्ध भिक्षुओं और गुरुओं को मुक्तहस्त दान देती हैं और उन्हीं के आशीष और मार्गदर्शन में दिव्य निर्वाण/शांति/मोक्ष प्राप्ति की कामिनी हैं। छोटी अबोध राजकुमारी अमिता राज्य की उत्तराधिकारी हैं और महामात्य के संरक्षण में पल रही हैं। राज्य की महारानी युवराज्ञी को सिखाती हैं कि किसी से लूटना नहीं चाहिए और किसी को प्रताड़ित नहीं करना चाहिए।


जब धर्म और धर्मगुरु राज्य से संरक्षित और संपोषित होकर ताकतवर हो जाते हैं तो उसका देश और समाज पर असर, व्यापारी वर्ग देश और धन के बीच कैसे सामंजस्य बिठाते हैं और उनके लिए युद्ध का अर्थ, शासक वर्ग और समाज के मज़बूत व्यवसायी वर्ग या धर्मगुरुओं के बीच का रिश्ता और उसे बैलेंस करने के तौर तरीकों को बहुत ही सुन्दर तरीके से इस कहानी में पिरोया गया है।


कहानी का अंत तो कमोबेश हर पाठक पहले ही समझ जाएगा किन्तु कहानी के बीच में होनेवाले घटनाक्रम पाठकों की जिज्ञासा बनाए रखने में सक्षम है।
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