He was one of the most influential poet of Maithili and Hindi. Besides poems, he also wrote a number of short stories, novels and travelogues. He was awarded with Sahitya Academy Award for his book "Patarheen Nagna Gach". He received Sahitya Academy Fellowship for lifetime achievement which is the highest literary award of India.
Born as Vaidya naath Mishra into a Maithil Brahmin family, he later converted to Buddhism and got the name "Nagarjun". He started his literary career with writing maithili poems and chose the pen name "Yatri". He became a teacher for sometime in Saharanpur, UP but his quest for Buddhism led him to Srilanka in 1935 where he converted to Buddhism following the footsteps of his mentor "Rahul Sankrityayan". There he also studied Marxisim and Leninism. After his return, he travelled a lot in India. He also participated in Indian Freedom Movement and was jailed by British govt. In post independence period, he played an active role in JP Movement.
Nagarjun is regarded as Jan Kavi and it is said that he was the first poet of India who took poems out of the hands of elite and spread it to masses.
सुविख्यात प्रगतिशील कवि-कथाकार। हिंदी, मैथिली, संस्कृत और बांग्ला में काव्य-रचना। पूरा नाम वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’। मातृभाषा मैथिली में ‘यात्री’ नाम से ही लेखन। शिक्षा-समाप्ति के बाद घुमक्कड़ी का निर्णय। गृहस्थ होकर भी रमते-राम। स्वभाव से आवेगशील, जीवंत और फक्कड़। राजनीति और जनता के मुक्तिसंघर्षों में सक्रिय और रचनात्मक हिस्सेदारी। मैथिली काव्य-संग्रह ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान तथा मध्य प्रदेश और बिहार के शिखर सम्मान सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित।
प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें: रतिनाथ की चाची, बाबा बटेसरनाथ, दुखमोचन, बलचनमा, वरुण के बेटे, नई पौध आदि (उपन्यास); युगधारा, सतरंगे पंखोंवाली, प्यासी पथराई आँखें, तालाब की मछलियाँ, चंदना, खिचड़ी विप्लव देखा हमने, तुमने कहा था, पुरानी जूतियों का कोरस, हजार-हजार बाँहोंवाली, पका है यह कटहल, अपने खेत में, मैं मिलिटरी का बूढ़ा घोड़ा (कविता-संग्रह); भस्मांकुर, भूमिजा (खंडकाव्य); चित्रा, पत्रहीन नग्न गाछ (हिंदी में भी अनूदित मैथिली कविता-संग्रह); पारो (मैथिली उपन्यास); धर्मलोक शतकम् (संस्कृत काव्य) तथा संस्कृत से कुछ अनूदित कृतियाँ।
बलचनमा नागार्जुन के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में गिना जाता है और ये अकारण नहीं है. कहानी आज़ादी से पहले की है, लेकिन आज भी उतनी ही प्रासंगिक. आज भी गाँवों में मज़दूरों का वैसा ही शोषण हो रहा है, जैसा १९३०-४० के दशक में था. ज़मीनदारियां छोटी हो गयी हैं लेकिन उनका रुआब आज भी पहले जैसा ही है. आज भी अखबारों में रोज़ाना बड़ी जातियों के द्वारा छोटी जातियों के उत्पीड़न की ख़बरें आती रहती हैं. ऐसे में बलचनमा की कहानी कहीं से भी पुरानी नहीं लगती. हर किरदार को आप आधुनिक किरदारों से बदल सकते हैं, और कहानी जस की तस रहेगी.
बलचनमा के किरदार का विकास बहुत ही क्रमिक और स्वाभाविक है. बलचनमा की माँ ज़मीनदार की पत्नी को सब कुछ मानती है, लेकिन बलचनमा को यह सब नहीं सुहाता. बलचनमा के लिए पटने में रहने वाले फूल बाबू ही सब कुछ हो जाते हैं. लेकिन केवल तब तक, जब तक बलचनमा को उनके छिछले सिद्धांतों का पता नहीं चलता. बलचनमा बाहर भी रह कर देखता है. थोड़े दिन उसे बाहर का रहन सहन अच्छा लगता है लेकिन अपने खेत, अपनी मिट्टी उसको नौकर बनके शहर की ज़िन्दगी जीने से ज्यादा बेहतर लगने लगते हैं. देश दुनिया देखकर वापस आया बलचनमा एक बिलकुल बदला हुआ इंसान है जिसके लिए उसकी खेती ही सब कुछ है. उपन्यास का अंत पाठक के मन में कई सवाल छोड़ जाता है, जिनके जवाब ढूंढना आसान नहीं है.
राजकमल पेपरबैक्स का संस्करण सस्ता है, और क्षेत्रीय भाषा के क्लिष्ट शब्दों के अर्थ भी जगह जगह दिए हुए हैं, जो उपन्यास में प्रयुक्त भाषा से अनभिज्ञ पाठकों के लिए सहायक होंगे. अत्यंत पठनीय उपन्यास.
Balchanma is arguably the first regional novel of hindi, predating Renu's Maila Anchal. A lively, engrossing coming-of-age journey of a peasant boy. Nagarjun lays a great spread showcasing exploitation cycles of the zamindari system, on-the-line subsistence of tenants, folk festivities and freedom struggle through rural Bihar of 1930s and 40s. The use of local and vernacular words (खपसूरत, भोलंटियर, कल्लटर, इस्टीशन, बेहवार, प्रासचित etc) is endearing.
#58 बलचनमा - नागार्जुन बलचनमा पढ़ते समय आप 1930 के दरभंगा में पहुँच जाते है। बलचनमा के साथ साथ समाज और देश में होते परिवर्तन को भी देखते है। बलचनमा एक ऐसा उपन्यास है जो पन्ने दर पन्ने आपको एक अद्भुत यात्रा पर ले जाता है। यह आपको एक ऐसे भारत में ले जाएगा जहाँ जा कर आप खो जाएंगे।एक तरफ जहाँ आपको जमींदारी में हो रहे अत्याचारों का पता चलेगा दूसरी तरह गाँव के शानदार संस्कृति को करीब से जीने का मौका मिलेगा। बेहद ही संतुलित रचना है।यह इतनी संतुलित है की काही भी कुछ भी अनावश्यक नहीं जान परता है। कहीं कुछ भी अनावश्यक नहीं है। जैसा की इसके पिछले पृष्ठ में लिखा हुआ है इसे हिन्दी का प्रथम आंचलिक उपन्यास होने का दर्जा प्राप्त है।
आंचलिक शब्दों के लगातार उपयोग से इसमें चार चाँद लग गए है जैसे - कनगरेस का भोलनटियर, खपसूरत, परफेसर, कलट्टर, बज्जर, कम्प जहल, इमन्दर आदि।
कहानी में जबरदस्त प्रवाह है और यह पाठक को अंत तक बांधेे रखने में सक्षम है। बेलचनमा की नजर से उस समय के पटना को देखना दिल को लुभा जाता है।
बाबा नागार्जुन की एक और अनुपम कृति । जमींदारों द्वारा गरीब व असहाय का शोषण और उनकी व्यथाओं का सजीव वर्णन । आँखों देखा दस्तावेज लगती है ये कृति । मार्मिकता और कारुणिकता पूर्ण वर्णन । अत्याचार और विद्रोह की गाथा है ‘बलचनामा’।
Nagarjuna's writing style is significantly different from that of Prem Chand, although both of them reflect the existing conditions of society. The difference lies in Premchand's portrayal of the minds of the characters, while this is very limited in Nagarjuna's story-telling.