विष्णु प्रभाकर के जीवन पर गांधीजी के जीवन और सिद्धांतों का गहरा असर पड़ा. इसके चलते ही उनका रुझान कांग्रेस की तरफ हुआ और स्वतंत्रता संग्राम के महासागर में उन्होंने अपनी लेखनी को भी एक उद्देश्य बना लिया जो आज़ादी के लिए सतत संघर्षरत रही. अपने दौर के लेखकों में प्रेमचंद, यशपाल, जैनेन्द्र और अज्ञेय जैसे महारथियों के सहयात्री रहे, लेकिन रचना के क्षेत्र में इनकी एक विशिष्ट पहचान रही. इनकी कहानियों में देशभक्ति, राष्ट्रीयता और समाज के उत्थान का वास्तविक प्रतिबिम्बा झलकता है. धरती अब भी घूम रही है, अर्धनारीश्वर जैसी कालजयी कहानियाँ भी इस संकलन में संकलित हैं.
इस संकलन की सबसे बड़ी विशेषता यह है की ये सभी कहानियां अपने मूल प्रामाणिक पाठ के साथ हैं, इसलिए ये पाठकों के साथ साथ शोधार्थियों के लिए भी महत्त्वपूर्ण बन पड़ी हैं.
विष्णु प्रभाकर का जन्म उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के गांव मीरापुर में हुआ था। उनके पिता दुर्गा प्रसाद धार्मिक विचारों वाले व्यक्ति थे और उनकी माता महादेवी पढ़ी-लिखी महिला थीं जिन्होंने अपने समय में पर्दा प्रथा का विरोध किया था। उनकी पत्नी का नाम सुशीला था। विष्णु प्रभाकर की आरंभिक शिक्षा मीरापुर में हुई। बाद में वे अपने मामा के घर हिसार चले गये जो तब पंजाब प्रांत का हिस्सा था। घर की माली हालत ठीक नहीं होने के चलते वे आगे की पढ़ाई ठीक से नहीं कर पाए और गृहस्थी चलाने के लिए उन्हें सरकारी नौकरी करनी पड़ी। चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी के तौर पर काम करते समय उन्हें प्रतिमाह १८ रुपये मिलते थे, लेकिन मेधावी और लगनशील विष्णु ने पढाई जारी रखी और हिन्दी में प्रभाकर व हिन्दी भूषण की उपाधि के साथ ही संस्कृत में प्रज्ञा और अंग्रेजी में बी.ए की डिग्री प्राप्त की। विष्णु प्रभाकर पर महात्मा गाँधी के दर्शन और सिद्धांतों का गहरा असर पड़ा। इसके चलते ही उनका रुझान कांग्रेस की तरफ हुआ और स्वतंत्रता संग्राम के महासमर में उन्होंने अपनी लेखनी का भी एक उद्देश्य बना लिया, जो आजादी के लिए सतत संघर्षरत रही। अपने दौर के लेखकों में वे प्रेमचंद, यशपाल, जैनेंद्र और अज्ञेय जैसे महारथियों के सहयात्री रहे, लेकिन रचना के क्षेत्र में उनकी एक अलग पहचान रही।
विष्णु प्रभाकर ने पहला नाटक लिखा- हत्या के बाद, हिसार में नाटक मंडली में भी काम किया और बाद के दिनों में लेखन को ही अपनी जीविका बना लिया। आजादी के बाद वे नई दिल्ली आ गये और सितम्बर १९५५ में आकाशवाणी में नाट्य निर्देशक के तौर पर नियुक्त हो गये जहाँ उन्होंने १९५७ तक काम किया। वर्ष २००५ में वे तब सुर्खियों में आए जब राष्ट्रपति भवन में कथित दुर्व्यवाहर के विरोध स्वरूप उन्होंने पद्म भूषण की उपाधि लौटाने की घोषणा की। उनका आरंभिक नाम विष्णु दयाल था। एक संपादक ने उन्हें प्रभाकर का उपनाम रखने की सलाह दी। विष्णु प्रभाकर ने अपनी लेखनी से हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया। उन्होंने साहित्य की सभी विधाओं में अपनी लेखनी चलाई। १९३१ में हिन्दी मिलाप में पहली कहानी दीवाली के दिन छपने के साथ ही उनके लेखन का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज आठ दशकों तक निरंतर सक्रिय है। नाथूराम शर्मा प्रेम के कहने से वे शरत चन्द्र की जीवनी आवारा मसीहा लिखने के लिए प्रेरित हुए जिसके लिए वे शरत को जानने के लगभग सभी सभी स्रोतों, जगहों तक गए, बांग्ला भी सीखी और जब यह जीवनी छपी तो साहित्य में विष्णु जी की धूम मच गयी। कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी, संस्मरण, बाल साहित्य सभी विधाओं में प्रचुर साहित्य लिखने के बावजूद आवारा मसीहा उनकी पहचान का पर्याय बन गयी। बाद में अर्द्धनारीश्वर पर उन्हें बेशक साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला हो, किन्तु आवारा मसीहा ने साहित्य में उनका मुकाम अलग ही रखा।
प्रमुख कृतियाँ उपन्यास- ढलती रात, स्वप्नमयी, अर्धनारीश्वर, धरती अब भी घूम रही है, क्षमादान, दो मित्र, पाप का घड़ा, होरी,
नाटक- हत्या के बाद, नव प्रभात, डॉक्टर, प्रकाश और परछाइयाँ, बारह एकांकी, अशोक, अब और नही, टूट्ते परिवेश,
कहानी संग्रह- संघर्ष के बाद, धरती अब भी धूम रही है, मेरा वतन, खिलोने, आदि और अन्त्,
आत्मकथा- पंखहीन नाम से उनकी आत्मकथा तीन भागों में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई है।
जीवनी- आवारा मसीहा,
यात्रा वृतान्त्- ज्योतिपुन्ज हिमालय, जमुना गन्गा के नैहर मै।
Vishnu Prabhakar was a Hindi writer. He had several short stories, novels, plays and travelogues to his credit. Prabhakar's works have elements of patriotism, nationalism and messages of social upliftment. He was awarded the Sahitya Akademi Award in 1993, Mahapandit Rahul Sankrityayan Award in 1995 and the Padma Bhushan (the third highest civilian honor of India) by the Government of India in 2004.
इत्तेफाक से यह किताब हाथ लगी और विष्णु प्रभाकर जी की लेखनी और कहानियाँ ऐसी की दिल को झकझोर उठीं. हर कहानी एक अलग ही दुनिया में ले जाती - कोई बद्रीनाथ की पहाड़ियों के बीच तो कोई स्वतंत्रता के समय मचे दंगों में गिर रही लाशों के बीच. कभी आप बंगाल के अकाल में मर रहे अपने बच्चे को सीने से चिपटाए शहर की और भागी जा रही माँ को देखकर सिहर उठते तो कभी उस माँ को देखते जो अपने बेटे की तबियत ही न ठीक होने देती क्यूंकि ठीक होने पर वह दूर चला जाता और अपनी माँ का बेटा न होकर के देश का बेटा बन जाता. रिश्तों की उलझनें भी खूब परेशान करती जब एक प्रौढ़ अध्यापक एक विधवा को स्नेह से विवाह का प्रस्ताव देता है जबकि वो उसमें अपने पिता को देखती है; या फिर जब एक गांधीवादी समाजसेवी जिसने ब्रह्मचर्य का प्रण लिया हो, अपने विश्वास को डगमगाते देखता है; या फिर एक हंसमुख और उन्मुक्त विवाहिता उसके प्यार में उलझे लेखक को पत्र लिखती है की 'मुक्त व्यवहार वासना के कारण नहीं, वासना के अभाव के कारण हो पाता है.'
यह संग्रह अवश्य ही पठनीय है और इतने वर्षों बाद भी समाज और इंसान को आइना दिखाता है.