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कबिरा खड़ा बजार में
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Displaying 1 - 6 of 6 reviews
September 12, 2018
कल इसको पढ़ना शुरू किया तो पढ़ता ही चला गया। यह एक तीन अंको का छोटा नाटक है। कबीर मुख्य पात्र है। कबीर के युवावस्था के दिनों का शाब्दिक-संवादिक निरूपण किया गया है। भीष्म साहनी की लेखनी का कोई सानी नहीं। धार्मिक जातीय पाखण्ड को कबीर के चरित्र और कवित्त द्वारा उघाड़ दिया है साहनी साहब ने।
.
मोको कहाँ ढूढ़े बन्दे, मैं तो तेरे पास में
ना मैं देवल में, न मस्जिद में, न काबे कैलास में।
न तौ कौनो क्रिया-कर्म में, न ही योग बैराग में
खोजी होय तौ तुरतै मैलिहौ, पल भर की तलास में।
कहै कबीर सुनौ भई साधू, सब स्वांसों की स्वांस में।
.
कबिरा खड़ा बाजार में
लिया लुकाठा हाथ
जौ घर फूंके आपनो
चलो हमारे साथ
.
एकै बूंद, एकै मलमूतर, एक चाम, एक गूदा
एक जाति है सब उत्पन्ना, को ब्रह्मण, को सूदा।
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मोको कहाँ ढूढ़े बन्दे, मैं तो तेरे पास में
ना मैं देवल में, न मस्जिद में, न काबे कैलास में।
न तौ कौनो क्रिया-कर्म में, न ही योग बैराग में
खोजी होय तौ तुरतै मैलिहौ, पल भर की तलास में।
कहै कबीर सुनौ भई साधू, सब स्वांसों की स्वांस में।
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कबिरा खड़ा बाजार में
लिया लुकाठा हाथ
जौ घर फूंके आपनो
चलो हमारे साथ
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एकै बूंद, एकै मलमूतर, एक चाम, एक गूदा
एक जाति है सब उत्पन्ना, को ब्रह्मण, को सूदा।
April 10, 2019
कबीर किसी परिचय, किसी भूमिका के मोहताज नहीं हैं। कबीर का कृतित्व हम न केवल किताबों में बचपन से पढ़ते आ रहे हैं, वरन उनके तमाम दोहे, साखियाँ और सबद देश के तमाम हिस्सों में गाए और सुनाए जाते रहे हैं।
फिर प्रश्न उठता है कि इस नाटक में नया क्या होगा! कबीर को पढ़ना और कबीर के जीवन को नजदीक से झांकना दोनों ही अलग तरह के अनुभव हैं। उनके रचनाकाल के करीब 500 साल बीत जाने पर भी और सभ्यता, विज्ञान और समाज द्वारा एक बड़ी दूरी तय कर लिए जाने बावजूद उनका कथ्य आज भी क्रांतिकारी ही लगता है। उनकी मशाल जिसके जरिये वो समाज को आइना दिखाना चाहते थे, आज भी मंद नहीं पड़ी है।
लेकिन प्रश्न यह है कि जब एक ही सांस में उनके द्वारा मुल्ला और पंडित और दोनों के कर्मकांडों को लताड़ा जाना आज भी कितनों को अखर जाएगा, तो उस दौर में उस शख्स ने कैसी अप्रतिम निर्भीकता दिखाई होगी। तब तो शासन और धर्म एक दूसरे से अनिवार्य तरीके से बद्ध थे। राजा या सुल्तान अपनी प्रजा से ज्यादा अपने धर्म को सुरक्षित रखने और उसकी तरक्की की कसमें खाते थे। ऐसे में यह कल्पना भी आज सिहरन उत्पन्न कर सकती है कि कबीर ये कहते कैसे होंगे-
"कांकर पाथर जोड़ कर मस्ज़िद लई बनाय
ता चढ़ मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय"
यह छोटा सा नाटक उस महान कवि, संत, सुधारक के जीवन के कुछ पहलुओं को समझने का प्रयास ही तो है। कुछ इतिहास का आधार होगा, कुछ कल्पना के पैबंद होंगे। दिल्ली के बादशाह से भी बात करते वक़्त अगर कबीर घबराते नहीं हैं, अपनी अक्खड़ता, अपनी सच्चाई और हाज़िरजवाबी नहीं छोड़ते हैं तो इसकी वजह उन्होंने ही कहीं बताई है-
"हमन हैं इश्क मस्ताना हमन को होशियारी क्या
रहें आज़ाद या जग से हमन दुनिया से यारी क्या"
आज जब धर्म और ऊंच-नीच के बंटवारे अब भी ज्वलंत हैं और समाज में घृणा और असहिष्णुता को जन्म देते हैं, हिंसा फैलाते हैं; कबीर का पहले इंसान बनने का आह्वान इस वक़्त की भी मांग है। राजा हो या रंक हों, धनी हो या निर्धन, ऊंच-नीच के बंधनों से परे जाकर, इस बात की परवाह न करते हुए कि वे अकेले हैं या उनके साथ हुजूम खड़ा है, कबीर पुकार रहे हैं- "...जो घर बारे आपना वो चले हमारे साथ"...
कबिरा खड़ा बज़ार में...
फिर प्रश्न उठता है कि इस नाटक में नया क्या होगा! कबीर को पढ़ना और कबीर के जीवन को नजदीक से झांकना दोनों ही अलग तरह के अनुभव हैं। उनके रचनाकाल के करीब 500 साल बीत जाने पर भी और सभ्यता, विज्ञान और समाज द्वारा एक बड़ी दूरी तय कर लिए जाने बावजूद उनका कथ्य आज भी क्रांतिकारी ही लगता है। उनकी मशाल जिसके जरिये वो समाज को आइना दिखाना चाहते थे, आज भी मंद नहीं पड़ी है।
लेकिन प्रश्न यह है कि जब एक ही सांस में उनके द्वारा मुल्ला और पंडित और दोनों के कर्मकांडों को लताड़ा जाना आज भी कितनों को अखर जाएगा, तो उस दौर में उस शख्स ने कैसी अप्रतिम निर्भीकता दिखाई होगी। तब तो शासन और धर्म एक दूसरे से अनिवार्य तरीके से बद्ध थे। राजा या सुल्तान अपनी प्रजा से ज्यादा अपने धर्म को सुरक्षित रखने और उसकी तरक्की की कसमें खाते थे। ऐसे में यह कल्पना भी आज सिहरन उत्पन्न कर सकती है कि कबीर ये कहते कैसे होंगे-
"कांकर पाथर जोड़ कर मस्ज़िद लई बनाय
ता चढ़ मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय"
यह छोटा सा नाटक उस महान कवि, संत, सुधारक के जीवन के कुछ पहलुओं को समझने का प्रयास ही तो है। कुछ इतिहास का आधार होगा, कुछ कल्पना के पैबंद होंगे। दिल्ली के बादशाह से भी बात करते वक़्त अगर कबीर घबराते नहीं हैं, अपनी अक्खड़ता, अपनी सच्चाई और हाज़िरजवाबी नहीं छोड़ते हैं तो इसकी वजह उन्होंने ही कहीं बताई है-
"हमन हैं इश्क मस्ताना हमन को होशियारी क्या
रहें आज़ाद या जग से हमन दुनिया से यारी क्या"
आज जब धर्म और ऊंच-नीच के बंटवारे अब भी ज्वलंत हैं और समाज में घृणा और असहिष्णुता को जन्म देते हैं, हिंसा फैलाते हैं; कबीर का पहले इंसान बनने का आह्वान इस वक़्त की भी मांग है। राजा हो या रंक हों, धनी हो या निर्धन, ऊंच-नीच के बंधनों से परे जाकर, इस बात की परवाह न करते हुए कि वे अकेले हैं या उनके साथ हुजूम खड़ा है, कबीर पुकार रहे हैं- "...जो घर बारे आपना वो चले हमारे साथ"...
कबिरा खड़ा बज़ार में...
February 23, 2024
कबीरा खड़ा बाजार में - शीर्षक का नाम सुनते ही – कबीर वाणी याद हो आयी -
“ कबीरा खड़ा बाजार में , मांगे सब की खैर
ना काहू से दोस्ती , ना काहू से बैर ,
ना काहू से बैर !! "
और मैं अपनी मीठी यात्रा शुरू करती हूँ – इस पुस्तक के संग , जो भीष्म साहनी जी द्वारा लिखित एक नाट्य रचना है |
हम अखबारों में , टेलीविज़न पर, कबीर को एक संत की तरह देखते हैं। उनके दोहे चल रहे होते हैं और दुनिया उन्हें भगवान मान उन्हें श्रद्धांजलि दे रही होती है। हमें इस बात से बिलकुल फर्क नहीं पड़ता कि कबीर अपने जीवन काल में इतनी ऊंचाई कैसे पा गए ? उनके काल का समाज जो बेहद जाति- प्रथा , धर्म , अंधविश्वास आदि की कटपुतली रहा - उन सबके विरुद्ध जाना , कोई खेल तो नहीं ही रहा होगा।
यह नाटक कबीर के संघर्ष को दर्शाता है , समाज की धर्म के प्रति अंधी रुचि , तानाशाही , अंधविश्वास आदि के खिलाफ कबीर का संघर्ष , उनके साहस , निर्भीक व्यक्तित्व को दर्शाता है , उनके प्रेम को दर्शाता है और इसी संघर्ष से उभरता है - कबीर का एक अनोखा व्यक्तित्व जो अंतरिक्ष को छूता है |
कबीर जैसा व्यक्तित्व अपने जीवन काल में हम सब चाहते होंगे पर सवाल ये है कि क्या संघर्ष करने को हम राज़ी है ??
इस नाटक के दौरान हम कबीर के कई दोहों से रूबरू होते हैं , जो भीतर गहराइयों को छूते हैं |
कबीर के कवित्त , तो बस , क्या बोलें - समाज की गहरी सच्चाई को तो दिखाते ही हैं , साथ ही दिल में एक दोहराव सा डालते हैं , जिधर आप बार बार खींचे चले जाते हो |
“ मोको कहाँ ढूंढे बन्दे
मैं तो तेरे पास में "
यह सच ही है - कोई बादशाही ऐसे ही नहीं पा लेते हैं।
भंडारा का एक अनोखा अर्थ इस नाटक द्वारा जानने को मिला।
हम अकसर देखते हैं , अपने आस पास भंडारा लगते हुए, पर मुझे नहीं लगता कि इसका सही अर्थ भंडारा आयोजित करने वालों को पता भी होगा । अकसर वो इसे अपना गौरव मान अपने अहम् को और ऊंचा ही करते हैं - कि हमने भंडारा आयोजित किया है ।
कबीर साहेब का भंडारा ऊंच - नीच , जात - पात को ख़त्म करना है। और ये अपनी समझ को रास भी आती है। ठीक ही तो है , माँ पृथ्वी जात पात देखकर तो भोजन पड़ोसती नहीं है , भंडारे में सब मिलकर इकट्ठे खाएं , जिससे ऊंच नीच की दूरियां मिटे और सब अपनी इंसानियत को एक दूसरे से जोड़ पाए। ये मुझे अति खूबसूरत आयोजन दिखाई देता है पर साथ में ये तकलीफ भी है कि आज समाज में भंडारा इस सोच से आयोजित किया जाता है कि व्यापारी वर्ग अपने धन को जरूरतमंदों में किसी ना किसी रूप में बाटें जो पूर्ण रूप से गलत नहीं लगता पर साथ ही में पूर्ण रूप से मन को रास भी नहीं आता।
इस नाटक में आप सिकंदर लोदी , शेख़ तक्की के बारे में भी जान पाते हो , जो कबीर के खिलाफ ना जाने कितनी शाजिश रचने के बावजूद भी कबीर का कुछ भी नहीं बिगाड़ सके क्यूंकि कबीर दास जी तो खुद खुदा के बन्दे हैँ ।
कबीर की निर्भीक व्यक्तित्व पता नहीं अंदर डराती है , ये सोचने में मजबूर करती है कि पता नहीं कबीर कैसे इतने साहसी और निडर थे। गलत होता तो हम सब अपने आस पास देखते हैं , पर उस गलत के खिलाफ आवाज उठाना सब के बस की बात नहीं है , गलत होता देखकर भी हमें अपने अंदर का दर किस तरह चुप करा देता है ये तो अपने आप में ही एक मिस्ट्री है |
कबीर , कबीर के सवाल और उनका निडर होकर एक ऐसे समाज के आगे अपने सवालों को रखना जो जात पात की रस्सी से बंधा हुआ है जहाँ सिर्फ सवाल ब्राह्मण कर सकते हैं , कबीर जुलाहे का कोई अधिकार ही नहीं सवाल करने का , पर कबीर बादशाह हैं , कोड़े खाकर भी कबीर अपनी बात रखते हैं , नदी में बांधकर फेंक दिए जाने पर भी भागते नहीं , मौलवी पंडितों की धमकियाँ उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकती - ऐसी हस्ती हैं , हमारे कबीर ।
क्या हम सबके अंदर भी एक कबीर है ??
कबीर के कुछ खूबसूरत दोहे — बैजू मांगेश्कर की आवाज में ||
“ कबीरा खड़ा बाजार में , मांगे सब की खैर
ना काहू से दोस्ती , ना काहू से बैर ,
ना काहू से बैर !! "
और मैं अपनी मीठी यात्रा शुरू करती हूँ – इस पुस्तक के संग , जो भीष्म साहनी जी द्वारा लिखित एक नाट्य रचना है |
हम अखबारों में , टेलीविज़न पर, कबीर को एक संत की तरह देखते हैं। उनके दोहे चल रहे होते हैं और दुनिया उन्हें भगवान मान उन्हें श्रद्धांजलि दे रही होती है। हमें इस बात से बिलकुल फर्क नहीं पड़ता कि कबीर अपने जीवन काल में इतनी ऊंचाई कैसे पा गए ? उनके काल का समाज जो बेहद जाति- प्रथा , धर्म , अंधविश्वास आदि की कटपुतली रहा - उन सबके विरुद्ध जाना , कोई खेल तो नहीं ही रहा होगा।
यह नाटक कबीर के संघर्ष को दर्शाता है , समाज की धर्म के प्रति अंधी रुचि , तानाशाही , अंधविश्वास आदि के खिलाफ कबीर का संघर्ष , उनके साहस , निर्भीक व्यक्तित्व को दर्शाता है , उनके प्रेम को दर्शाता है और इसी संघर्ष से उभरता है - कबीर का एक अनोखा व्यक्तित्व जो अंतरिक्ष को छूता है |
कबीर जैसा व्यक्तित्व अपने जीवन काल में हम सब चाहते होंगे पर सवाल ये है कि क्या संघर्ष करने को हम राज़ी है ??
इस नाटक के दौरान हम कबीर के कई दोहों से रूबरू होते हैं , जो भीतर गहराइयों को छूते हैं |
कबीर के कवित्त , तो बस , क्या बोलें - समाज की गहरी सच्चाई को तो दिखाते ही हैं , साथ ही दिल में एक दोहराव सा डालते हैं , जिधर आप बार बार खींचे चले जाते हो |
“ मोको कहाँ ढूंढे बन्दे
मैं तो तेरे पास में "
यह सच ही है - कोई बादशाही ऐसे ही नहीं पा लेते हैं।
भंडारा का एक अनोखा अर्थ इस नाटक द्वारा जानने को मिला।
हम अकसर देखते हैं , अपने आस पास भंडारा लगते हुए, पर मुझे नहीं लगता कि इसका सही अर्थ भंडारा आयोजित करने वालों को पता भी होगा । अकसर वो इसे अपना गौरव मान अपने अहम् को और ऊंचा ही करते हैं - कि हमने भंडारा आयोजित किया है ।
कबीर साहेब का भंडारा ऊंच - नीच , जात - पात को ख़त्म करना है। और ये अपनी समझ को रास भी आती है। ठीक ही तो है , माँ पृथ्वी जात पात देखकर तो भोजन पड़ोसती नहीं है , भंडारे में सब मिलकर इकट्ठे खाएं , जिससे ऊंच नीच की दूरियां मिटे और सब अपनी इंसानियत को एक दूसरे से जोड़ पाए। ये मुझे अति खूबसूरत आयोजन दिखाई देता है पर साथ में ये तकलीफ भी है कि आज समाज में भंडारा इस सोच से आयोजित किया जाता है कि व्यापारी वर्ग अपने धन को जरूरतमंदों में किसी ना किसी रूप में बाटें जो पूर्ण रूप से गलत नहीं लगता पर साथ ही में पूर्ण रूप से मन को रास भी नहीं आता।
इस नाटक में आप सिकंदर लोदी , शेख़ तक्की के बारे में भी जान पाते हो , जो कबीर के खिलाफ ना जाने कितनी शाजिश रचने के बावजूद भी कबीर का कुछ भी नहीं बिगाड़ सके क्यूंकि कबीर दास जी तो खुद खुदा के बन्दे हैँ ।
कबीर की निर्भीक व्यक्तित्व पता नहीं अंदर डराती है , ये सोचने में मजबूर करती है कि पता नहीं कबीर कैसे इतने साहसी और निडर थे। गलत होता तो हम सब अपने आस पास देखते हैं , पर उस गलत के खिलाफ आवाज उठाना सब के बस की बात नहीं है , गलत होता देखकर भी हमें अपने अंदर का दर किस तरह चुप करा देता है ये तो अपने आप में ही एक मिस्ट्री है |
कबीर , कबीर के सवाल और उनका निडर होकर एक ऐसे समाज के आगे अपने सवालों को रखना जो जात पात की रस्सी से बंधा हुआ है जहाँ सिर्फ सवाल ब्राह्मण कर सकते हैं , कबीर जुलाहे का कोई अधिकार ही नहीं सवाल करने का , पर कबीर बादशाह हैं , कोड़े खाकर भी कबीर अपनी बात रखते हैं , नदी में बांधकर फेंक दिए जाने पर भी भागते नहीं , मौलवी पंडितों की धमकियाँ उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकती - ऐसी हस्ती हैं , हमारे कबीर ।
क्या हम सबके अंदर भी एक कबीर है ??
कबीर के कुछ खूबसूरत दोहे — बैजू मांगेश्कर की आवाज में ||
May 9, 2020
I am a huge fan of Bhishm Sahani ji's writing and this play is a pure Gem. once I watched a Drama based on this and the experiences of watching and reading it were different. this book helped me to understand Kabeera better and now I love him even more.
Read
May 9, 2022Bsbje
September 30, 2013
Just love it...!! came to know about kabir life and his way of thinking...!!! How he believe in god his idea Bhishan Sahni very well justify the kabir feeling.The whole play is great !!!
Displaying 1 - 6 of 6 reviews





