कबीर किसी परिचय, किसी भूमिका के मोहताज नहीं हैं। कबीर का कृतित्व हम न केवल किताबों में बचपन से पढ़ते आ रहे हैं, वरन उनके तमाम दोहे, साखियाँ और सबद देश के तमाम हिस्सों में गाए और सुनाए जाते रहे हैं।
फिर प्रश्न उठता है कि इस नाटक में नया क्या होगा! कबीर को पढ़ना और कबीर के जीवन को नजदीक से झांकना दोनों ही अलग तरह के अनुभव हैं। उनके रचनाकाल के करीब 500 साल बीत जाने पर भी और सभ्यता, विज्ञान और समाज द्वारा एक बड़ी दूरी तय कर लिए जाने बावजूद उनका कथ्य आज भी क्रांतिकारी ही लगता है। उनकी मशाल जिसके जरिये वो समाज को आइना दिखाना चाहते थे, आज भी मंद नहीं पड़ी है।
लेकिन प्रश्न यह है कि जब एक ही सांस में उनके द्वारा मुल्ला और पंडित और दोनों के कर्मकांडों को लताड़ा जाना आज भी कितनों को अखर जाएगा, तो उस दौर में उस शख्स ने कैसी अप्रतिम निर्भीकता दिखाई होगी। तब तो शासन और धर्म एक दूसरे से अनिवार्य तरीके से बद्ध थे। राजा या सुल्तान अपनी प्रजा से ज्यादा अपने धर्म को सुरक्षित रखने और उसकी तरक्की की कसमें खाते थे। ऐसे में यह कल्पना भी आज सिहरन उत्पन्न कर सकती है कि कबीर ये कहते कैसे होंगे-
"कांकर पाथर जोड़ कर मस्ज़िद लई बनाय
ता चढ़ मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय"
यह छोटा सा नाटक उस महान कवि, संत, सुधारक के जीवन के कुछ पहलुओं को समझने का प्रयास ही तो है। कुछ इतिहास का आधार होगा, कुछ कल्पना के पैबंद होंगे। दिल्ली के बादशाह से भी बात करते वक़्त अगर कबीर घबराते नहीं हैं, अपनी अक्खड़ता, अपनी सच्चाई और हाज़िरजवाबी नहीं छोड़ते हैं तो इसकी वजह उन्होंने ही कहीं बताई है-
"हमन हैं इश्क मस्ताना हमन को होशियारी क्या
रहें आज़ाद या जग से हमन दुनिया से यारी क्या"
आज जब धर्म और ऊंच-नीच के बंटवारे अब भी ज्वलंत हैं और समाज में घृणा और असहिष्णुता को जन्म देते हैं, हिंसा फैलाते हैं; कबीर का पहले इंसान बनने का आह्वान इस वक़्त की भी मांग है। राजा हो या रंक हों, धनी हो या निर्धन, ऊंच-नीच के बंधनों से परे जाकर, इस बात की परवाह न करते हुए कि वे अकेले हैं या उनके साथ हुजूम खड़ा है, कबीर पुकार रहे हैं- "...जो घर बारे आपना वो चले हमारे साथ"...
कबिरा खड़ा बज़ार में...