पढ़ने से पहले मैं ज़रा घबरा रहा था। कि इतना समय लगा कर पढ़ूँगा, कहीं ख़राब ही ना निकले। पर शुरू करने के 10 पन्नों के बाद मेरी ये शंकाएँ दूर हो गयीं। भीष्म साहनी - नाम ही इतना "बड़ा" है कि सुनकर लगता है पता नहीं क्या ही लिखा होगा। हमारी आज-कल की पीढ़ी के लोगों में तो यही "stereotype" है कि हिंदी में लिखा हुआ पुराना "novel" कुछ बहुत ही मुश्किल हिंदी के शब्दों से भरा होगा जो बिना हिंदी के शब्दकोष के समझ नहीं आएंगे और पढ़ने लायक भी कुछ ख़ास नहीं होगा। जो कि शत प्रतिशत गलत हैं। "कड़ियाँ" में भीष्म जी ने बहुत ही अलौकिक ढंग से, उतने ही सरल शब्दों में 90s के दशक की मध्यवर्गीय दांपत्य जीवन की बड़ी ही "cliched" सी कहानी में जान डाल दी। हम सब अपना अतीत भुला चुके हैं। हम सब मेट्रो शहरों में आ गए हैं और सब मेट्रो की भाषा बोलने लगे हैं। भीष्म साहनी जी का ये उपन्यास इस नए-नवेले मैले और प्रदूषित शहर में आषाढ़ के पहले दिन जैसा लगेगा। वह छोटी-छोटी बातें जो हम सब ने अपने बचपन में देखी हैं, सुनी हैं, महसूस की हैं, इस उपन्यास में पढ़ने को मिलेंगी। और 90s के दशक की भारत की हमारे से ऊपरवाली पीढ़ी किन सामाजिक तत्त्वों को लांघकर निकली है, किन सामाजिक लांछन को उन्हें झेलना पड़ा है, पुरुष-प्रधान समाज में औरतज़ात की तकलीफें, धर्म में अँधा विश्वास- एक सरल सी कहानी में सब कुछ बयां है। मैं तो यह देखकर हताश हूँ कि इतने नामी-गिरामी लेखक की आज भी कितनी ही रचनाएँ हम तक नहीं पहुँचती। अगर आप को इस तरह के novel पढ़ने में ज़रा भी रुचि है तो ज़रूर इस उपन्यास को पढ़ें। मैं वादा करता हूँ आप को बेहद पसंद आएगा।