शिक्षा: संस्कृत में शास्त्री, अंग्रेजी में बी.ए., संस्कृत और हिन्दी में एम.ए.।
आजीविकाः लाहौर, मुंबई, शिमला, जालंधर और दिल्ली में अध्यापन, संपादन और स्वतंत्र-लेखन।
महत्त्वपूर्ण कथाकार होने के साथ-साथ एक अप्रतिम और लोकप्रिय नाट्य-लेखक। नितांत असंभव और बेहद ईमानदार आदमी।
प्रकाशित पुस्तकें: अँधेरे बंद कमरे, अंतराल, न आने वाला कल (उपन्यास); आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस, आधे-अधूरे, पैर तले की ज़मीन (नाटक); शाकुंतल, मृच्छकटिक (अनूदित नाटक); अंडे के छिलके, अन्य एकांकी तथा बीज नाटक, रात बीतने तक तथा अन्य ध्वनि नाटक (एकांकी); क्वार्टर, पहचान, वारिस, एक घटना (कहानी-संग्रह); बक़लम खुद, परिवेश (निबन्ध); आखिरी चट्टान तक (यात्रावृत्त); एकत्र (अप्रकाशित-असंकलित रचनाएँ); बिना हाड़-मांस के आदमी (बालोपयोगी कहानी-संग्रह) तथा मोहन राकेश रचनावली (13 खंड)।
सम्मान: सर्वश्रेष्ठ नाटक और सर्वश्रेष्ठ नाटककार के संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, नेहरू फ़ेलोशिप, फि़ल्म वित्त निगम का निदेशकत्व, फि़ल्म सेंसर बोर्ड के सदस्य।
सुंदर नाटक। लेकिन लगा कि कुछ हिस्सों में और भी बहतर हो सकता था। मानो हाथ आते आते कुछ छूट गया। पर जिस द्वंद की बात इसका मूल आधार है और जिस तरह से उसे नंद के पात्र के ज़रिए दिखाया गया है वो आपने में सटीक, महत्वपूर्ण और सुंदर है।
लहरों के राजहंस में सांसारिक सुखों और आध्यात्मिक शांति के परस्पर विरोध तथा उसके बीच खड़े व्यक्ति के अंतर्विरोध को चित्रित किया गया है।
सन् 1968 के इस नाटक में दर्शाया गया है कि स्त्री और पुरुष के बीच के कृत्रिम और आरोपित द्वंद के कारण व्यक्ति के लिए चुनाव करना मुश्किल हो जाता है और चुनने की स्वतंत्रता भी नहीं रहती। प्रेम और अध्यात्म के बीच चुनाव की यातना ही इस रचना का कथा-बीज और केंद्र-बिंदु है।
मोहन राकेश ने पात्रों और कथा-स्थिति को एक आधुनिक अर्थ व्यंजना प्रदान की है और एक ऐतिहासिक कथानक (बुद्ध का पत्नी यशोधरा को छोड़ कर जाना) को रचनात्मक स्तर पर भाव के संवेदन से महत्वपूर्ण बना दिया है। वैचारिक और सैद्धांतिक दृष्टि से यह एक बहुआयामी और कलात्मक कृति है।