काशीनाथ सिंह का नाम सामने आते ही उस तैराक का चित्र आँखों के सामने तैर जाता है, जो एक चढ़ी हुई नदी में, धारा के विरुद्ध हाथ-पाँव मारता चला आता हो। ‘अपना मोर्चा’ स्वयं में इसकी सर्वश्रेष्ठ गवाही है। यह मोर्चा प्रतिरोध की उस मानसिकता का बहुमूल्य दस्तावेज है जिसे इस देश के युवा वर्ग ने पहली बार अर्जित किया था। एक चेतन अँगड़ाई इतिहास की करवट बनी थी - जब विश्वविद्यालय से टूटा हुआ भाषा का सवाल, पूरे सामाजिक-राजनीतिक ढाँचे का सवाल बन गया था और आन्दोलनों की लहरें जन-मानस को भिगोने लगी थीं। हम क्यों पढ़ते है।! ये विश्वविद्यालय क्यां? भाषा केवल एक लिपि ही क्यों जीवन की भाषा क्यों नहीं? छात्रों, अध्यापकों, मजदूरों और किसानों के अपने-अपने सवाल अलग-अलग क्यों हैं? व्यवस्था उन्हें किस तरह भटकाकर तोड़ती है? एक छोटी-सी कृति में इन सारे सवालों को उछाला है काशीनाथ सिंह ने। इनके जवाबों के लिए लोग खुद अपनी आत्मा टटोलें, यह सार्थक भी इस कृति का है।
इस उपन्यास के बारे में मुझे अभिनेता मनोज बाजपाई के एक साक्षात्कार से पता चला, जिसमे उन्होंने इस उपन्यास की अनुशंसा की थी । आज इसके पहले प्रकाशन के लगभग ४० साल बाद भी, ज्यादा कुछ नहीं बदला है ।
विश्वविद्यालयों में राजनीति वैसी ही है । जो आगे चल कर राजनीति में जाना चाहते हैं, या विदेश में पढ़ाई के लिए उन्हें अपने सी.वी में दिखाना है कि वह अपने कॉलेज के दिनों में किसी पद पर थे और बहुत सक्रिय थे, वह कुछ भी मुद्दा बना के सबका मसीहा बनने की कोशिश करते हैं । हालांकि कहानी की शुरुआत इस तरह होती है, शासन के अत्याचार और अपमान से छात्रों में क्रांति लाने की भावना जागती है । वहां से मोर्चे का सफर जो उपनयास के अंत तक भी पूरा नहीं होता, बहुत परिवर्तन से गुजरता है । लक्ष्य जानना और लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता जानना दो अलग बातें हैं । छात्र गलतियों से सीख कर अपना रास्ता समझते हैं । इस उपन्यास के कथावाचक उन सबके प्रतिनिधि हैं जो मुद्दे का समर्थन करते हैं, मगर छात्रों की तरह रोज़ सड़क पर नहीं उतर सकते । वो अत्याचार के खिलाफ हैं, मगर सच यही है की हर दिन काम छोड़ कर हर कोई सड़कों पर नहीं कूद सकता ।
Circa 1970-80, BHU. Throws up layered questions on the cause and substance of student protests of the times. Why (& what) should we study? Is there any meaning to the student issues, when they all crop up from the bigger issues of society & economics? Is language even an issue at all?
Well crafted. With four decades in University, Kashinath ji breathes BHU. Though the substance is every bit relevant even today, one wonders if it still finds meaning with majority. And that itself poses a big question!