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बिल्लेसुर बकरिहा

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हिंदी साहित्य में सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' एक ऐसे साहित्यकार रहे हैं जिन्होंने ख़ुद को वर्षों से चली आ रही साहित्य की परिपाटी के प्रवाह में बहने नहीं दिया, बल्कि वे हमारे सामने युग निर्माण की प्रक्रिया में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करने के रूप में प्रस्तुत हुए। निराला का जीवन सतत् संघर्षों के घिराव में गुज़रा, लेकिन इस संघर्ष ने उनके साहित्य की क्रांति को प्रतिबद्ध नहीं किया। बावजूद इसके, इनके साहित्य ने चेतना एवं सामर्थ्यता के साथ नूतन परिवेश का आविर्भाव किया। इस पुस्तक को पाठक के बीच लाने का हमारा उद्देश्य ही निराला की महत्ता को समझने से है। उम्मीद है कि हमारा यह प्रयास आपको पसंद आयेगा।

143 pages, Hardcover

First published January 1, 2007

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About the author

निराला का जन्म बंगाल में मेदिनीपुर ज़िले के महिषादल गाँव में हुआ था। उनका पितृग्राम उत्तर प्रदेश का गढ़कोला (उन्नाव) है। उनके बचपन का नाम सूर्य कुमार था। बहुत छोटी आयु में ही उनकी माँ का निधन हो गया। निराला की विधिवत स्कूली शिक्षा नवीं कक्षा तक ही हुई। पत्नी की प्रेरणा से निराला की साहित्य और संगीत में रुचि पैदा हुई। सन्‌ १९१८ में उनकी पत्नी का देहांत हो गया और उसके बाद पिता, चाचा, चचेरे भाई एक-एक कर सब चल बसे। अंत में पुत्री सरोज की मृत्यु ने निराला को भीतर तक झकझोर दिया। अपने जीवन में निराला ने मृत्यु का जैसा साक्षात्कार किया था उसकी अभिव्यक्ति उनकी कई कविताओं में दिखाई देती है।

सन्‌ १९१६ में उन्होंने प्रसिद्ध कविता जूही की कली लिखी जिससे बाद में उनको बहुत प्रसिद्धि मिली और वे मुक्त छंद के प्रवर्तक भी माने गए। निराला सन्‌ १९२२ में रामकृष्ण मिशन द्वारा प्रकाशित पत्रिका समन्वय के संपादन से जुड़े। सन १९२३-२४ में वे मतवाला के संपादक मंडल में शामिल हुए। वे जीवनभर पारिवारिक और आर्थिक कष्टों से जूझते रहे। अपने स्वाभिमानी स्वभाव के कारण निराला कहीं टिककर काम नहीं कर पाए। अंत में इलाहाबाद आकर रहे और वहीँ उनका देहांत हुआ।

छायावाद और हिंदी की स्वच्छंदतावादी कविता के प्रमुख आधार स्तंभ निराला का काव्य-संसार बहुत व्यापक है। उनमें भारतीय इतिहास, दर्शन और परंपरा का व्यापक बोध है और समकालीन जीवन के यथार्थ के विभिन्‍न पक्षों का चित्रण भी ।भावों और विचारों की जैसी विविधता, व्यापकता और गहराई निराला की कविताओं में मिलती है वैसी बहुत कम कवियों में है। उन्होंने भारतीय प्रकृति और संस्कृति के विभिन्‍न रूपों का गंभीर चित्रण अपने काव्य में किया है। भारतीय किसान जीवन से उनका लगाव उनकी अनेक कविताओं में व्यक्त हुआ है।

यद्यपि निराला मुक्त छंद के प्रवर्तक माने जाते हैं तथापि उन्होंने विभिन्‍न छंदों में भी कविताएँ लिखी हैं। उनके काव्य-संसार में काव्य-रूपों की भी विविधता है। एक ओर उन्होंने राम की शक्ति पूजा और तुलसीदास जैसी प्रबंधात्मक कविताएँ लिखीं तो दूसरी ओर प्रगीतों की भी रचना की। उन्होंने हिंदी भाषा में गज़लों की भी रचना की है। उनकी सामाजिक आलोचना व्यंग्य के रूप में उनकी कविताओं में जगह-जगह प्रकट हुई है।

निराला की काव्यभाषा के अनेक रूप और स्तर हैं! राम की शक्ति पूजा और तुलसीदास में तत्समप्रधान पदावली है तो शिक्षुक जैसी कविता में बोलचाल की भाषा का सुजनात्मक प्रयोग। भाषा का कसाव, शब्दों की सितव्ययिता और अर्थ की प्रधानता उनकी काव्य-धाषा की जानी-पहचानी विशेषताएँ हैं।

निराला की प्रमुख काव्य कृतियाँ हैं-परिमल, गीतिका, अनामिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, नए पत्ते, बेला, अर्चना, आराधना, गीतगुंज आदि। निराला ने कविता के अतिरिक्त कहानियाँ और उपन्यास भी लिखे। उनके उपन्यासों में बिल्लेसुर बकारिहा विशेष चर्चित हुआ।उनका संपूर्ण साहित्य निराला रचनावली के आठ खंडों में प्रकाशित हो चुका है।

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Displaying 1 - 4 of 4 reviews
Profile Image for Bhawna Sharma.
124 reviews
February 27, 2026
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' जी ने महाराणा प्रताप के बारे में बहुत सुंदर लिखा है, लेकिन कहीं-कहीं वे अपने विचारों और सोच को छिपा नहीं सके। एक रानी को जब अकबर उठवा के लाया तो उस रानी के मुख से यह कहलवाया कि अकबर को अभी बहुत महान कार्य करने हैं, शूद्रों के उद्धार के लिए मुगल आए हैं। निराला जी अपनी पुस्तकों में जात-पात के बारे में बहुत लिखते हैं, लेकिन 'वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप' पर लिखी पुस्तक में जब अकबर ने किसी की पत्नी, किसी रानी का बलात्कार करने के लिए उठवाया था, तो ऐसी बकवास लिखने की क्या आवश्यकता थी? आजकल लोग जो ये राग अलापते रहते हैं 'अच्छा हुआ मुगल आए, अच्छा हुआ अंग्रेजों ने राज किया' यह सब इन्हीं जैसे लेखकों का दिया हुआ झुनझुना है। मुगलों ने कौन-सा अत्याचार से किसको बचाया? और अगर बचाया, तो शोषण कैसे हुआ? मुगलों की स्वयं की ऐतिहासिक पुस्तकों में लिखा है कि उन्होंने हजारों साल बैठकर मंदिर तोड़े, मंदिरों का धन लूटा, हमारे भगवानों की मूर्तियों को तोड़ा, जनेऊ भर-भर के हिंदू मारे, महिलाओं का बलात्कार किया, पर हमारे देश के लोग कैसे मान लेंगे? उन्हें तो हर आक्रांता महान लगता है, वे न आते तो हमारे देश में कुछ होता ही नहीं।हमारे राजाओं ने युद्ध लड़ा, उनकी रानियों ने जौहर किया, और यहाँ ये घुट्टी पिला रहे हैं कि मुगल महान कार्य करने के लिए भारत में आए थे।
Profile Image for Rudra .
18 reviews
July 31, 2025
पुस्तक -बिल्लेसुर बकरिहा
लेखक -सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
प्रकाशन वर्ष - १९४१



यह रचना बिल्लेसुर नामक मामूली किसान के अथक जीवन-संघर्ष पर केंद्रित हैं। इस कृति को निराला स्वयं प्रगतिशील साहित्य का उदाहरण बताते हैं।
बिल्लेसुर जाति के ब्राह्मण और अपने जीवन को उचित दिशा देने को वह गांव से शहर की ओर प्रस्थान करते हैं ,
जब बिल्लेसुर को संसार पार करने कोई विधि नहीं मिली तब उन्होंने बकरी पालने का कारोबार किया जिससे गांव वालों ने सहज विनोद प्रियता से उनका नामकरण बिल्लेसुर बकरिहा कर दिया।
अपनी जीवन के शुरुआती दौर में जीविका की समस्या हल होते हुए न देखकर बिल्लेसुर बर्दवान पहुंचते हैं, जहां के महाराज के यहां सत्तीदीन सुकुल जमींदार हैं। और इनके दूर के परिचित भी हैं तो वहां उन्हें कोई बड़ी नौकरी तो नहीं चिट्ठियां बांटने का काम मिल जाता हैं। जमींदार की पत्नी के शासन में उनसे घरेलू कामों को कसकर अंजाम दिलवाया जाता हैं । जमींदार की पत्नी व्यंग्य और ताने कंसती रहती हैं, जीवन के आरंभ से इनका जीवन दुखों में बीता हैं इसलिए अब दुःख झेलने की बिल्लेसुर की आदत पड़ गई हैं।
बिल्लेसुर सत्तीदीन को प्रसन्न करके अपनी नौकरी पक्की कराने के लालच से उनसे गुरु मंत्र लेते हैं, जिससे सत्तीदीन की कृपा हो जाय मगर सालभर की साधना तपस्या के बाद भी कोई परिणाम नहीं निकलता देख और गुरुवाइन के तंज से परेशान होकर आख़िरकार बिल्लेसुर सब कंठी माला फेककर वापस अपने गांव लौटते हैं।
बकरियां पालने के अपने विचार के पीछे बिल्लेसुर एक सीधा तर्क गढ़ते हैं -
"जब जरूरत पर ब्राह्मणों को हल की मूठ पकड़नी पड़ी हैं, जूते की दुकान खोलनी पड़ी हैं, तब बकरी पालन कौन बुरा काम हैं?"
बिल्लेसुर अपने गांव आकर रहने की जो जगह पाते हैं उसका विवरण निराला इस प्रकार बताते हैं -
"मकान के सामने एक अंधा कुआं हैं और एक इमली का पेड़ हैं। बारिश के पानी से धुलकर दीवारे ऊबड़ - घाबड़ हो गई हैं जैसे दीवारों से ही पनाले फूटे हो। भीतर के पनाले का मुंह भर जाने से बरसात का पानी दहलीज की डेहरी के नीचे गड्ढा बन गया हैं। दहलीज का फर्श कहीं भी बराबर नहीं हैं, उसके ऊपर लेटने की बात क्या, चारपाई भी उस पर नहीं डाली जा सकती।"
गांव में रहने के कुछ समय बाद यह गांव उनके दुश्मनों का गढ़ हो जाता हैं, गांव के इस भयंकर परिवेश से बिल्लेसुर जूझते हैं। वह विवाह के लिए भी उत्सुक हैं, लड़की के रूप का विचार आते ही उनके हृदय में सैकड़ों कलियां चटकने लगती हैं, खुशबू उड़ने लगती हैं।
निराला बिल्लेसुर के लिए लिखते हैं - 'हमारे सुकरात के जबान न थी, पर इसकी फिलासफी लचर न थी, सिर्फ कोई इसकी सुनता न था।'
बिल्लेसुर एक दिन महावीर जी से अपनी बकरियों की रखवाली के लिए प्रार्थना करते हैं तथा शकरकंदिया बोने की तैयारी और इससे होने वाले लाभ की कल्पना करते हैं। मगर कुछ ऐसा होता हैं कि उनकी महावीर जी पर श्रद्धा एक झटके में टूट जाती हैं ।
बिल्लेसुर की जिजीविषा ही उन्हें एक तरह का नायकत्व प्रदान करती हैं ।
जिन परिस्थितियों में जीवन असह्य हो जाता हैं, दुःख ही बिल्लेसुर का ईश्वर है। बिल्लेसुर दुःख में रहने की कला जान गए हैं। समाज और जीवन के प्रति उनकी आँखें खुली हुई हैं।
ग्रामीण इलाकों के किसानों के चरित्रों से निराला यह नतीजा निकालते हैं कि मनुष्य का विनोदी स्वभाव दुःखी जीवन जीने में उन्हें आंतरिक बल देता हैं। इस उपन्यास में गहरी पीड़ा और हास्य - विनोद का जैसा संतुलन देखा जाता हैं वैसा किसी और रचना में नहीं मिलेगा।
जीवन को देखने का यह ढंग हम संसार के महान यथार्थवादी लेखकों में ही देख सकते हैं - जो निराला के विभिन्न साहित्यिक रचना में मौजूद होता हैं।

प्रख्यात समीक्षक डॉ रामविलास शर्मा ने 'निराला की साहित्य साधना के द्वितीय खण्ड के पृष्ठसंख्या 479 में बिल्लेसुर बकरिहा' को 'राम की शक्ति-पूजा ' का विकल्प कहा हैं।


































Profile Image for Om Tiwari.
1 review
May 27, 2025
Shows how the economic prosperity aids one's social standing.
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