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असन्तोष के दिन

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91 pages, Hardcover

First published January 1, 2004

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डॉ. राही मासूम रजा का जन्म १ अगस्त १९२७ को एक सम्पन्न एवं सुशिक्षित शिआ परिवार में हुआ। उनके पिता गाजीपुर की जिला कचहरी में वकालत करते थे। राही की प्रारम्भिक शिक्षा गाजीपुर में हुई और उच्च शिक्षा के लिये वे अलीगढ़ भेज दिये गए जहाँ उन्होंने १९६० में एम०ए० की उपाधि विशेष सम्मान के साथ प्राप्त की। १९६४ में उन्होंने अपने शोधप्रबन्ध “तिलिस्म-ए-होशरुबा” में चित्रित भारतीय जीवन का अध्ययन पर पी०एच०डी० की उपाधि प्राप्त की। तत्पश्चात्‌ उन्होंने चार वर्षों तक अलीगढ़ विश्वविद्यालय में अध्यापन का कार्य भी किया।

अलीगढ़ में रहते हुए ही राही ने अपने भीतर साम्यवादी दृष्टिकोण का विकास कर लिया था और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वे सदस्य भी हो गए थे। अपने व्यक्तित्व के इस निर्माण-काल में वे बड़े ही उत्साह से साम्यवादी सिद्धान्तों के द्वारा समाज के पिछड़ेपन को दूर करना चाहते थे और इसके लिए वे सक्रिय प्रयत्न भी करते रहे थे।

१९६८ से राही बम्बई में रहने लगे थे। वे अपनी साहित्यिक गतिविधियों के साथ-साथ फिल्मों के लिए भी लिखते थे जो उनकी जीविका का प्रश्न बन गया था। राही स्पष्टतावादी व्यक्ति थे और अपने धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय दृष्टिकोण के कारण अत्यन्त लोकप्रिय हो गए थे। कलम के इस सिपाही का निधन १५ मार्च १९९२ को हुआ।

राही का कृतित्त्व विविधताओं भरा रहा है। राही ने १९४६ में लिखना आरंभ किया तथा उनका प्रथम उपन्यास मुहब्बत के सिवा १९५० में उर्दू में प्रकाशित हुआ। वे कवि भी थे और उनकी कविताएं ‘नया साल मौजे गुल में मौजे सबा', उर्दू में सर्वप्रथम १९५४ में प्रकाशित हुईं। उनकी कविताओं का प्रथम संग्रह ‘रक्स ए मैं उर्दू’ में प्रकाशित हुआ। परन्तु वे इसके पूर्व ही वे एक महाकाव्य अठारह सौ सत्तावन लिख चुके थे जो बाद में “छोटे आदमी की बड़ी कहानी” नाम से प्रकाशित हुई। उसी के बाद उनका बहुचर्चित उपन्यास “आधा गांव” १९६६ में प्रकाशित हुआ जिससे राही का नाम उच्चकोटि के उपन्यासकारों में लिया जाने लगा। यह उपन्यास उत्तर प्रदेश के एक नगर गाजीपुर से लगभग ग्यारह मील दूर बसे गांव गंगोली के शिक्षा समाज की कहानी कहता है। राही नें स्वयं अपने इस उपन्यास का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए कहा है कि “वह उपन्यास वास्तव में मेरा एक सफर था। मैं गाजीपुर की तलाश में निकला हूं लेकिन पहले मैं अपनी गंगोली में ठहरूंगा। अगर गंगोली की हकीकत पकड़ में आ गयी तो मैं गाजीपुर का एपिक लिखने का साहस करूंगा”।

राही मासूम रजा का दूसरा उपन्यास “हिम्मत जौनपुरी” मार्च १९६९ में प्रकाशित हुआ। आधा गांव की तुलना में यह जीवन चरितात्मक उपन्यास बहुत ही छोटा है। हिम्मत जौनपुरी लेखक का बचपन का साथी था और लेखक का विचार है कि दोनों का जन्म एक ही दिन पहली अगस्त सन्‌ सत्तईस को हुआ था।

उसी वर्ष राही का तीसरा उपन्यास “टोपी शुक्ला” प्रकाशित हुआ। इस राजनैतिक समस्या पर आधारित चरित प्रधान उपन्यास में भी उसी गांव के निवासी की जीवन गाथा पाई जाती है। राही इस उपन्यास के द्वारा यह बतलाते हैं कि सन्‌ १९४७ में भारत-पाकिस्तान के विभाजन का ऐसा कुप्रभाव पड़ा कि अब हिन्दुओं और मुसलमानों को मिलकर रहना अत्यन्त कठिन हो गया।

सन्‌ १९७० में प्रकाशित राही के चौथे उपन्यास “ओस की बूंद” का आधार भी वही हिन्दू-मुस्लिम समस्या है। इस उपन्यास में पाकिस्तान के बनने के बाद जो सांप्रदायिक दंगे हुए उन्हीं का जीता-जागता चित्रण एक मुसलमान परिवार की कथा द्वारा प्रस्तुत किया गया है।

सन्‌ १९७३ में राही का पांचवा उपन्यास “दिल एक सादा कागज” प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास के रचना-काल तक सांप्रदायिक दंगे कम हो चुके थे। पाकिस्तान के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया गया था और भारत के हिन्दू तथा मुसलमान शान्तिपूर्वक जीवन बिताने लगे थे। इसलिए राही ने अपने उपन्यास का आधार बदल दिया। अब वे राजनैतिक समस्या प्रधान उपन्यासों को छोड़कर मूलतः सामाजिक विषयों की ओर उन्मुख हुए। इस उपन्यास में राही ने फिल्मी कहानीकारों के जीवन की गतिविधियों आशा-निराशाओं एवं सफलता-असफलता का वास्तविक एवं मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया है।

सन्‌ १९७७ में प्रकाशित उपन्यास “सीन ७५” का विषय भी फिल्मी संसार से लिया गया है। इस सामाजिक उपन्यास में बम्बई महानगर के उस बहुरंगी जीवन को
विविध कोणों से देखने और उभारने का प्रयत्न किया गया है जिसका एक प्रमुख अंग फिल्मी जीवन भी है। विशेषकर इस उपन्यास में फिल्मी जगत से सम्बद्ध व्यक्तियों के जीवन की असफलताओं एवं उनके दुखमय अन्त का सजीव चित्रण किया गया है।

सन्‌ १९७८ में प्रकाशित राही मासूम रजा के सातवें उपन्यास “कटरा बी आर्जू” का आधार फिर से राजनैतिक समस्या हो गया है। इस उपन्यास के द्वारा लेखक यह बतलाना चाहते हैं कि इमरजेंसी के समय सरकारी अधिकारियों ने जनता को बहुत कष्ट

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Profile Image for Rudra .
18 reviews
June 17, 2025
पुस्तक - असंतोष के दिन
लेखक - राही मासूम रज़ा
प्रकाशन वर्ष - १९८६


यह कहानी हैं सन् 84 के दंगों की उन दंगों की जहां सरकारी आंकड़े झूठ बोलते हैं और सबने अपने अपने हिस्से का देश बांट लिया था मुंबई हो गई थी आमची मुंबई बाला साहेब की, आंध्र श्री न टी आर का, पंजाब संत भिंडरवाले का, कर्नाटक श्री राजकुमार का, यूपी एटा के डाकूओं का, राजस्थान चंबल के डाकुओं का, श्रीनगर डॉ फारुख अब्दुला का इत्यादि, कोई भी हिंदुस्तान का पोस्टल एड्रेस नहीं बताता है, कोई नहीं बताता हैं कि हिंदुस्तान का दाखिल खारिज किसके नाम हैं ? ये लावारिश मुल्क तू मेरा है ।
कहानी हैं संपादक (नई आवाज और अदब)अली अब्बास मुसवी की जो अच्छे दर्जे का संपादक हैं और शायरों और सिनेमा में काबिले तारीफ पकड़ रखता हैं।
अब्बास साहब के हिसाब से फैज़ एक साधारण शायर हैं और मार्क्सवादी आलोचक अपने अनुसार उनके रचनाओं से मतलब निकाल लेते हैं, उनका कहना हैं कि शायरी दिल की भाषा हैं उसका राजनीति से कोई संबंध नहीं हैं

उसका जो काम हैं वह अहले सियासत जाने
मेरा पैगाम मुहब्बत है जहाँ तक पहुंचे ।
- जिगर मुरादाबादी

अपनी छोटी बहन सलमा के अंतधार्मिक प्रेम और विवाह पर अब्बास का कहना था कि
इश्क़ पोस्टल एड्रेस नहीं पूछता पर वह हमेशा ठीक पते पर पहुंच जाता हैं ।
यह वह दौर है जब समाचार के लिए आम जनता का भरोसा आकाशवाणी से ज्यादा बीबीसी पर हो गया था।
84 के दौर की फ़िल्मों की समीक्षा अब्बास मियां कहते हैं कैसे चित्र पटल पर संजीदा फिल्मों (आक्रोश, अर्धसत्य, सारांश)के जगह पर अश्लीलता परोसी जा रही हैं।
अब्बास अपने परिवार (पत्नी - सैयदा, पुत्री - फातमा, पुत्र- माजिद, वाजिद)के साथ मुंबई (बांद्रा ) में रहता हैं
लेखक ने उपन्यास में मुद्दा उठाया है कि दंगों में होने वाले मौत और बेघर हुए लोगों की संख्या में सरकारी आंकड़ों में हेर फेर, दंगों के बाद फिल्म इंडस्ट्री का टुच्चापन, पुलिस ब्रूटेलिती और जातिवाद एवं धर्मवाद पर खास व्याख्या एवं चिंतन करते हैं।
मासूम साहब ने उपन्यास में बहुत बारीकी से सामाजिक उलझन,धर्म से परे रिश्ते को बहुत गहराई से दिखाया हैं।
दंगों में राजनीतिक साझेदारी और चुप्पी को लेकर लेखक बोलते हैं कि
भारतीय राजनीति चुप्प के सहारे खड़ी थी भारतीय पत्रकार बोल रहे थे।
उपन्यास की भाषा सरल हिंदी और उर्दू मिश्रित प्रयोग
खूबसूरत शेरो का प्रयोग कई दफा किया गया हैं। बस यह समझिए उपन्यास ना हुआ नदी हुई आप पढ़ते जाओ यह आपको बहाए ले जाएंगी और अंत में किनारे पर छोड़ जाएगी बहुत से सवालों के साथ।



Profile Image for Aditya.
9 reviews13 followers
February 29, 2024
देख तो दिल कि जाँ से उठता है
ये धुआँ सा कहाँ से उठता है

As I finished the book, the couplet from Mir came to mind instantly for some reason.

The shortest way to summarise the book is this - a long Manto story set in the 80s. Similarly shocking, similarly blunt, and similar in revealing the hollowness of society. A story about no one and everyone at the same time.
Profile Image for Kashif Umair.
24 reviews2 followers
October 1, 2024
Read it. It is a masterpiece. Read it to understand Hindustan. Its society, its politics, its cities, its people, its newspapers and magazines. A masterpiece work.
Displaying 1 - 3 of 3 reviews

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