पुस्तक - असंतोष के दिन
लेखक - राही मासूम रज़ा
प्रकाशन वर्ष - १९८६
यह कहानी हैं सन् 84 के दंगों की उन दंगों की जहां सरकारी आंकड़े झूठ बोलते हैं और सबने अपने अपने हिस्से का देश बांट लिया था मुंबई हो गई थी आमची मुंबई बाला साहेब की, आंध्र श्री न टी आर का, पंजाब संत भिंडरवाले का, कर्नाटक श्री राजकुमार का, यूपी एटा के डाकूओं का, राजस्थान चंबल के डाकुओं का, श्रीनगर डॉ फारुख अब्दुला का इत्यादि, कोई भी हिंदुस्तान का पोस्टल एड्रेस नहीं बताता है, कोई नहीं बताता हैं कि हिंदुस्तान का दाखिल खारिज किसके नाम हैं ? ये लावारिश मुल्क तू मेरा है ।
कहानी हैं संपादक (नई आवाज और अदब)अली अब्बास मुसवी की जो अच्छे दर्जे का संपादक हैं और शायरों और सिनेमा में काबिले तारीफ पकड़ रखता हैं।
अब्बास साहब के हिसाब से फैज़ एक साधारण शायर हैं और मार्क्सवादी आलोचक अपने अनुसार उनके रचनाओं से मतलब निकाल लेते हैं, उनका कहना हैं कि शायरी दिल की भाषा हैं उसका राजनीति से कोई संबंध नहीं हैं
उसका जो काम हैं वह अहले सियासत जाने
मेरा पैगाम मुहब्बत है जहाँ तक पहुंचे ।
- जिगर मुरादाबादी
अपनी छोटी बहन सलमा के अंतधार्मिक प्रेम और विवाह पर अब्बास का कहना था कि
इश्क़ पोस्टल एड्रेस नहीं पूछता पर वह हमेशा ठीक पते पर पहुंच जाता हैं ।
यह वह दौर है जब समाचार के लिए आम जनता का भरोसा आकाशवाणी से ज्यादा बीबीसी पर हो गया था।
84 के दौर की फ़िल्मों की समीक्षा अब्बास मियां कहते हैं कैसे चित्र पटल पर संजीदा फिल्मों (आक्रोश, अर्धसत्य, सारांश)के जगह पर अश्लीलता परोसी जा रही हैं।
अब्बास अपने परिवार (पत्नी - सैयदा, पुत्री - फातमा, पुत्र- माजिद, वाजिद)के साथ मुंबई (बांद्रा ) में रहता हैं
लेखक ने उपन्यास में मुद्दा उठाया है कि दंगों में होने वाले मौत और बेघर हुए लोगों की संख्या में सरकारी आंकड़ों में हेर फेर, दंगों के बाद फिल्म इंडस्ट्री का टुच्चापन, पुलिस ब्रूटेलिती और जातिवाद एवं धर्मवाद पर खास व्याख्या एवं चिंतन करते हैं।
मासूम साहब ने उपन्यास में बहुत बारीकी से सामाजिक उलझन,धर्म से परे रिश्ते को बहुत गहराई से दिखाया हैं।
दंगों में राजनीतिक साझेदारी और चुप्पी को लेकर लेखक बोलते हैं कि
भारतीय राजनीति चुप्प के सहारे खड़ी थी भारतीय पत्रकार बोल रहे थे।
उपन्यास की भाषा सरल हिंदी और उर्दू मिश्रित प्रयोग
खूबसूरत शेरो का प्रयोग कई दफा किया गया हैं। बस यह समझिए उपन्यास ना हुआ नदी हुई आप पढ़ते जाओ यह आपको बहाए ले जाएंगी और अंत में किनारे पर छोड़ जाएगी बहुत से सवालों के साथ।