."एक बुजुर्ग ने मुझे रोक कर कहा-" कालिंदी पढ़ रहा हूँ ! आहा कैसा चित्र खींचा है उन दिनों का ! लगता है एक बार फिर उसी अल्मोड़ा में पहुँच गया हूँ !" "मुझे लगा मुझे कुमाऊ का सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार मिल गया !". शिवानी के यह शब्द उपन्यास की पाठकों तक सहज पहुँच और स्वयं उनकी अपने लाखों सरल, अनाम पाठकों के प्रति अगाध समर्पण भाव का आईना है ! डॉक्टर कालिंदी एक स्वयंसिद्धा लड़की है, जिसने अपने जीवन के झंझावातों से अपनी शर्तों पर मुकाबला किया ! कुमाऊँ की स्त्री शक्ति के सुदीर्घ शोषण और उसकी अदम्य सहनशक्ति और जिजीविषा का दस्तावेज यह उपन्यास नए और पुराने के टकराव और पुनर्सृजन की गाथा भी है ! शिवानी की मातृभूमि अल्मोड़ा और उस अंचल के गांवों की मिटटी-बयार की गंध से भरी कालिंदी की व्यथा-कथा भारत की उन सैकड़ों लड़कियों की महागाथा है, जो आधुनिकता का स्वागत करती हैं, लेकिन परंपरा की डोर को भी नहीं काट पातीं ! अपने पुरुष उत्पीड्कों और शोषकों के प्रति भी अनथक स्नेह-ममत्व बनाए रखनेवाली कालिंदी और उसकी एकाकिनी माँ अन्नपूर्णा क्या आज भी देश के हर अंचल में मौजूद नहीं?
(1923– 2003) was one of the popular Hindi magazine story writers of the 20th century and a pioneer in writing Indian women based fiction. She was awarded the Padma Shri for her contribution to Hindi literature in 1982. Almost all of her works are in print today and widely available across India.
She garnered a massive following in the pre-television 60s and 70s, as her literary works were serialised in Hindi magazines like Dharmayug and Saptahik Hindustan, and in TV serials n films.
Upon her death in 2003, Government of India described her contributions to Hindi literature as, “…in the death of Shivani the Hindi literature world has lost a popular and eminent novelist and the void is difficult to fill”
शिवानी के उपन्यास ‘कालिंदी’ में मुख्य किरदार डॉ कालिंदी एक आत्मनिर्भर लड़की है, जो जिंदगी में आई मुश्किलात से अकेले ही लड़ती आ रही है, अल्मोड़ा और कुमाऊँ अंचल के दृश्यों से सजा ये उपन्यास जहां कालिंदी जैसे सशक्त किरदार को आधुनिकता की सीढ़ी चढ़ते दिखाता है वहीं अपनी जड़ो के लिए उसके लगाव को भी बखूबी पेश करता है, अपने आत्मसम्मान को ऊपर रखकर कालिंदी जिंदगी के कुछ ऐसे निर्णय लेती है जो उसकी जीवन राहों को ऊबड़-खाबड़ बना जाते हैं, एक लड़की आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने पर भी समाज की उन पुरानी मान्यताओं के चलते कितनी विवश होती है, जीवन का यही पहलू दर्शाता नॉवेल है ‘कालिंदी’।
‘कैसा अद्भुत शहर था तब अल्मोड़ा! नवजात शिशु की देह से जैसी मीठी-मीठी खुशबू आती है, वैसी ही देहपरिमल थी उस शहर की। देहरी में गुलाबी धूप उतरते ही दादी कटोरी में गर्म तेल लेकर, दोनों पैर पसार उस पर उसकी नग्न गुलगोथनी पुत्री को लिटा, रगड़-रगड़कर उबटन लगातीं,
अरी अन्ना, दान किए हैं तूने, ऐसी सुन्दरी राजरानी चेहड़ी (लड़की) को जन्म दिया है-ऐनमैन अपनी नानी पर गई है, ऐसा ही दूध का सा उजला रंग था तेरी माँ का, पर तेरे बाप ने इसका नाम कालिंदी क्या देखकर रखा? कालिंदी का जल तो काला होता है, क्यों? और फिर हमारे यहाँ कहते हैं, लड़की का नाम नदी या नक्षत्र पर नहीं रखना चाहिए, कमला रख दे इसका नाम साक्षात कमला ही है।’क्या नाम बदलने से ही लड़की का भाग्य बदल जाता ?”
शिवानी जी की लेखन में जो कुमाओं की ख़ुशबू है वो पाठक के चित्त को सरोबार कर देती हैं। इतने सीधे शब्दों में वो गाँव शहर देश विदेश, ख़ाली होते गाँव, पलायन, बूढ़े माँ बाप इतने सारे संवाद कर डालती है के पता हे नहीं चलता की में एक उपन्यास पढ़ रहा हूँ - ऐसा लगता है जैसे साक्षात् रूप में स्वयं भी कहानी का एक पात्र हूँ - बस मेरे बारें में कुछ लिखा नहीं है।
कुछ पुण्य है पुनरजन्म के की ऐसे आलोकिक लेखनी पढ़ रहा हूँ।
कालिंदी उपन्यास कालिंदी नाम के पात्र के इर्द गिर्द घूमता एक उपन्यास है जिसमे नारी के जीवन से जुड़ी बातें और उनकी संवेदनाओं को शिवानी जी ने पाठकों के सामने रखा है। पूरा उपन्यास कालिंदी उसकी माँ अन्नपूर्णा, उसके मामा देवेंद्र के जीवन के ऊपर प्रकाश डालता है। इस उपन्यास को अगर आप पढ़ेंगे तो पायेंगे किस प्रकार उपदेश देना तो आसान होता मगर उसपर अमल करना कितना कठीन कार्य होता है। देवेन्द्र जो की एक बड़े पदाधिकारी होते हैं और कालिंदी का पालन पोषण करते हैं उसे न्याय अन्याय के बारे में बताते हैं ख़ुद दहेज देने को तैयार हो जाते हैं। अन्नपूर्णा सारा जीवन अपने तीन भाई को पालने में और माता पिता के देहांत के बाद कालिंदी के जीवन के बारे में चिंता करते हुए बिता देती है। कालिंदी जो हमेशा कहती है कि मैं उन लड़को को जवाब दूंगी जो कभी किसी लड़की से छेड़ छाड़ करते हैं वही ख़ुद के साथ जब वो घटना होती है तो चुप हो जाती है अपनी सखी के कारण। उपन्यास में अल्मोड़ा नामक स्थान के बारे में बहुत ही विस्तृत रूप से बताया गया है और पहाड़ के संस्कृति को हमारे सामने रखा गया है। इस उपन्यास में पुराने दोस्तों का ज़िक्र और उनकी यादों का जब सैलाब आता है तो कैसे सब पुरानी बातों को भूल कर उन्हें देखने को आँखें तरस जाती हैं यह भी दर्शाया गया है। इर्ष्या के कारण कैसे जब आप किसी को दूसरों के सामने नीचा दिखाते हैं और भले वो इंसान आप के साथ कुछ ग़लत ना किया हो पर तथा कथित कहानियों के कारण उसका जीना दुश्वार कर देते हैं दिखाया गया है। ये उपन्यास नारी के भावों का समावेश है और उसके त्याग, लड़ाई, आत्मविश्वास, सहनशीलता और उसके डर को हमारे सामने रखती एक कहानी है जो सच के बहुत करीब भी है। भाषा बहुत सरल नहीं है उपन्यास की। शिवानी जी के उपन्यास में पात्र के साथ साथ आस पास के वातावरण का वर्णन भी ख़ूब अच्छे से होता है। छोटी से छोटी बारिकियों पर ध्यान देना उनके लिखने की शैली में शामिल है जो आपको यहां भी देखने को मिलेगा।⠀
A fortnight back somebody asked me if I have read Shivani, the leading woman story-teller from hills, and I recalled I had-long time back and I dont even know the name/concept/story of that book. Well that question was the catalyst for me to explore her books. "Kalinidi" is the second book I read after that conversation. And I loved it. The story shares the story of Dr Kalinidi, a strong-willed woman and through her the story unfolds the myopic view with which single women are seen, the follies of old age and sons who left their parents back home for greener pastures, the nostalgia-filled life of hills and her heart-land Almora. I found the ending of the book open-ended but then no other ending culd have done justice to the story-line.