1950 और 1960 का भारत कुछ वैसा ही था जैसे कोई इंसान लंबी नींद से जागकर अपनी दुनिया को नए सिरे से पहचान रहा हो। आज़ादी मिल चुकी थी, लेकिन ज़िंदगी अभी अपने मतलब खोज रही थी। शहर बदल रहे थे, नौकरियाँ बढ़ रही थीं, लोग आधुनिक होने की कोशिश कर रहे थे, मगर दिलों के भीतर पुरानी सोच अब भी जमी हुई थी। इसी बदलाव के बीच हिंदी साहित्य ने भी करवट ली। ‘नई कहानी आंदोलन’ न�� उपदेशों की भारी भाषा छोड़कर ज़िंदगी की हल्की लेकिन सच्ची धड़कनों को पकड़ना शुरू किया। अब कहानियाँ आदर्श नहीं गढ़ती थीं, बल्कि इंसान की थकान, उसकी उलझन, उसके डर और उसकी छोटी-छोटी खुशियों को वैसे ही रख देती थीं, जैसे वे सच में होती हैं।
इसी संवेदनशील समय की एक बेहद शांत लेकिन गहरी कृति है पचपन खम्भे लाल दीवारें, जिसे लिखा है उषा प्रियंवदा ने। यह कोई शोर मचाने वाली किताब नहीं है। यह तो जैसे शाम के समय खुली खिड़की से आती हवा है, जो बिना आवाज़ किए पूरे कमरे का मिज़ाज बदल देती है। पढ़ते-पढ़ते लगता है कि कोई बहुत धीरे से आपकी ज़िंदगी के भीतर झाँक रहा है और वह सब दिखा रहा है, जिसे आप रोज़ देखते हैं, पर कभी ठीक से समझ नहीं पाते।
इस उपन्यास की नायिका सुषमा पढ़ी-लिखी है, नौकरी करती है और अपने पैरों पर खड़ी है। आज के समय में देखें तो वह पूरी तरह आधुनिक भारतीय स्त्री की तस्वीर लगती है। लेकिन उसकी ज़िंदगी सिर्फ़ इतनी नहीं है। उसके हर फैसले के साथ परिवार की उम्मीदें चलती हैं, समाज की निगाहें चलती हैं और वह अदृश्य डर चलता है, जो हर इच्छा से पहले पूछ लेता है , “यह सही है क्या?” सुषमा आज़ाद तो है, मगर बस कमाने तक। अपने मन से जीने की आज़ादी अब भी उससे बहुत दूर है।
यह उपन्यास आज़ादी के बाद के मध्यवर्ग की बहुत सच्ची तस्वीर सामने रखता है। यहाँ सपने तो बड़े हैं, लेकिन उन्हें जीने की जगह बहुत छोटी है। लोग तरक्की की बात करते हैं, लेकिन परंपराओं की दीवारें हर कदम पर खड़ी मिलती हैं। स्त्री की स्वतंत्रता यहाँ भाषणों में है, काग़ज़ों में है, मगर असल ज़िंदगी में उसे रोज़ साबित करनी पड़ती है। और कई बार थककर चुपचाप मान भी लेनी पड़ती है।
“पचपन खम्भे लाल दीवारें” दरअसल उन्हीं दीवारों की कहानी है जो दिखाई नहीं देतीं, लेकिन हर रास्ता रोक लेती हैं। यह प्रेम की कमी की कहानी नहीं है, बल्कि साहस की कीमत की कहानी है। उस समय जब नारीवाद कोई बड़ा शब्द नहीं था, उषा प्रियंवदा बहुत शांति से एक बड़ा सवाल रख देती हैं, क्या एक कामकाजी स्त्री सिर्फ़ घर चलाने का सहारा है या वह भी एक इंसान है, जिसके अपने सपने और अपनी ज़िंदगी है?
इस उपन्यास की सबसे गहरी चोट रिश्तों के भीतर से आती है। सुषमा का परिवार, खासकर उसकी माँ, उसके सपनों को “कर्तव्य” के नाम पर धीरे-धीरे कुर्बान करता चला जाता है। सब कुछ उसके भले के लिए किया जाता है, लेकिन असल में उसका जीवन उससे छीना जा रहा होता है। किताब यह समझाती है कि हर ज़ख्म बाहर से नहीं आता, कुछ सबसे गहरे ज़ख्म अपने ही लोग देते हैं, प्यार और चिंता के नाम पर।
आज की नज़र से देखें तो सुषमा कई बार कमजोर लगती है। वह आत्मनिर्भर है, फिर भी गलत दबावों के आगे झुक जाती है। वह लड़ती नहीं, आवाज़ नहीं उठाती, बस चुपचाप मान लेती है कि शायद स्त्री की आज़ादी यहीं तक होती है। यही चुप्पी इस उपन्यास की सबसे बड़ी पीड़ा बन जाती है। अंत में कहानी हमें एक ठहराव में छोड़ देती है और हम खुद से पूछते हैं , क्या सच में समाज बदल गया है?
वे पचपन खम्भे और लाल दीवारें आज भी हमारे आसपास खड़ी हैं। कभी परिवार के नाम पर, कभी परंपरा के नाम पर और कभी हमारी अपनी सोच के भीतर। बस अब वे थोड़ी सभ्य हो गई हैं, थोड़ी शांत हो गई हैं, लेकिन गई नहीं हैं।
यह किताब उन लोगों को ज़रूर पढ़नी चाहिए जो भारतीय मध्यवर्ग की असली तस्वीर देखना चाहते हैं, जो स्त्री की आज़ादी के सच और भ्रम के बीच का फर्क समझना चाहते हैं और जिन्हें शांत, गहरी और सोचने पर मजबूर करने वाली कहानियाँ पसंद हैं। वहीं जिन्हें तेज़ रफ्तार कहानी, ज़बरदस्त ड्रामा और हर हाल में खुशहाल अंत चाहिए, या जो सिर्फ़ हल्का-फुल्का मनोरंजन ढूँढते हैं, उनके लिए यह किताब शायद नहीं है