राजेन्द्र यादव हिन्दी के सुपरिचित लेखक, कहानीकार, उपन्यासकार व आलोचक होने के साथ-साथ हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय संपादक भी थे। नयी कहानी के नाम से हिन्दी साहित्य में उन्होंने एक नयी विधा का सूत्रपात किया। उपन्यासकार मुंशी प्रेमचन्द द्वारा सन् 1930 में स्थापित साहित्यिक पत्रिका हंस का पुनर्प्रकाशन उन्होंने प्रेमचन्द की जयन्ती के दिन 31 जुलाई 1986 को प्रारम्भ किया था। यह पत्रिका सन् 1953 में बन्द हो गयी थी। इसके प्रकाशन का दायित्व उन्होंने स्वयं लिया और अपने मरते दम तक पूरे 27 वर्ष निभाया।
28 अगस्त 1929 ई० को उत्तर प्रदेश के शहर आगरा में जन्मे राजेन्द्र यादव ने 1951 ई० में आगरा विश्वविद्यालय से एम०ए० की परीक्षा हिन्दी साहित्य में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान के साथ उत्तीर्ण की। उनका विवाह सुपरिचित हिन्दी लेखिका मन्नू भण्डारी के साथ हुआ था। वे हिन्दी साहित्य की सुप्रसिद्ध हंस पत्रिका के सम्पादक थे।
हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा राजेन्द्र यादव को उनके समग्र लेखन के लिये वर्ष 2003-04 का सर्वोच्च सम्मान (शलाका सम्मान) प्रदान किया गया था।
28 अक्टूबर 2013 की रात्रि को नई दिल्ली में 84 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।
किरदार : मेजर तेजपाल, मिसेज तेजपाल, मेजर रणधीर, बीनू और बीनू का भाई ( अभ्यागत ) जो ये सारी बातें पाठक तक ले जा रहा है।
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कहानी :
यह उपन्यास एक अभ्यागत का अपने पड़ोसी (मिसेज तेजपाल) की तरफ़ आकर्षण दिखाता है, जिसका निर्मल हृदय मिसेज तेजपाल के जीवन में आयी बाधाओं के बारे में जानने को उत्सुक रहता है। एक नारी (मिसेज तेजपाल) जिनके पति आर्मी में हैं और जो ख़ाली समय में गाने गाती हैं, "वॉर एंड पीस" पढ़ती हैं और "मज़ाज" की लिक्खी नज़्में गुनगुनाती हैं कैसे कुलटा हो सकती हैं इस तथ्य तक जाने की एक रोचक यात्रा है कुलटा। कहानी के अंत में वो किसी के लिए कुलटा है तो किसी के लिए दुःखों के पहाडों के नीचे दबी एक असहाय नारी। एक ऐसी नारी जो बर्मा से जब भारत आई तो शादी के बाद अपने सभी पुराने शौकों से अपना नाता तोड़ ली।
एक के बाद एक घटनाओं का क्रम और हर बार लेखक का यह सोचना कि मिसेज तेजपाल कुलटा हैं या नहीं यही इस उपन्यास का केंद्र बिंदु है कहना ग़लत होगा क्योंकि यह उपन्यास नारी की अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता पर भी सवाल खड़े कर देता है? यह उपन्यास समाज के उस वर्ग पर भी तंज कसता है जो बड़े अधिकारी तो कहलाते हैं परंतु अंदर से कितने जल्लाद और निर्मोही होते हैं। इस उपन्यास के अंत में शायद आपको लगेगा अच्छा होना, अपडेटेड रहना और अपना रास्ता स्वयं चुनना है कुलटा कहलाना है। किसी को सीधा कुलटा न कहकर कई सवाल दागे गये हैं पाठकों पर कि वे अपने विवेकानुसार तय कर लें कौन है असल में कुलटा?
१- समाज
२- मेजर तेजपाल -( जो इतने पागल हो जाते हैं कि लड़कियों के वस्त्र उनके तन से क्षण भर में अलग कर देते हैं और राँची पागलखाने में भर्ती कर दिये जाते हैं )
३- मिसेज तेजपाल - जिनके अपने शौक़ हैं, एक नज़रिया है जीवन को जीने का।
४- हर वो इंसान जो अपने आगे दूसरे के हुनर को कम आँकता है या तुच्छ समझता है
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मूल बातें :
इस उपन्यास को पढ़ते हुए लेखक ने लगातार पाठक को किंकर्तव्यविमूढ़ की स्तिथि में रखा है कि मिसेज तेजपाल का असल चेहरा क्या है? कभी वो ख़ुद ही उन्हें लालसा और हवस भरी नज़रों से देखा करता है तो कभी उनकी याद में खोया उनके जीवन यात्रा से प्रोत्साहित होता नज़र आता है। इन दोनों तस्वीरों के बीच ख़ुद मुझे कभी कभी राजेन्द्र यादव के २०१३ के इंटरव्यू की बातें याद आती हैं जब नामवर सिंह उनके घर गये थे और जीवन के आख़िरी क्षणों में राजेंद्र यादव ने हाथ में सिगरेट लिए उनसे कहा था कि ''दो ज़िंदगी का कर्ज है मुझ पर, जिन्हें मैंने बर्बाद कर दिया''। इस उपन्यास को पढ़ते हुए मुझे मिसेज तेजपाल में राजेंद्र यादव का अंश नज़र आता है। दो ज़िन्दगी उनसे जुड़ी हुई महसूस होती हैं जिनको वो बहुत हद तक प्रभावित करती हैं। यहाँ दूसरे इंसान के बारे में बहुत बारीक़ी से पढ़ने पर आप को पता लगेगा कि वो कौन हैं, यह राज उनके अतीत से जुड़ा हुआ है और किताब के अंत में खुलता है।
अभ्यागत जानता है कि मिसेज तेजपाल बला की ख़ूबसूरत हैं और उनके ज़िस्म की तराश उसे मदहोश कर देती है। उनके बारे में सोचते हुए वो दूसरे ही दुनिया में विचरण करने लग जाता है और कई बार उन्हें स्पर्श करने की इच्छा प्रबल हो जाती है उसके मन में। इन सब बातों के दरमियाँ किताब में लिक्खी ये पंक्तियां
"अकेले पहाड़ी झरने के एकान्त किनारों और घाटियों की हरियल सलवटों की अंगड़ाई लेती भूल-भुलैयों से लौटकर ही मुझे यह भी लगता कि ये अपना
सिर मेरे सिर के इतने पास क्यों ले आती हैं ? बराल में बैठे ये लोग कहीं इस गीत को सुनकर यह न सोच लें कि जाने कौन बाजारू औरत साथ और यह मैं भी जानता था कि वे हल्की 'चाहे जितनी हों, चाहे जितनी उन्मुक्त और स्वच्छंद होकर व्यवहार करें या गाएँ, लेकिन उनकी हर बात में एक संयत ऊँचाई का भाव है, ऐसा कुछ ग्रेस है कि सहसा उनके बारे में कोई ऐसी-वैसी बात नहीं सोच सकता"। संकेत करतीं हैं कि किसी औरत का बच्चों जैसा होना, सेक्सुअल डिजायर होना, किसी पर विश्वास करना और अपने मन के अनुसार कपड़े पहनना उसको कहीं से भी चरित्रहीन नहीं बनाता, चरित्र बनता है विचारों से और विचार का निर्माण जीवन के तज़रबा से होता है। इस उपन्यास से ये एक बात मैं ग्रहण करता हूँ और उम्मीद करता हूँ आप कभी समय निकाल कर इसे पढ़ेंगे और इस निष्कर्ष पर आयेंगे कौन है कुलटा।