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सबहिं नचावत राम गोसाईं

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Hindi
226

287 pages, Hardcover

First published January 1, 1970

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Bhagwaticharan Verma

27 books42 followers

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Displaying 1 - 2 of 2 reviews
83 reviews15 followers
June 10, 2025
मुझे याद भी नहीं है ये उपन्यास मैंने कब ख़रीदा था। किताबों की अलमारी की सफ़ाई करते करते हैं ये मुझे दिखा और और एक दिन अचानक ही उठाके पढ़ने लगी। भारत की आज़ादी की पृष्ठभूमि पर लिखी यह एक बेहद ही रुचि पूर्ण पुस्तक है।सालों बाद हिंदी उपन्यास पढ़ा है।यह किताब रंगों से भरी है।तीन पुश्तों की कहानी स्वतंत्रता के बाद के राजनीतिक भारत पर आ टिकती है।जातिगत आधार पर बना हुआ समाज कैसे बदलते समय के साथ अपना स्वरूप बदल रहा।उत्तरप्रदेश का आंचलिक वर्णन,बोली और भाषा एक दम सटीक है। लखनऊ के नाम जैसे आलमबाग,चॉक एवं मुंशीपुलिया पड़ कार आनंद आ गया। एक और चीज़ जो बहुत अच्छी लगी वो थी सरकारी कामकाज की व्यवस्था। उपन्यास के दूसरे हिस्से में इसका काफ़ी अच्छा वर्णन है।एक गिरफ़्तारी करने में ही पूरी नौकरशाही लग जाती है।भारत की नौकरशाही अपने आप में ही एक अजूबा है। और सत्य तो यही है की 75 साल के बाद भी इनमें कोई ज़्यादा परिवर्तन नहीं है।वही नेताओं, अफ़सरोंऔर व्यापारियों की मिली भगत,वहीं बेचारा आम आदमी।यह उपन्यास अंत में भारत की प्रजातंत्र में एक उम्मीद की किरण ज़रूर दिखाता है। Forrest Gump की तरह यह एक मौखिक इतिहास की तरह प्रतीत होता है।
Profile Image for Srinidhi Mishra.
23 reviews6 followers
April 16, 2016
A very well written short stories connected together. Beautifully described tricks of trade in Indian society.
Displaying 1 - 2 of 2 reviews

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