"प्रतिक्रियाएँ : : बापू की हत्या हजारवीं बार “बापू की हत्या हजारवीं बार सुशील का एक सशक्त नाटक है जो अपनी चुस्ती, पैनेपन और नाटकीयता के कारण एक दूसरे और ऊँचे स्तर पर स्थापित हुआ है।"" - ज्ञानदेव अग्निहोत्री (नाटककार -निर्देशक, पटकथा लेखक) / “... एक सोद्देश्य एवं सशक्त व्यंग्य नाट्य प्रयोग बापू की हत्या हजारवीं बार जो आज़ादी के बाद तेज़ी से विघटित हो रहे नैतिक मूल्यों तथा उतनी ही तीव्रता से विकसित हो रहे नये भ्रष्टाचारी तन्त्र को सफलतापूर्वक रेखांकित करने में समर्थ है।"" - नटरंग, नयी दिल्ली / “वास्तव में हत्यारे ने बापू के पार्थिव शरीर की केवल एक बार हत्या की थी, किन्तु बापू के देशवासी उनके महान आदर्शों रूपी अपार्थिव शरीर की नित्य हजारों बार हत्याएँ किया करते हैं यह यथार्थ विडम्बना ही नाटक का मूल सन्देश है जो कटु सत्य के रूप में नाटककार की सफल लेखनी द्वारा प्रभावशाली ढंग से रंगमंच पर प्रगट होता है।"" - कथा, त्रैमासिक, इलाहाबाद / “झूठ, धोखा, मक्कारी, ख़ुदगर्ज़ी और कपटजाल की यवनिका के पीछे लम्बी क़तार बनाकर खड़े पात्रों की भीड़ है जिसे बापू की हत्या हजारवीं बार नाटक का शीर्षक बखूबी छुपाये है। इस नाटक के प्रदर्शन सारे में किये जाने चाहिए क्योंकि वर्तमान परिस्थिति की प्रतिध्वनि इस नाटक में निहित है ।"" - दैनिक विश्वामित्र, कानपुर / ""बापू की हत्या हजारवीं बार एक राजनैतिक- सामाजिक व्यंग्य विद्रूप नाटक ही नहीं बल्कि सार्थक रंगमंच की तलाश का अनूठा प्रयोग भी है।"" - नवजीवन, लखनऊ / “सार्थक एवं सफल प्रस्तुति बापू की हत्या हजारवीं बार ।"" - दैनिक जागरण, कानपुर "