कई दशकों से हिन्दी उपन्यास में छाये ठोस सन्नाटे को तोड़ने वाली कृति आपके हाथों में है, जिसे सुधी पाठकों ने भी हाथों-हाथ लिया है और मान्य आलोचकों ने भी ! शाहजहाँपुर के अभाव-जर्जर, पुरातनपंथी ब्राह्मण-परिवार में जन्मी वर्षा वशिष्ठ बी.ए. के पहले साल में अचानक एक नाटक में अभिनय करती है और उसके जीवन की दिशा बदल जाती है। आत्माभिव्यक्ति के संतोष की यह ललक उसे शाहजहाँनाबाद के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा तक लाती है, जहाँ कला-कुंड में धीरे-धीरे तपते हुए वह राष्ट्रीय स्तर पर अपनी क्षमता प्रमाणित करती है और फिर उसके पास आता है एक कला फिल्म का प्रस्ताव !
आत्मान्वेषण और आत्मोपलब्धि की इस कंटक-यात्रा में एक ओर वर्षा अपने परिवार के तीखे विरोध से लहूलुहान होती है और दूसरी ओर आत्मसंशय, लोकापवाद और अपनी रचनात्मक प्रतिभा को मांजने-निखारने वाली दुरूह, काली प्रक्रिया से क्षत-विक्षत। पर उसकी कलात्मक आस्था उसे संघर्ष-पथ पर आगे बढ़ाती जाती है। वस्तुतः यह कथा-कृति व्यक्ति और उसके कलाकार, परिवार, सहयोगी एवं परिवेश के बीच चलने वाले सनातन द्वंद्व की और कला तथा जीवन के पैने संघर्ष व अंतर्विरोधों की महागाथा है।
परंपरा और आधुनिकता की ज्वलनशील टकराहट से दीप्त रंगमंच एवं सिनेमा जैसे कला-क्षेत्रों का महाकाव्यीय सिंहावलोकन ! अपनी प्रखर संवेदना के लिए सर्वमान्य सिद्धहस्त कथाकार तथा प्रख्यात नाटककार की अभिनव उपलब्धि !
उपन्यास: अँधेरे से परे, मुझे चाँद चाहिए, दो मुर्दांे के लिए गुलदस्ता।
कहानी-संग्रह: प्यार की बातें, कितना सुन्दर जोड़ा।
व्यंग्य-संग्रह: जहाँ बारिश नहीं।
नाटक: तीन नाटक, सूर्य की अन्तिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक, आठवाँ सर्ग, छोटे सैयद बड़े सैयद, शकुन्तला की अँगूठी, एक दूनी एक, कश्ैद-ए-हयात तथा नींद क्यों रात-भर नहीं आती।
सम्मान: केन्द्रीय संगीत नाटक अकादेमी, साहित्य अकादेमी तथा भारतीय भाषा परिषद द्वारा।
सम्प्रति: स्वतंत्र लेखन।
सम्पर्क: 631, शान्तिवन, न्यू लिंक रोड, अँधेरी (प.), मुम्बई-400088
शक्ति तब तक सम्पूर्ण नहीं होति, जब तक अपनी काली नियति के आगे आत्मसमर्पण न कर दिया जाये | हिंदी का यह उपन्यास रोमन सम्राट कालीगुला द्वारा कही गयी इस बात को बेहद सटीक एवं तार्किक रूप से सिद्ध करता है |
यह एक अपरिवर्तनवादी परिवार में जन्मी बच्ची, सिलबिल, की कहानी है जो अपनी काबिलियत के बलबूते अपने सपनों को पूरा करना चाहती है, पर उसके रूढ़िवादी परिवार का एकमात्र मकसद उसकी शादी कराना है |
साधारण सी दिखने वाली इस किशोरी में प्रतिभा का भंडार है, पर बाहरी दुनिया का अनावरण न होने के कारण उसे अपनी क्षमता का आभास तक नहीं है | पर टैलेंट को केवल डिले किया जा सकता है, रोका नहीं जा सकता |
अंततः, यह सोचकर की ज़िंदगी असीम संभावनाओं से भरी है, वह निकल पड़ती है - अपनी संकल्पशक्ति के भरोसे बाहरी दुनिया का अन्वेषण करने और अपनी आकांक्षाओं और सपनों की इबारतों को रूप देने के लिए | क्या वह अपनी ज़िंदगी की कसौटी पर खरी उतर पाएगी?
मुझे इस उपन्यास का निम्नलिखित उद्धरण बेहद पसंद आया : "शिक्षक की कला मेधावी शिष्य के पास पहुँचकर वैसे ही खिलती है, जैसे बादल का पानी समुद्र की सीपी में पहुँचकर मोती बन जाता है |"
काफी समय तक अपनी प्रसिद्धि, आकार और साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत होने के तथ्य की वजह से गंभीर सी लगती रही ये लंबी सी किताब जब शाहजहाँपुर के 54, सुल्तानगंज के आँगन में खुली तो महज कुछ ही पन्नों में अपने शुरुआती हास्य और प्रवाह से मन मोह गयी (हालाँकि उत्तरार्ध की ओर बढ़ते हुए यह गंभीर हो जाती है।)―और दे गयी एक किरदार, जो शायद जीवन भर मन के गगन में चाँद सा आलोकित होता रहे―यशोदा शर्मा उर्फ़ सिलबिल उर्फ़ वर्षा वशिष्ठ! तीन बड़े बड़े खंडों में बँटी इस काफी बड़ी किताब ने पठन के करीबन एक हफ़्ते के दौर में अपने टोन और कथानक को अनन्य तरीकों से बदला और एक जिद्दी, मुँहफट और आत्मसजग लड़की के एक सफल, आत्मविश्वासी और समर्थ स्त्री बन जाने की कहानी को इस कदर बयाँ किया कि किंचित अप्रत्याशित तत्वों के समागम के बावजूद इसका अंत चेहरे पर एक मंद स्मित छोड़ गया। थिएटर, फ़िल्म, दिल्ली का शहरी और बम्बई का सिनेमाई जीवन इसके पन्नों में बहुत मुखरता और सजीवता से जीवंत हुए हैं। आर्ट सिनेमा और व्यावसायिक फिल्मों के टकराव और उनकी अपनी अपनी महत्ता को भी ढेर सारी स्याही ने व्याख्या प्रदान की है। इन सबके ऊपर उपन्यास की धुरी, वर्षा वशिष्ठ का जीवन, तमाम हिचकोलों, तनावों, टकरावों, उपलब्धियों, संबंधों; उनके आलोड़न-विलोड़न, अकेलेपन के संत्रास से गुज़रता, थमता, एक वृत्त सा बनाता, इतनी संजीदगी से वर्णित हुआ है कि लेखक की भाषाई कलात्मकता पर आश्चर्य होता है। हिंदी के हर सजग पाठक को चाहिए कि उसकी आलमारी इस एक ‘चाँद’ से शोभित होती रहे!
I loved this book for many reasons. The major quotient can be the strong feminist approach that has been shown. This book is all about the struggle of a girl hailing from a small town and who has led entire life on her on terms and conditions. Her exotic way of living was unbearable for his kith and kins and they never stood for her. All she had was few friends who showed her the way, to whom she dedicated her life and the most important one she was always high on morals and attached to ground. She became a queen though emotionally all alone but a winner and a fighter for sure.
This book gives adrenaline rush. so much so that I missed some important appointments to finish it. I wonder why there is no bollywood movie on it yet. After really long I read a fat book with reasonably tough hindi. I struggled in the begining but emotional stir it created compelled me to finish 515 pages in no time.
Varsha Vashisht,a girl from tier 3 Indian city reaches the stardom in Mumbai. Her life is an intersting tapestry depicting struggle,indomitable success and strong feminism in a subtle way. As it is in most of the stories,Varsha discovers her feminism in her journey and with her strength of character achieves a complete synchronisation of her thoughts,speech and action. A nervous but strong headed Silbil from Shahjahanpur becomes the fearless and intense actor in Mumbai.
I have missed on one star because the book glorifies Indian value of sacrifice for being feminine. I give it a benifit of doubt considering the time it was written.
इस उपन्यास में सुरेंद्र वर्मा ने समाज, रंगमंच और सिने जगत से जुड़े विभिन्न पहलुओं को छूने की कोशिश की है। जब वो रंगमच से जुड़ी बारीकियों को विश्लेषित करते हैं तो उनकी लेखनी सबसे सशक्त जान पड़ती है। शायद ये इसलिए भी है कि रंगमंच उनका कार्यक्षेत्र रहा है। सुरेंद्र वर्मा ने रंगमंच के जिस परिदृश्य को उभारा है वो आज भी बहुत कुछ वैसा ही है। कितने ही नौजवान और नवयुवतियाँ, देश के कोने कोने से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में आते हैं तो इस जोश और समर्पण के साथ कि कला के इस माध्यम में अपनी चुनी हुई विधा में वे एक अलग पहचान बना सकें और जिससे उनका जीवन भर का एक अटूट रिश्ता बना रहे। पर ये समर्पण धीरे-धीरे तब घटता चला जाता है जब वो इस क्रूर सत्य से मुखातिब होते हैं कि इस क्षेत्र में की गई अथक मेहनत एक कलात्मक संतोष तो दे पाती है पर वो जीवकोपार्जन के लिए पर्याप्त नहीं होती।
छोटे शहर का मध्यमवर्गीय समाज, थिएटर और फ़िल्म जगत की दुनिया : तीनों के अंदर के जीवन को सजीवता से चित्रित करते इस उपन्यास के मुख्य पात्र का नाम है .....
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"तुमने अपना नाम बदल लिया है ?"
"हाँ।"
"काहे?"
"मुझे अपना पसंद नाम नहीं था। अगर हाई स्कूल में नहीं बदलती, तो आगे चलकर बहुत मुश्किल होती। अख़बार में छपवाना पड़ता।"
"तुम्हारे नाम में क्या खराबी है ?" पिता ने कड़वे स्वर में पूछा।
"अब हर तीसरे-चौथे के नाम में शर्मा लगा होता है। मेरे क्लास में ही सात शर्मा है। ... और यशोदा ? घिसा-पिटा, दकियानूसी नाम। उन्होंने किया क्या था ? सिवा क्रिश्न को पालने के ?"
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हाँ, तो इस उपन्यास की मुख्य पात्र सिलबिल उर्फ़ यशोदा शर्मा ने अपना नाम वर्षा वशिष्ठ रखकर संस्कृत अध्यापक के परिवार में विद्रोह की पहली चिंगारी फूंकी थी और इस चिंगारी को आंधी से बचाए रखी - मिश्रीलाल डिग्री कॉलेज में आई टीचर, शहर की एकमात्र खुद से कार चलनेवाली महिला, दिव्या कत्याल।
जिस परिवार में लड़कियों के लिए सांस लेने के अलावा सब कुछ अकरणीय समझा जाता था उस परिवार की सिलबिल का सोच था
"ये मेरे रक्त-संबंधी हैं, इनका सुख-दुःख मेरा है, पर मेरा सुख-दुःख मेरा ही रहेगा। ये उसे बाँट नहीं सकेंगे। एक हद के बाद उसे समझ भी नहीं पायेंगे।"
और वर्षा वशिष्ट पिटाई कर बाथरूम में बन्द कर दिए जाने के बावजूद दिल्ली जाने वाली ट्रेन में बैठ कर नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा पहुँच जाती है।
वहाँ सफलता की परचम लहराते हुए फ़िल्म नगरी मुम्बई पहुंचकर वहाँ भी कलात्मक और व्यावसायिक ��फलता के ऊँचे झंडे गाड़ देती है। लेकिन ... व्यक्तिगत ज़िन्दगी में भी उन्हीं ऊंचाइयों को छू पायेगी ?
निजी जीवन में खुद के लिए प्रेम और प्रेम की परिभाषा को भी ढूंढती रहने वाली सिलबिल को उसकी मेंटर टीचर दिव्या कत्याल ने कहा था, "एक ही शहर में तुम्हारे दो प्रेमी होंगे, यह कोई आदर्श स्थिति नहीं है।"
व्यावसायिक और कलात्मक सफलता के शिखर पर बैठी वर्षा अपने निजी जीवन के सबसे अँधेरे क्षण में कहती है,
"मेरे वास्ते चन्द्रमा हमेशा के लिए बुझ गया है ..."
लेकिन विषाद चन्द्रमा को कब तक ढँक सकता है ! विषाद भी दम्भ की तरह टिकाऊ नहीं होता और सिलबिल प्रेम की अपनी परिभाषा अपने प्रिय व्यक्ति के प्रिय नाटक "कालिगुला" से ही पाती है :-
"किसी को प्रेम करने का अभिप्राय यह है कि उस व्यक्ति के बगल में तुम वृद्ध होने के लिए तैयार हो।"
और जैसा कि उड़ान भरने से पूर्व,अपने घर में, सिलबिल ने सोचा था, "ये मेरे रक्त-संबंधी हैं, इनका सुख-दुःख मेरा है, पर मेरा सुख-दुःख मेरा ही रहेगा। ये उसे बाँट नहीं सकेंगे। एक हद के बाद उसे समझ भी नहीं पायेंगे।"
सिलबिल ने रक्त सम्बन्धियों का सुख-दुःख बांटा लेकिन एक हद के बाद उसे कोई समझ भी नहीं पाए।
सिलबिल के अलावा कई और साथी कलाकारों के संघर्ष, टूटन और सफलता की भी कहानी चलती है। कई सारे नाटक और उनके पात्रों के माध्यम, खासकर चेख़व और कामू के नाटक, से भी कहानी के पात्रों का चरित्र निरूपण किया गया है।
खुद पढ़कर जाना जा सकता है। मैं हर बार की तरह फिर वही कहूँगी कि कहानियां हों या कविताएं, कहीं विश्राम नहीं पातीं। उपन्यास के एक पात्र हर्ष के जीवन क्रम और आत्महत्या को मैंने काफ़ी कुछ सुशांत सिंह राजपूत के ज्ञात हश्र जैसा पाया। अति आदर्श और महत्वकांक्षा का संगम व्यक्ति को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम के दुर्गम पहाड़ पर ले जाकर खड़ा कर देता है, पर वास्तव में जीवन केवल अपनी शर्तों और जिदों पर जिए जाने का ही नाम नहीं होता। जीवन के प्रवाह में बहती यशोदा उर्फ़ सिलबिल ने जब अपना एडमिशन वर्षा वशिष्ठ के नाम से करवाया और कॉलेज के पहले ड्रामा में दिव्या कत्याल के मार्गदर्शन में हिस्सा लिया था- तब कहाँ पता था कि ये चार से अधिक शहरों की मिट्टी में अपनी जड़ें जमाकर अंतरराष्ट्रीय सिनेमा जगत की एक फ़िल्म तक पहुँचेगी।
सिलबिल बहुत मज़बूत नायिका है। उपन्यास ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए। क्योंकि इसको पढ़ने के लिए अनेकों कारण हैं। 500 पन्नों से ज़्यादा का यह उपन्यास बहुत कुछ सिखाता है, और कई दिनों तक आपके भीतर जागता रहता है।
कोई लेखक किसी चरित्र को इनती संजिन्दगी और बारीकी से लिखे देता है की आश्चर्य होता है कोई इतना कैसे सोच सकता है, अगर उसने लिखा इतना है तो सोचा कितना होगा. 'वर्षा वशिष्ठ' को इसी तरह गढ़ा गया है इस पुस्तक में. कहानी इतनी विस्तार में की कुछ भी नाटकीय या अचानक सा होता प्रतीत नहीं होता. सब कुछ जैसे स्वाभाविक गति से चल रही हो...जैसे अपनी जीवन की गति हो. महान कृतियों के सन्दर्भों का अद्भूत समिश्रण, निश्चय ही लेखक ने काफी रिसर्च किआ होगा. मानव को मानव की जरुरत और उनके संबंधों को रेखांकित करती हुई, विपरीत परिस्थितियों से लड़ते हुए भी अपने में अपना तत्व बचाकर रखने की ये कहानी, बहूत ही सुन्दर है और अंत में नासमझ में आने वाली दुःख छोड़ जाती है. या जैसा वर्ष वशिष्ठ ने कहा-यही तो जीवन है का मूल्य स्थापित कर देती है.
रंगमच प्रेमी के लिए बहतेरिन रचना है। हर एक प्रकरण कुछ ना कुछ सीखा जाता है। ५१४ पन्नो की यह रचना आप को अपने साथ बांधे रखती है। हालांकि कुछ दृश्यो मे इतने अधिक पात्र हो जाते है की पात्रो को संभालना मुशकिल हो जाता है। परंतु दृश्य यथार्थ के नजदीक रहे उसके लिए ऐसा करना अनिवार्य भी है। अंत मे नायक का न रहना व नायिका की अंतरंग मित्र का भी अंतिम सत्य की और अगर्सर होना नायिका की भावनात्मक स्थिति को अंतिम छोर तक ले जाती है।
अनेक पात्रों की मौजूदगी और थोड़ी भ्रमित करने वाली टाइमलाइन के कारण पढ़ने में थोड़ी दिक्कतें आयी परन्तु कहानी कहीं पर भी बोझिल नहीं लगी। सभी पात्र धीरे धीरे और बेहतर ही होते चले गए। वर्षा वशिष्ठ का चरित्र सदैव के लिए मेरे स्मृति पटल पर अंकित हो चुका है।
This is the first novel I have read in my life. For the longest time, I could not enjoy any other novel because the kind of emotional reaction I had for this work, no other work could produce in me.
It was a journalist friend who referred this book to me. He said this book is all about the grit it takes to make it big. Which is also what the title of the book suggests. The ring of this title makes it sound like the story of someone chasing the stars of fame. Of someone who's determined to grab the gold of life, and not settle for anything less than the best. This - however - is not how the protagonist thinks or acts. The hero of the book, Varsha, is quite contrary to the image of this over achiever. She is certainly a rebel, though a highly educated one. One who starts with changing her name. With a logic so sharp that it leaves her erudite father tongue tied. One who breaks boundaries after boundaries without making a single noise. She pursues passion (which is acting), not success. The latter is purely incidental. This book is about friendship. For it's a friend who blossoms Varsha into the world of acting. This book is about precision and passion. For nothing extraordinary comes without it, and this book elaborates its technicalities in the world of theatre. This book is about love. Woven in all forms of relationship, romantic and otherwise, to add the much needed reprieve to the fabric of a demanding life.
A full 5/5 for Surendra Verma for writing this marvel. A must read for everyone who can manage to read Hindi.
सुरेंद्र जी वर्मा का यह उपन्यास क्लासिक उपन्यास है खासकर उन लोगों के लिए जो कला के किसी भी क्षेत्र या अपना एक अलग-अलग उद्देश्य कर आगे बढ़ना चाहते हैं वर्षा वशिष्ठ को केंद्र बनाकर इस उपन्यास में उनके बचपन के संघर्ष कॉलेज लाइफ में अपने उद्देश्यों को पहचानना तथा एक कलाकार के रूप में आगे बढ़ने का संघर्ष दिखाया गया है वर्षा वशिष्ठ जो कि अभिनय करती है विशेषकर नाटकों में किस प्रकार मायानगरी जाती है और अपने-अपने के बलबूते बॉलीवुड और हॉलीवुड दोनों में एक विशेष जगह बनाती है तथा वहां भी वह अपने अपने कार्य क्षेत्र को लेकर सजग रहती है और फिर सफलता हासिल करती है परंतु इस सफलता में जीवन भौतिक उपलब्धियां तो बेटा आखिर की है परंतु मानसिक शांति खो दिया है पट्टू वसा वशिष्ठ हिम्मत नहाती है अपने जिंदगी में किस प्रकार अपने सड़कों पर खड़ी होती है एक दिलचस्प कहानी है चाहे इसे एक इसकी संरचना में या कलाकार का संघर्ष किसी भी रूप में अपना बहुत ही पठनीय है
यहां कहानी दिखाता है कि यदि मन में संकल्प और उद्देश्यों के प्रति सच्ची समर्पित भावना हो तो आदमी किसी भी परिस्थिति में उसे पा सकता है
एक मध्यमवर्गीय घर की लड़की जब बड़ा सपना देखती है और उसको पूरा करने के लिये मेहनत भी करती है तो उसे सिर्फ अपने सपने की कीमत नहीं चुकानी पड़ती है बल्कि उम्र के हर पड़ाव पर अपने स्त्री होने की कीमत भी चुकानी पड़ती है।
"कुछ झीना अवसाद..थोड़ा गुनगुना पछतावा और अपने आप पर तनिक झिझक-सा संदेह..आयु के एक पड़ाव तक पहुँचने पर कुछ रचनालीन,संवेदनशील व्यक्ति भीतरी ख़ालीपन,हल्के आक्रोश और बेचैन करने वाली अर्थहीनता से जूझने लगते हैं-खासकर शो बिज़नेस से जुड़े हुए लोग,क्योंकि चुनौतियाँ,तनाव और दर्द भरे विरोधाभास उनके आसपास बहुत हैं ।"
'मुझे चाँद चाहिए' सुरेन्द्र वर्मा का प्रसिद्ध उपन्यास है..जिसमें छोटे शहर की लड़की वर्षा वशिष्ठ की जीवन यात्रा है..किस तरह एक ब्राह्मण परिवार में जन्मी..अपने अस्तित्व से अनजान वर्षा को रंगमंच के ज़रिए अपने जीवन की एक नई दिशा मिलती है..और वो परिवार और समाज के बंधनों से लड़ती-जूझती अपने भविष्य के लिए संघर्षरत होती है..अपनी मेहनत और संघर्ष के बल पर एक नई ऊँचाई को छूती है..ये रास्ता कई परेशानियों और मुश्किलों को साथ लिए आता है,उसके जीवन के ये उतार-चढ़ाव वर्षा के विचारों को और दृढ़ बनाते हैं..उसकी इस यात्रा का पूरा उल्लेख बहुत ही बेहतरीन ढंग से सुरेन्द्र वर्मा ने किया है..रंगमंच की बारीकियों का उल्लेख,अलग-अलग परिस्थिति और उसमें पात्रों की मनोदशा का चित्रण उम्दा है..हर पात्र अलग है और वो अपने भाव उसी तरह प्रकट करता है..सुरेन्द्र वर्मा की लेखन शैली प्रभावी है..514 पृष्ठ का ये उपन्यास कहीं किसी भी पन्ने पर बोझिल नहीं लगता..कहानी इतनी रोचक की किताब छोड़ने का मन ही ना हो..पूरा पढ़ते ही लगा जैसे एक यात्रा पूरी हुई हो..एक ऐसी यात्रा जिससे लौटते ही दोबारा जाने का मन हो..।
इस प्रकार की उपन्यास मुझे व्यक्तिगत रूप में बेबुनियाद लगी।"क्यों "। वह इसलिए क्योंकी उपन्यास का शीर्षक है मुझे चांद चाहिए लेकिन इसमें जो चांद हैं कहानी के अंत मे उसकी व्याख्या की जाती हैं और उपन्यास का अंत हो जाता है बेबुनियाद ढंग से। पूरी उपन्यास में कहीं भी नहीं बताया जाता जिस चांद की बात हो रही हैं आखिर में वह हैं कौन। खैर मैं समझती हूं लेखक इससे पाठक के ऊपर छोड़ना चाहता है। मैं समझती हूं कि मुझे चांद चाहिए उपन्यास "उन कलाकारों कि दास्तान है जो अपना सब कुछ दांव पर लगा तो देते है लेकिन अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने की कीमत उनको बाद में पता चलती है जब उनका सब कुछ लुट जाता है और वह पूरी तरह जिंदगी से हाथ धो बैठता या जिंदगी भर बेशर्मी कि राह पर चलते रहना चाहता है क्योंकि वह उसकी रोजी रोटी हैं।
नाटक और चलचित्र के कलात्मक सरोकारों से जुड़े लोगों के लिए यह उपन्यास एक अनूठा और मनोहारी अनुभव क्षितिज उपलब्ध कराता है। सबसे उपर यह कथानक भारतीय समाज में लड़की/स्त्री की त्रासद स्थिति को बेबाक ढ़ंग से बयां करती है, खासकर एक स्वतंत्रचेता व्यक्ति के संदर्भ में। कस्बे से लेकर महानगर तक तमाम आधुनिकता के दंभ के बीच परंपरा और पितृतांत्रिकता का दमघोंटू वातावरण कितनों को एवं किस हद तक विवश कर देती है यह नाटकीय युक्तियों के सटीक इस्तेमाल के साथ यह कथा भरपूर पठनीयता और बौद्धिकता से समृद्ध है। अच्छा लगा। आप भी जरूर पढ़ें।