कमलेश्वर के उपन्यासों में काली आँधी का अपना विशिष्ट स्थान है। इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल में इसकी रचना हुई और इसका मुख्य चरित्र उन्हीं का प्रतिनिधित्व करता है। उन्हीं के समान दबंग, उन्हीं के समान दुनिया को प्रभावित करने वाला और मानो आँधी की तरह समाज और राजनीति को हिलाकर रख देनेवाला चरित्र। 1975 में ‘आँधी’ नाम से ही इस पर फ़िल्म भी बनी जो बहुत लोकप्रिय हुई। आँधी की मालती - फ़िल्म में जिसका अभिनय सुचित्रा सेन ने किया - हिन्दी उपन्यास की अपूर्व नायिका है जिसके इर्द-गिर्द लेखक ने एक वास्तविक, साथ ही रहस्यपूर्ण दुनिया की सृष्टि की है। उपन्यास उस समय की राजनीति में अवसरवादिता के बढ़ने तथा गरीबी और भूख मिटाने की खोखली मुहिम चलाने का प्रभावी चित्रण प्रस्तुत करता है। उपन्यास में यह भी दर्शाया गया है कि किस तरह चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे किये जाते हैं, परन्तु किया कुछ भी नहीं जाता, उलटा जनहित में लगाया जाने वाला पैसा भी डकार लिया जाता है। आज भी स्थिति जस-की-तस है इसलिए इस उपन्यास की प्रासंगिकता बरकरार है।
Kamleshwar (कमलेश्वर) was a prominent 20th-century Hindi writer, and scriptwriter for Hindi cinema and television. Among his most well- known work are the films Aandhi, Mausam, Chhoti Si Baat and Rang Birangi. He was awarded the 2003 Sahitya Akademi Award for his cult Hindi novel Kitne Pakistan (translated in English as Partitions), and also the Padma Bhushan in 2005.
उपन्यास मुझे बेहद पसंद आया। 120 पृष्ठों में फैला इस उपन्यास का कथानक शुरू से लेकर आखिर तक अपनी रोचकता बरकरार रखता है।
अपने महत्वकांक्षाओं के चलते अपने साथी/रिश्तेदार पर बदलने का दवाब किस तरह उन रिश्तों पर असर डालती है। राजनीति कैसे काम करती है। यह सब इसमें बखूबी दिखाया गया है। आखिर में हमारे चुनाव ही हमारी ज़िन्दगी बनाते हैं। और उनके परिणामों को हमे बिना पछतावे के स्वीकार करना चाहिए।
ज़िन्दगी में हर चीज नहीं मिलती। आदमी को चुनाव करना पड़ता है कि उसे क्या चाहिए... इस चुनाव में जो चीजें छूट जाती हैं, उनके लिए दुःख नहीं करना चाहिए! तुमने जो ठीक समझा...उसे चुन लिया था। मैंने जो ठीक समझा, वह चुन लिया था। अब पछताना कैसा? ... - पछताने में कुछ नहीं रखा है, जीतनेवाला तो जीतता ही है, हारने वाला भी एक दिन जीत जाता है... लेकिन पछताने वाला हमेशा पछताता ही रह जाता है। - इसी उपन्यास से
यही इस उपन्यास को पढ़कर सीखा जा सकता है। मेरे ख्याल से काली आँधी को आपको इसे एक बार जरूर पढ़ना चाहिए। किताब के प्रति मेरे विस्तृत विचार आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं: काली आँधी
फिल्म से काफी अलग, अपने आप में स्वतंत्र साहित्यिक महत्व रखने वाली कृति
स्वाभाविक ही है कि इस पुस्तक को पढ़ने से पहले ही मैंने गुलज़ार साहब की कालजयी फ़िल्म आँधी देख रखी थी जिसका कथानक कमलेश्वर जी ने ही लिखा है। यह भी स्वाभाविक ही है कि मन ही मन होती तुलना से बचा नहीं जा सकता था।
इसके बावजूद इस पुस्तक ने फ़िल्म से अलग एक कृति के रूप में मेरे मन में जगह पूरी कामयाबी से बनाई जिसके लिए कमलेश्वर जी की लेखनी का पहले से ही मुरीद रहा मन और भी फिदा हो गया। सच कहूँ तो मैंने यह पुस्तक सिर्फ इसलिए उठाई थी कि मैंने देखना चाहता था कि एक बनी बनाई फ़िल्म पर आधारित उपन्यासिका कैसी होगी। इसे पूरा पढ़ने का भी कोई इरादा नहीं था। लेकिन, एक बार उठाने के बाद इसे रखना असंभव हो गया।
किताब में खूबसूरत बात एक ये लगी कि राजनीति को एकदम गलौज और सफलता को प्रेरित एक स्त्री को एकदम खलनायिका दिखाने की सुविधाजनक (और अंधी) नजर से लेखक ने देखने का कभी विचार भी नहीं किया है। राजनीतिज्ञ ही सही, लेकिन मालती का चरित्र उतना ही मानवीय है जितना जग्गी बाबू का।
यह एक मुश्किल से साधने वाली चीज़ जिस सरलता से कमलेश्वर जी की लेखनी ने साधी है वह प्रेरणादायक भी है और विस्मयकारी भी।
काली आँधी किताब के बारे में लिखना शुरू करूँ तो भावनाओं के सैलाब में गोते लगाते हुए दिमाग़ पर से नियंत्रण खो बैठूं। क्या क्या अपनी डायरी में अंकित करूँ समझ नहीं आता है? कहने को एक लघुकथा है - दो किरदारों के इर्दगिर्द लिखी गयी एक कहानी है जिसमें दर्द है, सहानुभूति है, आत्मसम्मान है, बलिदान है, सहनशीलता है, कर्तव्यनिष्ठा है, पश्चाताप है लेकिन इन सब से भी बढ़ कर कोई चीज़ है तो वो है आयरन लेडी मालती और साक्षात विन्रमता के पर्याय कहे जाने वाले, अल्पभाषी और मधुर वाणी से सबके दिलों पर राज करने वाले जग्गी बाबू। बस इन्हीं दोनों की कहानी है काली आँधी।
जग्गी और मालती कमलेश्वर द्वारा रचित उपन्यास काली आँधी के ऐसे सशक्त किरदार हैं जिन्होंने उदासी का चोंगा न ओढ़ते हुए धैर्य, हिम्मत और साहस का अनूठा उदाहरण पेश किया। उनके जीवन में सिर्फ़ और सिर्फ़ अंधेरा था, आशाएँ विलुप्त हो चुकीं थीं लेकिन उस अंधेरे को काट कर मालती निरंतर कामयाबी की सीढ़ी चढ़ती जा रही थी और दूसरी तरफ़ जग्गी अपने बचपन के प्यार को खोने के बाद, अपने खजुराहो के होटल में ताला लगा देने के बाद कितनी सहजता से मुस्कुराते हुए भोपाल के गोल्डन सन नामक होटल में मैनेजर के पद पर स्थापित हो चुका था।
काली आँधी पढ़ कर लगता है कि लोग सिर्फ़ धन और वैभव की लालसा लिए दांपत्य जीवन से नहीं जुड़ते थे। वे एक दूसरे के लिए सहायक की भूमिका निभाते थे और अलग हो जाने के बाद भी उनकी ख़ुशी और बेहतरी की दुआ करते थे। सफ़लता की सीढ़ी चढ़ते हुए कब और कैसे मालती अपने ही लोगों से अलग हो गई उसे पता न लगा और किस तरह जग्गी अपना सब कुछ छोड़ कर अपनी बेटी लिली के साथ ख़ुशी से रह रहे थे कि अचानक बारह साल बाद उनकी भेंट होती है मालती से भोपाल में।
एक आँधी के कारण उनका दांपत्य जीवन तहस नहस हो गया था और अचनाक बारह साल बाद उनके जीवन में आयी कुछ राजनीतिक गतिविधियों के कारण एक आँधी आने वाली थी। इस कहानी को पढ़िए और कमेंट में बताइये कि आपको यह किताब कैसी लगी?